परसाई जी का लिखा हुआ स्कूल में पढ़ा था: भेड़ें और भेड़िये। उसके बाद सीधे इतने सालों बाद ये किताब हाथ में आई है. किताब पढ़ के लगता है की आजकल लिखा होता ये सब तो या तो पाकिस्तान भेज दिए गए होते, या जेल में डाल दिए गए होते। सबकी एक तरफ से कैसे ली जाती है, इसकी ट्रेनिंग देते रहे होंगे जब ज़िंदा थे तो. खुद को भी नहीं छोड़ते. चाहे बीमारी हो या पैर का घाव, घर के सामने बन रही सड़क हो या टेबल पर रक्खा ग्रीटिंग कार्ड, ज्यादा खाने से होने वाला पेट दर्द हो या नहाने जैसा काम, उन्होंने हर चीज़ को व्यंगात्मक तरीके से अपने देश और समाज के साथ जोड़कर देखा है, और साथ ही साथ समाज और व्यवस्था पर गहरी चोटें भी की हैं.
कई निबंध मूल विषय से भटकते हैं. ऐसा लगता है जैसे आप किताब न पढ़के लेखक के साथ हों. बहुत ही सहज और बोलचाल की भाषा में लिखी हुई किताब है. कुछ निबंध आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, और कुछ सोचने पर विवश करते हैं कि आज की तारीख में परसाई जी इन समस्याओं पर क्या सोचते. कुल मिलकर बहुत उम्दा संग्रह है. किसी किसी निबंध में कुछ लाइनें बहुत ही उद्धरणीय हैं, जैसे:
"सफलता के महल का सामने का आम दरवाजा बंद हो गया है. कई लोग भीतर घुस गए हैं और उन्होंने कुण्डी लगा ली है. जिसे उसमे घुसना है वो रुमाल नाक पर रखकर नाबदान में से घुस जाता है. आसपास सुगन्धित रूमालों की दुकानें लगी हैं. लोग रुमाल खरीद कर उसे नाक पर रखकर नाबदान में घुस रहे हैं. जिन्हें बदबू ज्यादा आती है और जो सिर्फ मुख्य द्वार से घुसना चाहते हैं, वे खड़े दरवाजों पर सर मार रहे हैं और उनके कपालों से खून बह रहा है."
और
"आर्थिक और सामाजिक क्रांति बिना लंच को संतुलित किये कैसे आयेगी? काम के वक़्त दफ्तरों में, दुकानों में, स्कूलों में और घरों में ऊँघनेवाले और पेट पर हाथ फेरने वाले क्रांति लाएंगे! संकटकालीन स्थिति में भारत रक्षा कानून के अंतर्गत पहला काम होना था: निमंत्रण को गैरकानूनी करार देना और दूसरा लंच को छोटा और संतुलित करने का आदेश निकालना। पर यह हो नहीं रहा है."
जैसा की पहले कहा, कई निबंध मूल विषय से भटकते हुए कहीं और चले जाते हैं. कई बार ये भटकाव अनपेक्षित और गैरजरूरी लगता है, लेकिन कई बार मूल विषय को किसी दूसरे विषय से जोड़ के बिलकुल नया ही दृष्टिकोण सामने रखता है. परसाई जी ने साहित्यिक गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी विषयवस्तु और अपनी बात कहने को समझा है. कुछ निबंधों के कुछ भाग दोहराये हुए लगते हैं, लेकिन उन्होंने ने जितना कुछ लिखा है, उसके बाद ऐसा लगना स्वाभाविक है.
अगर आप लकीर के फ़कीर नहीं हैं और कुछ कड़वी बातें पचा सकते हैं तो किताब आपको पसंद आयेगी.