कभी आपने गीता में कृष्ण की आवाज़ को ध्या न से सुना हो तो वे ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भ लानिर्भवति ’ की बात करते हैं। धर्म की ग्लानि की। ग्लानि अपनी गि रेबान में झांकने पर होती है। उसकी नोक भीतर की ओर मुड़ी रहती है। निष्ठा हो तो सावि त्री की तरह जिसने कहा था: धर्मार्ज र्मार्जर्मार्ज ने सुरश्रेष्ठरेष्ठ कुतो ग्लानि क्ल मस्त था। कि धर्म के अर्ज न में कौनसी ग्लानि और कैसा कष्ट।लेकि न धर्मार्ज र्मार्जर्मार्ज न कि समें है, कई बार यह आत्म -समीक्षा कर ही लेना चाहिए। जो लोग रुद्र के प्रकट होने पर भाग खड़े हों, वे रुद्राक्ष के लि ए बड़े पगलाये दि खते हैं। रुद्र को देखने की आँख ही रुद्राक्ष है। रुद्र+अक्ष । यों तो लूथर के समय चर्च र्च के प्री स्ट स्वर्ग के टि कट भी बेचा करते थे। मुफ़्त ख़ो री सि खाने वाले घोषणापत्र और योजनाएँ यदि गर्हि र्हित हैं, तो ये मुफ़्त वि तरण भी अध्या त्म में राजनीति की कॉपी का कार्ब र्बन ही हैं। इसलि ए लक्ष्य से भटक जाना ग्लानि का भाव पैदा करता है। स्वय ं के तप के बि ना उद्धा र नहीं है। लेकि न यदि क्रांति ्रांति्रांति ही करनी हो तो हमारा ऐति हासि क अनुभव यह है कि वह रोटी और कमल गॉव पहुँचाकर हो जाती है। यानी एक वि केंद्री कृत सामूहिकता में। और यह भी ध्या न रखें कि ग्लानि धर्म को ही होती है, रिल ीजन या मज़हब को नहीं। रामचंद शुक्ल ने कभी कहा था : अपनी बुराई, मूर्ख र्खता, तुच्छता इत्यादि पर एकान्त अनुभव करने से वृत् तियों में जो शैथि ल्य आता है, उसे ग्लानि कहते हैं। उसे अधि कतर उन लोगों को भोगना पड़ ता है जिनका अन्तःकरण सत्त्व -प्रधान होता है, जिनके संस्का र सात् त्वि क होते हैं जिनके भाव उदार होते हैं। (चि ंतामणि , भाग १, लज्जा और ग्लानि ) इसलि ए कृष्ण ने धर्म की संस्था पना के लि ए अंतरावलोकन को महत्व दिय ा था ।