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Tooti Hui Bhikhari Hui । टूटी हुई बिखरी हुई
मुझे हमेशा से लगता रहा था कि जीवन में व्यस्त रहना सबसे मूर्खता का काम है। इस जीवन को मैं जितनी चालाकी से जी सकता था, जी रहा था। कम-से-कम काम करके ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त ख़ाली रहना मेरे जीने का उद्देश्य था। मैं कुछ न करते वक़्त सबसे ज़्यादा सम पर रहता था। सुरक्षित जीवन की कल्पना में काम करते-करते एक दिन मैं मर नहीं जाना चाहता था। मैं किसी भी तरह की मक्कारी पर उतर सकता था अगर मुझे पता चले कि मेरे दिन बस काम की व्यस्तता में बीतते चले जा रहे हैं।
~इसी किताब से
~इसी किताब से
256 pages, Paperback
Published August 1, 2023
About the author
Manav Kaul
36 books444 followersकश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
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Community Reviews
Displaying 1 - 17 of 17 reviews
September 7, 2023
कौल के पात्रों का आपस में गुँथा हुआ एक छोटा सा सँसार जिसकी जड़ें आपस में हम सब के भीतरी, निजी कमरों में बहुत दूर तक फैली हुई हैं... हम अपने अपने कमरे की खिड़की से कौन सा सँसार और कौन सा आसमान देखते हैं? और उसमें उनका क्या जो एक दिन सच में उसी आसमान में उड़कर गायब हो जाते हैं। और कुछ जो नहीं उड़ पाते।
इस सब में एक दिन बहुत सहजता से एक दूसरे का नाम ले लेने का सुख बहुत सुंदर है।
इस सब में एक दिन बहुत सहजता से एक दूसरे का नाम ले लेने का सुख बहुत सुंदर है।
December 30, 2023
⭐⭐⭐⭐ (4/5)
This was a tough read. I was looking forward to an ending which would have been more satisfying. But instead, this ending was actually closer to reality. It felt as if this story is more like a never ending journey. It's going to continue on and on and on - hopefully not. Quite a sensitive story handled such delicately by Manav Kaul. Always in awe of his words and understanding of reality.
This was a tough read. I was looking forward to an ending which would have been more satisfying. But instead, this ending was actually closer to reality. It felt as if this story is more like a never ending journey. It's going to continue on and on and on - hopefully not. Quite a sensitive story handled such delicately by Manav Kaul. Always in awe of his words and understanding of reality.
October 2, 2023
"जब कहानी के किरदारों का छुआ आप महसूस करने लगें, जब उनकी सिहरन आपके रोंगटों में दिखने लगे तब समझ लेना आपने कुछ अद्वितीय पढ़ लिया है।"
मानव कॉल को पढ़ना एक बेहद जोख़िम का काम है। एक बेतरतीब जंगल में भटक जाने जैसा।
ऐसा भटकना जिसका इंतज़ार, हम अपने आप से छुपकर बारहा करते रहते हैं। और "टूटी हुई बिखरी हुई" है एक दर्पण। आप नग्न होकर जिसके सामने खड़े हैं। पहले तो नग्नता असहज करती है, फिर खुद अपना अक्स!
क्या त्रासदी है! हम खुद को ही देखते हुए असहज हुऐ फिरते हैं। और फूहड़ता तो यह कि हम कभी पेट अंदर खींचकर, तो कभी बाल सही जमाकर खुद को देखते हैं। हम एकांत में भी वो रहना चाहते हैं जो हम भीड़ में हैं।
यह क़िताब हम सबकी ज़रूरत है। मेरा मतलब सिर्फ इतना नहीं कि इससे Sappho और LGBTQ पर हमारी समझ विकसित होती है अपितु खुद को समझने की सहजता भी विकसित होती है।
"टूटी हुई बिखरी हुई" सिर्फ़ एक कहानी नहीं है यह एक नक्शा भी है हम सबके लिए। हमें और जानने -समझने कहाँ जाना है, इसके दिशानिर्देश कहानी की बनावट में ही निहित हैं। कहानी हमें बताती चलती है "Well of Loneliness", "Orlando", "After Sappho", "लिहाफ़" के बारे में। यह बहुत ज़रूरी था। शुक्रिया मानव!
मानव को पढ़ने में एक ख़तरा ये भी कि जितना आप उन्हें पढ़ते हैं उतना ही उनके नज़दीक होते जाते हैं। यह ख़तरा इसलिए है कि जितने आप मानव के पास होंगे, उतना ही खुद के भी। इस निकटता की हमें आदत नहीं होती।
शब्दों से मन के कैनवास पर रंगसाज़ी करने की जो शक्ति मानव के पास है, वह बिरलों को ही प्राप्त है। एक अजीब आकर्षण है ऐसे लेखन का, जो समझ से परे है। ना तो बड़े-बड़े शब्दों की लयात्मकता-संगीतात्मकता की डोरी ही है, ना कहानी कहने का सदियों से चला आता, सिद्ध ढांचा! पर कुछ खास है। कोई जादुई शक्ति जिसे मन में उतारने का रास्ता पता है। वह इंतजार नहीं करती दरवाजे खुलने का। ना मन की दीवारों को टटोलती है, जैसे अंधेरे में कोई दरवाज़े तक पहुंचाने की जद्दोजेहद कर रहा हो। उसे पता है कोई दिव्य चोर रास्ता, वह नहीं करती प्रतीक्षा, बस घुस जाती है, बेधड़क!
एक पुरुष का इस विषय पर लिखना शायद बहुतों को नांगवारा लगे। "आप कैसे समझेंगे" या "सांत्वना का साहित्य" जैसी बातें भी हो सकता है लोग बनाएं किंतु असलियत तो यह है कि एक पुरुष का इस विषय पर लिखना पूर्णत: नैसर्गिक है और ज़रूरी भी। मानव अपने लिखे में ऐसे ही पूर्वाग्रहों और चश्मों की तो बात करते हैं जो हमने धीरे-धीरे अपनी आंखों पर चढ़ा लिए हैं।
मानव कॉल को पढ़ना एक बेहद जोख़िम का काम है। एक बेतरतीब जंगल में भटक जाने जैसा।
ऐसा भटकना जिसका इंतज़ार, हम अपने आप से छुपकर बारहा करते रहते हैं। और "टूटी हुई बिखरी हुई" है एक दर्पण। आप नग्न होकर जिसके सामने खड़े हैं। पहले तो नग्नता असहज करती है, फिर खुद अपना अक्स!
क्या त्रासदी है! हम खुद को ही देखते हुए असहज हुऐ फिरते हैं। और फूहड़ता तो यह कि हम कभी पेट अंदर खींचकर, तो कभी बाल सही जमाकर खुद को देखते हैं। हम एकांत में भी वो रहना चाहते हैं जो हम भीड़ में हैं।
यह क़िताब हम सबकी ज़रूरत है। मेरा मतलब सिर्फ इतना नहीं कि इससे Sappho और LGBTQ पर हमारी समझ विकसित होती है अपितु खुद को समझने की सहजता भी विकसित होती है।
"टूटी हुई बिखरी हुई" सिर्फ़ एक कहानी नहीं है यह एक नक्शा भी है हम सबके लिए। हमें और जानने -समझने कहाँ जाना है, इसके दिशानिर्देश कहानी की बनावट में ही निहित हैं। कहानी हमें बताती चलती है "Well of Loneliness", "Orlando", "After Sappho", "लिहाफ़" के बारे में। यह बहुत ज़रूरी था। शुक्रिया मानव!
मानव को पढ़ने में एक ख़तरा ये भी कि जितना आप उन्हें पढ़ते हैं उतना ही उनके नज़दीक होते जाते हैं। यह ख़तरा इसलिए है कि जितने आप मानव के पास होंगे, उतना ही खुद के भी। इस निकटता की हमें आदत नहीं होती।
शब्दों से मन के कैनवास पर रंगसाज़ी करने की जो शक्ति मानव के पास है, वह बिरलों को ही प्राप्त है। एक अजीब आकर्षण है ऐसे लेखन का, जो समझ से परे है। ना तो बड़े-बड़े शब्दों की लयात्मकता-संगीतात्मकता की डोरी ही है, ना कहानी कहने का सदियों से चला आता, सिद्ध ढांचा! पर कुछ खास है। कोई जादुई शक्ति जिसे मन में उतारने का रास्ता पता है। वह इंतजार नहीं करती दरवाजे खुलने का। ना मन की दीवारों को टटोलती है, जैसे अंधेरे में कोई दरवाज़े तक पहुंचाने की जद्दोजेहद कर रहा हो। उसे पता है कोई दिव्य चोर रास्ता, वह नहीं करती प्रतीक्षा, बस घुस जाती है, बेधड़क!
एक पुरुष का इस विषय पर लिखना शायद बहुतों को नांगवारा लगे। "आप कैसे समझेंगे" या "सांत्वना का साहित्य" जैसी बातें भी हो सकता है लोग बनाएं किंतु असलियत तो यह है कि एक पुरुष का इस विषय पर लिखना पूर्णत: नैसर्गिक है और ज़रूरी भी। मानव अपने लिखे में ऐसे ही पूर्वाग्रहों और चश्मों की तो बात करते हैं जो हमने धीरे-धीरे अपनी आंखों पर चढ़ा लिए हैं।
September 7, 2023
इस किताब की सबसे ख़ास बात ये है की ये एक पुरुष ने लिखी है
March 1, 2026
मानव कौल जी की लेखनी की प्रशंसा में इतना ही कह सकते हैं कि उनकी कहानियों को हम सिर्फ पढ़ते ही नहीं, बल्कि जीते हैं। उनकी किताब पढ़ते वक्त उन सभी किरदारों की आकांक्षाएं, उनके सपने, उनकी विडंबना, उनका विस्मय, उनकी पीड़ा, सब कुछ अपने अंदर समेट लेते हैं। कहते हैं कि अपनी किताबें, संगीत और ख़ामोशी जिसके साथ बेझिझक बांट सको, समझो वही प्रेम है। मानव कौल जी का चौथा उपन्यास "टूटी हुई बिखरी हुई" एक ऐसी ही प्रेम कहानी पर आधारित है, जिसमें क़िरदार आपस ने किताबें साझा करते हैं। उसपर बात करते हैं। बात ऐसे मुद्दों पर जिन पर बात होनी चाहिए। बात करने से ही हम किसी और का दृष्टिकोण समझ सकते हैं और अपना नज़रिया रख सकते हैं। किताब में व्यक्त है एक ऐसा प्रेम जो इस समाज की नज़र में प्रेम है ही नहीं। ऐसी प्रेम कहानी जो बीच में ही अचानक खत्म हो जाती है। वो एक किस्म की टीस पैदा करती है। ऐसी कहानी जिससे ये बतलाने की कोशिश की गई है कि ऐसा कुछ हो जाए कि ये दुनिया फिर से शुरू हो और वो शुरुआत में ही ये समझ जाए कि आपसी प्रेम से कोई नुकसान नहीं होता है। वो इस दुनिया को और खूबसूरत बनाता है, चाहे फिर वह प्रेम दो पुरुषों में हो या दो महिलाओं में, उससे क्या फर्क पड़ता है! रूढ़ियों में लिप्त इस समाज में ऐसी दो महिलाओं के आपसी प्रेम, उनके सामाजिक व्यवहार और उनके निजी जीवन पर आधारित है ये किताब। मानव कौल की किताबें इसलिए भी लोकप्रिय है क्योंकि वो भावनाओं को गहराई से समझते है, अलग- अलग विषयों पर लिखते हैं और उनके द्वारा प्रयोग किए जाने वाले रूपक पाठक को एक अलग नजरिए से सोचने के लिए प्रेरित करता है। मानव कौल जी की किताबों के पहले पन्ने पर लिखे एक छोटे से संदेश से मन में किताब को शुरू करने का जो उत्साह उत्पन्न होता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। ऐसा लगता है वो व्यक्तिगत रूप से अपने प्रत्येक पाठक दोस्त से मिलकर अपनी पुस्तक साझा कर रहे हैं।
March 27, 2026
beautiful exploration of releasing our true selves, suppressed under societal expectations, especially in the context of sex and sexuality.
would have preferred an ending where yash actually took the initiative to resolve things / face renu. but good writing. you can tell its written by somebody who does theatre because its so dramatic, visually choreographed, and evocative.
would have preferred an ending where yash actually took the initiative to resolve things / face renu. but good writing. you can tell its written by somebody who does theatre because its so dramatic, visually choreographed, and evocative.
October 12, 2023
टूटी हुई बिखरी हुई – मानव कॉल
प्रकाशन- 2023
पृष्ठ- 252
प्रकाशक- हिन्द युग्म @hind.yugm
श्रेणी- उपन्यास
चरित्र- यश, रेणु, राजुला, रागनी, जीवन, धुन, शिखा, धीरू, जाह्नवी मैडम, धीरज, धीरज की माँ, स्वांत सुखाय (टेडी बियर)
इस उपन्यास के 147वे पन्ने पर रागिनी यश से कहती है “तुम्हारी माँ की कहानी में भी नायक तुम ही हो जबकि लड़ाई उनकी है” और ये पढ़ते ही इस बात पर रुकना होता है कि यश और रेणु की कहानी में जब कहानी रेणु और राजुला की है तो मुख्य किरदार कौन है। जिसकी कहानी है अगर वो इस कहानी का मुख्य किरदार है तो ये कहानी है यश की माँ की, धुन की, रेणु की, राजुला की और उन सभी की जो रेणु है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे मेरे एक दोस्त की याद आई जिसने मुझे Call Me by Your Name और Blue is the warmest color की याद आई। इस किताब में “The Well Of Loneliness, Orlando और After Sappho” का ज़िक्र काफी strong पिलर की तरह है। मैं ये तीनों किताबें पढने के बाद इस किताब के हर पन्ने को शायद फिर से पढूं। तब इस किताब की गहराई को और अछे से समझ पाऊं। लेकिन तबतक इस किताब की ये बातें जीवन में गहरे रहेंगी।
“जब दो लोगों के बीच बहुत गहरा संबंध होता है तो वो कुछ वक़्त बाद एक-दुसरे के जैसे दिखने लगते हैं”
“अधिकतर लोग करते हैं, वे एक कहानी बनाते हैं जिसमें वे कह सकें कि वे भी जानते हैं हमारे संघर्ष को”।
“झूठ को चिल्लाना पड़ता है जबकि सच को कोमलता से कहा जा सकता है।“
प्रकाशन- 2023
पृष्ठ- 252
प्रकाशक- हिन्द युग्म @hind.yugm
श्रेणी- उपन्यास
चरित्र- यश, रेणु, राजुला, रागनी, जीवन, धुन, शिखा, धीरू, जाह्नवी मैडम, धीरज, धीरज की माँ, स्वांत सुखाय (टेडी बियर)
इस उपन्यास के 147वे पन्ने पर रागिनी यश से कहती है “तुम्हारी माँ की कहानी में भी नायक तुम ही हो जबकि लड़ाई उनकी है” और ये पढ़ते ही इस बात पर रुकना होता है कि यश और रेणु की कहानी में जब कहानी रेणु और राजुला की है तो मुख्य किरदार कौन है। जिसकी कहानी है अगर वो इस कहानी का मुख्य किरदार है तो ये कहानी है यश की माँ की, धुन की, रेणु की, राजुला की और उन सभी की जो रेणु है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे मेरे एक दोस्त की याद आई जिसने मुझे Call Me by Your Name और Blue is the warmest color की याद आई। इस किताब में “The Well Of Loneliness, Orlando और After Sappho” का ज़िक्र काफी strong पिलर की तरह है। मैं ये तीनों किताबें पढने के बाद इस किताब के हर पन्ने को शायद फिर से पढूं। तब इस किताब की गहराई को और अछे से समझ पाऊं। लेकिन तबतक इस किताब की ये बातें जीवन में गहरे रहेंगी।
“जब दो लोगों के बीच बहुत गहरा संबंध होता है तो वो कुछ वक़्त बाद एक-दुसरे के जैसे दिखने लगते हैं”
“अधिकतर लोग करते हैं, वे एक कहानी बनाते हैं जिसमें वे कह सकें कि वे भी जानते हैं हमारे संघर्ष को”।
“झूठ को चिल्लाना पड़ता है जबकि सच को कोमलता से कहा जा सकता है।“
June 25, 2026
"ये कहानी नहीं है, ये एक मनःस्थिति है, नंगी बातें हैं। ऐसी बातें अगर कहनी होती हैं तो उन बातों को कहानी की साज़िशों के कपड़े पहनाना ज़रूरी होता, जो कहानी के हर नंगे पहलू को ढक सके। यहाँ कुछ भी ढका-छिपा नहीं था। यहाँ सारा कुछ बस ज्यों का त्यों सामने रख दिया गया था।"
"टूटी हुई बिखरी हुई" का यश हमेशा से हक़ीक़त से भागता रहा है—चाहे वह उसकी माँ की हक़ीक़त हो या उस समाज की, जो हमारे बीच मौजूद तो है, मगर हमने उसे मानने से इंकार कर दिया है। हमने अपनी आँखें मूँद ली हैं, अपने कान बंद कर लिए हैं।
यह कहानी हमें अपनी सोच को उन चार दीवारों से बाहर ले जाने की ज़रूरत का एहसास कराती है। समाज की इन दीवारों में कम से कम एक खिड़की तो होनी चाहिए, ताकि हम झाँक सकें, देख सकें और उन सच्चाइयों को समझ सकें जिनसे हम अक्सर नज़रें चुरा लेते हैं।
मैंने यह किताब अभी-अभी समाप्त की है। लेखक ने इसे बड़ी ख़ूबसूरती से अधूरा छोड़ दिया है, ताकि हम सोचते रहें, सवाल करते रहें, या फिर इसके आख़िरी पन्नों के शब्दों से लंबे समय तक चिपके रह सकें। ❤️📖
@slow_reader210
"टूटी हुई बिखरी हुई" का यश हमेशा से हक़ीक़त से भागता रहा है—चाहे वह उसकी माँ की हक़ीक़त हो या उस समाज की, जो हमारे बीच मौजूद तो है, मगर हमने उसे मानने से इंकार कर दिया है। हमने अपनी आँखें मूँद ली हैं, अपने कान बंद कर लिए हैं।
यह कहानी हमें अपनी सोच को उन चार दीवारों से बाहर ले जाने की ज़रूरत का एहसास कराती है। समाज की इन दीवारों में कम से कम एक खिड़की तो होनी चाहिए, ताकि हम झाँक सकें, देख सकें और उन सच्चाइयों को समझ सकें जिनसे हम अक्सर नज़रें चुरा लेते हैं।
मैंने यह किताब अभी-अभी समाप्त की है। लेखक ने इसे बड़ी ख़ूबसूरती से अधूरा छोड़ दिया है, ताकि हम सोचते रहें, सवाल करते रहें, या फिर इसके आख़िरी पन्नों के शब्दों से लंबे समय तक चिपके रह सकें। ❤️📖
@slow_reader210
January 4, 2024
Manav Kaul is an all-time favourite of mine and there is no doubt about it. I have bought all of his books but truthfully speaking I only read his books in parts. It gives me a sense of satisfaction.
I know it's a Hindi book and the review should be in Hindi but I can better analyze it in English. A stunner in this book is what I should say. And I started this book in 2024 and what a beginning it has provided to my year.
An extremely good read. The characters are so vibrant yet simple. Renu, rajula, Yash, dhun, Ragini, Jiban....everyone has shades in their characteristics. Frankly speaking I have read the book slowly just to enjoy the lines, the emotions and everything else. Somehow eccentric it might seem while reading because the relationship between Rajula and renu might make you question or love them. It's different for everyone. But I thoroughly enjoyed this book
I know it's a Hindi book and the review should be in Hindi but I can better analyze it in English. A stunner in this book is what I should say. And I started this book in 2024 and what a beginning it has provided to my year.
An extremely good read. The characters are so vibrant yet simple. Renu, rajula, Yash, dhun, Ragini, Jiban....everyone has shades in their characteristics. Frankly speaking I have read the book slowly just to enjoy the lines, the emotions and everything else. Somehow eccentric it might seem while reading because the relationship between Rajula and renu might make you question or love them. It's different for everyone. But I thoroughly enjoyed this book
March 25, 2025
इसे पढ़ते वक़्त मन में खजुराहो में ली हुई कुछ तस्वीरें साजा हुईं। मुझे याद है बहुत गर्व महसूस हुआ था उन मंदिरों को देखते हुए। निश्चित रूप से हमारा समाज उस दौर में यौन शिक्षा का प्रतिनिधि रहा होगा। योग और संभोग दोनो के बारे में खुलकर बात कर रहा होगा। आज इस किताब को पढ़ कर तुरंत गूगल पर erotica शब्द के हिन्दी मानी खोजे…सबसे नज़दीकी शब्द मिलतें हैं “प्रेमकाव्य” और “अश्लील साहित्य”। अब जब शब्दों कि कमी है तब साहित्य तो लिखा जाने से रहा।@manavkaul19 ने समलैंगिकता और अकेलेपन को काव्यात्मक रूप से गढ़ा है। पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक कोई कोहरे से गुज़र रहा है। एक पुरुष लेखक के लिए क़तई आसान नहीं है महिला केंद्रित साहित्य लिखना और वह भी lesbianism जैसे कोमल विषय पर। जरा सी चूक उसको भद्दा बना सकती थी पर लगता है मानव की अपनी संवेदनशीलता ने इस किताब को एक तरफ़ा होने से बचाया ही नहीं पूरा न्याय दिया है। यह किताब हिंदी साहित्य की टैक्सी ड्राइवर (Martin Scorsese’s movie) है ।
June 8, 2026
"टूटी हुई, बिखरी हुई" एक ऐसा ही उपन्यास है जिसमें एक के अंदर कई कहानियाँ हैं, टूटी हुई, बिखरी हुई।
मानव कौल के लिखे में हर बार कुछ अलग मिल जाता है, और वो अपने लिखे में हमेशा अपनी प्रेरणा भी बतला देते हैं। यह उपन्यास उनकी हर रचना से अलग है और शायद Sappho की या उन पर आधारित किताबों से ही उद्गम है इस कहानी का। मुख्यतः ये किताब दो महिलाओं के समलैंगिक संबंधों पर बात करती है और कई जगह असहज करने वाली है। शुरुआत में मुझे यह erotica लगी पर कहानी का असर आप पर अलग ढंग से होता है। सभी किरदारों की अलग पहचान आप देख सकते हैं और महसूस भी कर सकते हैं।
इसका अंत कहानी के कई सिरे खुले छोड़ जाता है, शायद इस तरह का अंत ही लेखक का चुनाव हो ताकि पाठक अपने ढंग से उस गुत्थी को सुलझाए पर मुझे वो कमी लगी इस कहानी में।
हालांकि यह उपन्यास फिर भी पढ़ने लायक है, कुछ को अच्छी लग सकती है, कुछ को नहीं भी।
मानव कौल के लिखे में हर बार कुछ अलग मिल जाता है, और वो अपने लिखे में हमेशा अपनी प्रेरणा भी बतला देते हैं। यह उपन्यास उनकी हर रचना से अलग है और शायद Sappho की या उन पर आधारित किताबों से ही उद्गम है इस कहानी का। मुख्यतः ये किताब दो महिलाओं के समलैंगिक संबंधों पर बात करती है और कई जगह असहज करने वाली है। शुरुआत में मुझे यह erotica लगी पर कहानी का असर आप पर अलग ढंग से होता है। सभी किरदारों की अलग पहचान आप देख सकते हैं और महसूस भी कर सकते हैं।
इसका अंत कहानी के कई सिरे खुले छोड़ जाता है, शायद इस तरह का अंत ही लेखक का चुनाव हो ताकि पाठक अपने ढंग से उस गुत्थी को सुलझाए पर मुझे वो कमी लगी इस कहानी में।
हालांकि यह उपन्यास फिर भी पढ़ने लायक है, कुछ को अच्छी लग सकती है, कुछ को नहीं भी।
January 7, 2024
Manav Kaul is waqt ke un chuninda lekhakoñ meiñ se ek haiñ jinheiñ padhna apne aap meiñ saubhagya ki baat hai. Jis tarah se ye kahani striyoñ ki samajik swatantra ko chhookar jaati hai us tarah se ise likh pana behad hi mushkil hai. Aur sabse mahtavpurna kirdaar Yash jo ek nayak na hote hue bhi is kahani ke sabhi kirdaaroñ ke kendra meiñ joojhta hua ant meiñ ek naya jeevan chunta hai! Ye upanyas sabhi ko padhna chahiye!
November 3, 2024
I have very mixed feelings after reading this book. It isn't easy for me to understand the perspective when a male lens presents such a complex female perspective. My mind always doubts the authenticity of the perspective.
वैसे तो मुझे मानव कॉल का लिखा बहुत पसंद आता है और ये लिखा भी पसंद तो आया है पर फिर भी खुछ ऐसा था जो मुझे पसंद नहीं आया क्योंकि सायद वो लिखा मुझे समझ ही नहीं आया
वैसे तो मुझे मानव कॉल का लिखा बहुत पसंद आता है और ये लिखा भी पसंद तो आया है पर फिर भी खुछ ऐसा था जो मुझे पसंद नहीं आया क्योंकि सायद वो लिखा मुझे समझ ही नहीं आया
January 10, 2024
एक समूचा फलक जिससे हम मूलतः अनजान हैं, और जो समझ आता है महज एक अनुमान है जहां हम स्वयं नायक बना लेते हैं स्वयं को।
Interesting read
Interesting read
December 3, 2024
Renu and Rajula what irony is ... actually society pressure and what beautifully Manav g pen down there lifes struggle...
July 20, 2025
Very much predictable if you are a regular Manav kaul reader.
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