रचना की मूल अंतर्वस्तु और उसके भाषा-शिल्प- दोनों ही स्तरों पर परसाई जनता के रचनाकार थे! चाहे भाषा या भूषा का सवाल हो, चाहे धर्म, संस्कृति, कला, साहित्य अथवा प्रदेश का-उन्होंने उन पर व्यापक जनोंन्मुख नजरिये से विचार किया! अपने बेजोड़ व्यंगात्मक तेवर के सहारे अपनी समूची समकालीनता को खंगालते हुए पाठकीय मानस को जाग्रत और परिष्कृत करने की जैसे कोशिश उनके यहाँ मिलती है, वैसे इधर समूचे भारतीय साहित्य में दुर्लभ है! परसाईजी के इस निबंध-संग्रह में ‘सारिका’ के लिए दो स्तंभों-‘तुलसीदास चन्दन घिसें’ तथा ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ – के अंतर्गत लिखे गए इकतीस निबंध शामिल हैं! इन निबंधों में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई पडनेवाले अंतर्विरोधों पर कड़े प्रहार किये हैं,! वे बराबर उस जगह उंगुली रखते हैं, जिसे हम जाने-अनजाने अनदेखा इअर जाते हैं! कहने की आवश्यकता नहीं की संग्रह के प्रायः प्रत्येक निबंध को पढ़ते हुए पाठक न सिर्फ अपने समय को बेहतर ढंग से समझने लगता है, बल्कि वह अपनी सामाजिक भुमिका के प्रति भी अधिक गंभीर और सचेत हो उठता है!
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).
He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.
परसाई जी की पुस्तकों की सफलता उनकी सार्थकता में है. लगभग 3 दशक पहले लिखे गए व्यंग्य आज भी सटीक चोट कर रहे हैं और करते रहेंगे क्यूंकि ये व्यंग्य बाण किसी व्यक्ति विशेष की तरफ नहीं छोड़े गए थे, इनका लक्ष्य था मनुष्य की अतार्किकता और जब तक तर्क का साम्राज्य स्थापित नहीं हो जाता तब तक ये पुस्तक अपनी चमक नहीं खोएगी.
परसाई जी जिस बेबाकी और शैली में लिखते हैं, उससे उनके कलम द्वारा छोड़ा गया तीर सीधे निशाने के केंद्र बिंदु पर लगता है। यही कारण है कि व्यंग लेखन में परसाई जी का नाम सर्वोपरि लिया जाता है।
किसी कवि नें लिखा है कि "चित्रकुट के घाट पर भइ सन्तन की भीड़। तुलसीदास चन्दन घिसे तिलक देत रघुबीर।।"
परसाई जी इस दोहे को पढ़ के प्रश्न उठाते हैं कि संतन की भीड़? संतन की भीड़ नहीं होती। अगर भीड़ थी तो उसमें दो तिहाई तो लुच्चन होंगें। वे लुच्चन रघुवीर से तिलक करवा समाज में घूमते होंगें कि देखो मुझे तो रघुवीर नें तिलक किया है, और तुलसीदास शाम तक उसी घाट पर चंदन ही घिसते रहे होंगें।
इसी विचार को आज के संदर्भ में जोड़कर परसाई जी आगे बताते हैं कि कैसे आजकल नेता तिलक लगा समाज में भक्त बने घूमते हैं और मजदूर वर्ग शाम तक उन्हें तिलक लगाने के लिए चंदन ही घिसता रहता है।
ऐसे ही परसाई जी तमाम विषयों पर बड़ी दृढ़ता से अपना मत रखते हैं और इतने रोचक तरीके से लिखते हैं कि बात में वजन भी महसूस होता है और एक हल्की मुस्कान भी बनी रहती है।
परसाई की कलम में जादू है। कलम का ये कारीगर संस्थागत रूप ले चुके अनैतिक मानदंडों को उजागर करता है; जहां एक और लेखक का चुटीला व्यंग्य हमें हंसा रहा होता है, वहीं अंदर ही अंदर हम सोचते है; हमारी सोच प्रखर और सटीक होती हैं, हम बेहतर समझ सकने योग्य हो रहे होते हैं।