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पगडंडियों का ज़माना

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इस पुस्तक में हिन्दी के सबसे सशक्त और लोकप्रिय व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के लगभग दो दर्जन निबन्ध संगृहीत हैं। प्रायः सभी निबन्ध ‘नई कहानियाँ’, ‘धर्मयुग’, ‘ज्ञानोदय’ आदि प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। ‘पगडंडियों का ज़माना’ शीर्षक निबन्ध, जिसके आधार पर पूरी पुस्तक का नामकरण किया गया है, आज के इस ज्वलन्त सत्य को उद्घाटित करता है कि सभी लोग किसी-न-किसी तरह ‘शॉर्टकट’ के चक्कर में हैं। इस तरह इस पुस्तक का हर निबन्ध आज की वास्तविकता के किसी-न-किसी पक्ष पर चुटीला व्यंग्य करता है। परसाई के लेखन की यह विशेषता है कि वे केवल विनोद या परिहास के लिए नहीं लिखते। उनका सारा लेखन सोद्देश्य है और सभी रचनाओं के पीछे एक साफ-सुलझी हुई वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि है जो समाज में फैले हुए भ्रष्टाचार, ढोंग, अवसरवादिता, अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता आदि कुप्रवृत्तियों पर तेज रोशनी डालने के लिए हर समय सतर्क रहती है। कहने का ढंग चाहे जितना हल्का-फुल्का हो, किन्तु हर निबन्ध आज की जटिल परिस्थितियों को समझने के लिए एक अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है। इसलिए जो आज की सचाई को जानने में रुचि रखते हैं उनके लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है।

128 pages, Paperback

Published January 1, 1997

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190 people want to read

About the author

Harishankar Parsai

87 books240 followers
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).

He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.

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Community Reviews

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1 star
2 (2%)
Displaying 1 - 6 of 6 reviews
Profile Image for Neelesh Tiwari.
19 reviews2 followers
September 21, 2017
परसाई जी बहुत ही सरल और आम लोगों की भाषा के व्यंग्यकार हैं,हमसे जुड़ी घटनाओं पर इतनी बारीकी से चुटीले तीर चलातें है कि चुभता तो है पर घाव नहीं होता,भारत पगडंडियों का देश है सड़कें तो हर बरसात में बह जाती हैं मगर पगडंडियां स्थिर हैं,"समय पर मिलने वाले" एक निबंध पढकर आनंद आ गया हमने भी बचपन ये किरदार निभाया है और "प्रेम प्रसंग में फादर "पढकर परसाई जी पर थोडा़ संका भी हुई कि ये इतना बारीकी में कैसे पहुंच गये,फिर " वो जरा वाइफ है न " आज भी महिलाओं के शसक्तीकरण की बातें करने वालों के लिये अजीर्ण हो सकता है, " सड़क बन रही है" आज.भी उतनी ही प्रासंगिक है जब परसाई जी ने लिखा होगा,कुल मिलाकर सभी निबंध हमारे आम जीवन के प्रतिदिन के घटनाक्रम हैं, लेकिन उसमें हास परिहास जोड़कर एक संदेश भी दे दिया है।
Profile Image for Ashutosh Rai.
67 reviews45 followers
March 27, 2015

परसाई जी का लिखा हुआ स्कूल में पढ़ा था: भेड़ें और भेड़िये। उसके बाद सीधे इतने सालों बाद ये किताब हाथ में आई है. किताब पढ़ के लगता है की आजकल लिखा होता ये सब तो या तो पाकिस्तान भेज दिए गए होते, या जेल में डाल दिए गए होते। सबकी एक तरफ से कैसे ली जाती है, इसकी ट्रेनिंग देते रहे होंगे जब ज़िंदा थे तो. खुद को भी नहीं छोड़ते. चाहे बीमारी हो या पैर का घाव, घर के सामने बन रही सड़क हो या टेबल पर रक्खा ग्रीटिंग कार्ड, ज्यादा खाने से होने वाला पेट दर्द हो या नहाने जैसा काम, उन्होंने हर चीज़ को व्यंगात्मक तरीके से अपने देश और समाज के साथ जोड़कर देखा है, और साथ ही साथ समाज और व्यवस्था पर गहरी चोटें भी की हैं.

कई निबंध मूल विषय से भटकते हैं. ऐसा लगता है जैसे आप किताब न पढ़के लेखक के साथ हों. बहुत ही सहज और बोलचाल की भाषा में लिखी हुई किताब है. कुछ निबंध आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, और कुछ सोचने पर विवश करते हैं कि आज की तारीख में परसाई जी इन समस्याओं पर क्या सोचते. कुल मिलकर बहुत उम्दा संग्रह है. किसी किसी निबंध में कुछ लाइनें बहुत ही उद्धरणीय हैं, जैसे:

"सफलता के महल का सामने का आम दरवाजा बंद हो गया है. कई लोग भीतर घुस गए हैं और उन्होंने कुण्डी लगा ली है. जिसे उसमे घुसना है वो रुमाल नाक पर रखकर नाबदान में से घुस जाता है. आसपास सुगन्धित रूमालों की दुकानें लगी हैं. लोग रुमाल खरीद कर उसे नाक पर रखकर नाबदान में घुस रहे हैं. जिन्हें बदबू ज्यादा आती है और जो सिर्फ मुख्य द्वार से घुसना चाहते हैं, वे खड़े दरवाजों पर सर मार रहे हैं और उनके कपालों से खून बह रहा है."

और

"आर्थिक और सामाजिक क्रांति बिना लंच को संतुलित किये कैसे आयेगी? काम के वक़्त दफ्तरों में, दुकानों में, स्कूलों में और घरों में ऊँघनेवाले और पेट पर हाथ फेरने वाले क्रांति लाएंगे! संकटकालीन स्थिति में भारत रक्षा कानून के अंतर्गत पहला काम होना था: निमंत्रण को गैरकानूनी करार देना और दूसरा लंच को छोटा और संतुलित करने का आदेश निकालना। पर यह हो नहीं रहा है."

जैसा की पहले कहा, कई निबंध मूल विषय से भटकते हुए कहीं और चले जाते हैं. कई बार ये भटकाव अनपेक्षित और गैरजरूरी लगता है, लेकिन कई बार मूल विषय को किसी दूसरे विषय से जोड़ के बिलकुल नया ही दृष्टिकोण सामने रखता है. परसाई जी ने साहित्यिक गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी विषयवस्तु और अपनी बात कहने को समझा है. कुछ निबंधों के कुछ भाग दोहराये हुए लगते हैं, लेकिन उन्होंने ने जितना कुछ लिखा है, उसके बाद ऐसा लगना स्वाभाविक है.

अगर आप लकीर के फ़कीर नहीं हैं और कुछ कड़वी बातें पचा सकते हैं तो किताब आपको पसंद आयेगी.
7 reviews1 follower
November 29, 2017
Hari Shankar parsai is well known satirist. This book is a collection of his essays. This is not a novel. This books comments on Corruption, pretense, opportunism, superstition, communalism spread across society.
Profile Image for Kalyan Lahkar.
37 reviews3 followers
February 15, 2025
Provides a satirical purview of society, politics, religion and human relationships. Very enjoyable to read if you know Hindi. Very relevant even to present day events in India although it was written some years ago.
16 reviews1 follower
October 19, 2014
परसाई जी की लेखनी सिर्फ गुदगुदाती ही नहीं वरन भारतीय समाज की बुराइयों पर वो वार भी करती है जो हमें शर्मसार कर दे। मुझे लगता है अपने देश के ऊँचे आदर्शवादी इतिहास पर गर्व करने वाले हर भारतीय को परसाई जी को पढना चाहिए ताकि कुछ कडवे सच भी पता रहें जब हम कहें की हम भारतीय हैं।
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