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प्रतिध्वनि

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श्री 'प्रसाद' जी की सर्वप्रथम कहानियों का संग्रह प्रतिध्वनि में है। हिंदी की नवीन युग की कहानियों का सूत्रपात इन्हीं रचनाओं से हुआ था। अपने समय के साहित्य को पीछे रखकर प्रसाद जी ने इस में नई कला, नई अनुभूति और नवीन युग के नवीन दृष्टिकोण को मूर्त किया है। क्रमशः अपनी महान प्रतिभा से वे अपने साहित्य और उस से भी अधिक अपनी मातृभाषा को अधिक से अधिक ऊँचे स्तर पर ले गए, परन्तु 'प्रतिध्वनि' का महत्व कभी भी कम न होगा क्योंकि हम लोग अपने नये साहित्य के प्रथम प्रभात की उष्ण, स्निग्ध और कोमल किरणों का आनंद इस के द्वारा आज भी पा सकेंगे।

71 pages, Unknown Binding

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Jaishankar Prasad

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