"कहानी को कहने का अन्दाज हर व्यक्ति का जुदा होता है। तोषप्रद तरीके से लिखी कथा पाठकों की पहली पसन्द होती है। इसलिए सरल भाषा में लिखी कहानियों के लेखक प्रारम्भ से ही लोकप्रिय रहे हैं। इसी श्रेणी में मौमिता बागची भी हैं। यह मेरा सौभाग्य है, मुझे मौमिता बागची की कहानी संग्रह ""चतुष्कोण"" पर अपने मन की बात कहने का सुअवसर प्राप्त हुआ।संग्रह की पहली कहानी ""पितृ परिचय"" दिल को झिंझोड़ती हुई कई प्रश्न करती है। क्या रिश्ते अपनी पहचान खो चुके हैं? रिश्तों की आड़ में पिता चाहे सौतेला हो, मर्यादा खो बैठता है। एक मार्मिक कहानी का सकारात्मक अंत समाज में फैली बुराई को सरल तरीके से उजागर करने के पश्चात उसका समाधान भी बताता है। जो हुआ बुरा हुआ परन्तु हमें हर समस्या को सामना करते हुए सिर उठा कर गर्व से जीना है। एक मार्मिक कहानी अन्त में प्रेरणा देती है। ज्वलंत और नाजुक विषय को सरलता से कहना ही इस कहानी की खूबी है. दूसरी कहानी ""मन्नत"" है। आखिर वह कौन थी! जिसके लिए आभा माँ के द्वार मन्नत माँगने गई लेकिन माँग नहीं सकी। परन्तु माँ तो सबके दिल का हाल जानती हैं, द्वार आए भक्त को कैसे खाली हाथ भेज सकती है। हाँ कभी-कभी देर हो सकती है। इस बार माँ प्रसन्न है, किसी और के लिए माँगी दुआ फौरन कबूल होती है और उसकी चाहत भी वर्षों बाद मिलती है। एक अनजान रेखा को आश्रय देना और उसके हक की लड़ाई में आभा का अतीत से वर्तमान का वर्णन लेखक मौमिता की दक्षता का प्रमाण है।