एक समय श्री गोस्वामी तुलसीदास जी के शरीर कुरोग उत्पन्न हुआ और उन्हे असहनीय पीड़ा हुई। तुलसीदास जी ने बहुत उपचार किये, परन्तु पीड़ा मिटाने में वे सफल न हुए। रोग कालकृत हे, कलिकृत है, देवकृत है भूतप्रेतादिकृत है, खलकृत है पता नहीं चल पा रहा था। अत: उन्होंने श्री हनुमान जी से रोग-निवृत्ती के लिये प्रार्थना की। सारा कुरोग श्री हनुमान जी कि कृपा से नष्ट हो गया। रोग से मुक्त हो जाने पर श्री तुलसीदास जी ने अपनी की हुई प्रार्थना को रचा और हनुमान बाहुक नाम रखा। जिस हनुमान बाहुक पाठ से समस्त बाधाओ से मुक्ति मिलती है, वही हनुमान बाहुक यहां पुरातन तरीके से पद्य, हिन्दी अर्थ एवं टिप्पडी सहित दिया गया है। हनुमान बाहुक के प्रत्येक पद्य का विशेष प्रभाव है।