तन-मन को बर्बादी देकर. धन को देती दीवाला मेरी भारत मातृ-भूमि से हो मदिरा का मुँह काल मधुशाला परिवर्तित होकर, शिशु शाला का ले-ले रूप साकी बाला भी बन जाये, किसी व्यथित की मधुबाला ।। -"व्यथित" सुरा श्रौर सुन्दरी दो तथ्य है। उर्दू के प्रसिध्द हालावादी शायर उमर खय्याम की रूबाइयों से प्रेरणा लेकर महाकवि बच्चन ने सूफी खयालों में ‘मधुशाला‘ काव्य की रचना कर इश्क-मजाजी एवं इश्क-हकीकी का प्याला पाठकों को पिलाया है। सुरा पर लिखी हुई यह काव्य-रचना -हाला, प्याला, मधुशाला तीन प्रतीकों की पुनरावृति को लेकर एक श्रद्वितीय रचना है। इसी प्रकार मैंने भी चैथा प्रतीक ‘मधुबाला‘ जोड़कर इसी छंदमाला में सुरा और सुन्दरी पर ‘‘