सत्यजित राय के यहाँ हमें फ़िल्मों की दो त्रयी (ट्रायलॉजी) मिलती हैं। एक अपु-त्रयी ('पथेर पांचाली', 'अपराजितो', 'अपुर संसार') और दूसरी कलकत्ता-त्रयी ('प्रतिद्वंद्वी', 'सीमाबद्ध', 'जन-अरण्य')। पहली सत्यजित ने तब बनाई थी, जब वे एमैच्योर फ़िल्मकार थे, नए-नए ही आए थे। दूसरी तब बनाई, जब स्थापित हो चुके थे। पहली त्रयी स्वत:स्फूर्त है, दूसरी आरोपित है। लेखक की स्थापना इस पुस्तक में यह है कि सत्यजित का जो सर्वश्रेष्ठ काम है, वह तब है, जब वे एक आत्योर मास्टर के बजाय एक एमैच्योर फ़िल्मकार के रूप में काम कर रहे थे, आत्मचेतस् नहीं थे, कृति के हर आयाम यथा वेशभूषा, संगीत, पटकथा आदि में हस्तक्षेप नहीं करते थे। और उनके यहाँ जितनी सुन्दरता से लिरिकल रियलिज़्म आता है, वैसे सोशल रियलिज़्म नहीं आने पाता है, क्योंकि वह उनके यहाँ आरोपित है, ऐतिहासिक दबावों के आधार पर व्युत्पन्न है। यह पुस्तक सत्यजित राय के सिनेमा में त्रयी और उत्तरत्रयी के द्वैत और सह-अस्तित्व का विवेचन है। इसमें सत्यजित के सिनेमा में समय, स्पेस, संगीत, मृत्यु, इतिहास और देशकाल पर भी यथेष्ट संवाद किया गया है।
Khushkhat maine padhi hai jisme 90a aw related kaphi achhi achhi kahaniyan hain . 90a me bahut jyada vikalp nahi the na amiron ke pas aur na garibon ke pas .koi bahut jyada amir ya bahut jyada garib koi nahi tha .