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पतझड़ [Patjhad]

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मैं बस ये कहना चाह रहा था कि अगर मैं किताब नहीं पढ़ता, अगर मैं इन दोनों जगहों पर नहीं जाता तो शायद मैं पिछली बार की तरह यूँ ही, पूरे म्यूज़ियम से टहलते हुए बाहर निकल आता। पहली बार उनके चित्रों के रंग मुझे अपनी तरफ़ खींच रहे थे, उनके ब्रश स्ट्रोक- अकेलापन, पीड़ा, प्रेम सारे कुछ से सने हुए थे। उनकी हर तस्वीर, तस्वीर बनाने की प्रक्रिया भी साथ लेकर चलती है। मैं उनकी पेंटिंग Weeping Nude के सामने जाने कितनी देर खड़ा रहा! मैं Munch के सारे रंगों को जानता था, वो मेरे जीवन के रंग थे, वो मेरे अकेलेपन, कमीनेपन के रंग थे, अगर कोई पूछे कि गहरी उदासी कैसी होती है तो मैं Munch की किसी पेंटिंग की तरफ़ ही इशारा करूँगा।
-इसी उपन्यास से

240 pages, Paperback

Published November 23, 2023

32 people are currently reading
281 people want to read

About the author

Manav Kaul

32 books404 followers
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।

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5 stars
70 (53%)
4 stars
42 (31%)
3 stars
15 (11%)
2 stars
2 (1%)
1 star
3 (2%)
Displaying 1 - 29 of 29 reviews
Profile Image for Shubham.
16 reviews1 follower
December 24, 2023
"क्या हम कभी वो लिख पाते हैं जो हमने असल में महसूस किया था? मुझे हमेशा ये दिक्कत सुंदरता से होती है, जब मैं कभी बहुत ही खूबसूरत दृश्य के सामने खड़ा रहता हूँ तो मेरे भीतर उसे जज़्ब करने की जगह नहीं होती, मैं बहुत देर तक समझ भी नहीं पाता हूँ कि मैं क्या करूँ इस सुंदरता का! फिर जब उसे लिखने बैठता हूँ तो वाक्य इतने बचकाने निकाल रहे होते हैं कि वो मुझे उस सुंदर दृश्य से और दूर ले जाते हैं।"
(तितली)

2021 दिसंबर की एक ठंडी सुबह से शुरू हुई मानव की (बहुत दूर कितना दूर होता है) पहली यात्रा वृत्तान्त से 2023 दिसंबर में इस यात्रा वृत्तान्त (पतझड़) को खत्म करते हुए कितना सुंदर अनुभव हो रहा है यह मेरे लिए ठीक वैसा ही है जैसा शायद बंटी और सलीम को हर दोपहर हवाई जहाज को देख कर लगता होगा।
रोहित अंतिमा को जिस तरह अपने से अलग नहीं होने देना चाहता था वैसे ही मैं अपनी पसंदीदा किताबों के साथ तुरंत पढ़ने और खत्म न होने देने का बचकाना खेल करते हुए खुद को देख रहा हूँ।
मानव के लिखे में मैंने अपनी पसंदीदा किताबों को पाया जिनको पढ़ना मैं काफी समय से रोकता आया था। ये भी एक अलग तरह की दोस्ती है ! हर कहानी का किरदार मुझे अपने आस पास बिखर हुआ दिख रहा था बस समेटने भर की देर थी, चाहे वह बंटी और सलीम के गाँव की पुलिया हो, रोहित को पसंद आती दालचीनी की खुशबू, या ऋषभ को Munch के चित्रों में दिखती पीड़ा और अकेलापन।

शर्ट का तीसरा बटन पढ़ने से पहले चित्रलेखा और Crime and Punishment पढ़ना सबसे करीबी वाकया रहा, Dostoevsky को पढ़ने का इंतज़ार सच में बहुत लंबे समय से कर रहा था और पढ़ने के बाद लगा क्यूँ किया ये मैंने? ये तो सभी को पढ़ना चाहिए ! लेकिन ये तो मेरा अनुभव था जो मैं ढूंढ रहा था Raskolnikov के विचारों में। Crime and Punishment पढ़ते हुए लगा कि Raskolnikov का Petersburg की अंधेरी गलियों में भटकना और अपने भीतर के अंधेरे से बाहर निकलने की कोशिश करना ये तो मेरे साथ भी हो चुका है। बड़ी त्रासदी के इंतज़ार में छोटी त्रासदियों को मैं भी तो तुच्छ मान रहा था।

मानव ने जिस तरह पूरे प्रेम से निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, कामू , नाया जैसे लेखकों के बारे में लिखा, वही यात्रा मैं भी उनकी किताबों के साथ शुरू कर चुका था। एक अलग पागलपन के साथ मैं इन सभी लेखकों को अपने पढ़ने में शामिल करता गया। जैसे मानव अपने प्रिय लेखकों के साथ होने की कल्पना करते हैं, मैं मानव के साथ अपनी मुलाकात के, अपनी बातचीत के सपने बुन रहा था।
"कहानियाँ ही हैं जिनके माध्यम से एक-दूसरे को गले लगाया जा सकता है। कहानियों में ही माफ़ी माँगने और माफ़ कर देने के हुनर छुपा हुआ है।"
(रूह)

मानव खुद कहते हैं "यात्रा वृत्तान्त लिखने का यह भी एक मकसद था कि यह यात्रा बँट जाए सबमें और मेरे पास इसका सबसे काम हिस्सा रह यात्रा बँट जाए सबमें और मेरे पास इसका सबसे काम हिस्सा रह जाए।" सो मैंने भी एक छोटा सा टुकड़ा अपने पास सहेज कर रख लिया है। मुलाकात जब होगी तो कुछ बाते होंगी शायद, इसी इंतज़ार में….
आपका दोस्त
Profile Image for Harshita Pandey.
43 reviews
December 19, 2023
कौल का सबसे सुंदर काम। ऋषभ की यात्रा कब इतनी निजी हो जाती है तुम्हारे लिए कि तुम उसके साथ चलते चलते अपने साथ चलने लगते हो, अपने एकांत में.. अपनी उलझनों की गिट्टियों से खेलते हुए.. बचपन की धूप और उसूलों को याद करते हुए। यात्रा के भीतर इतनी सारी यात्राओं का चमकता हुआ संसार। हर मोड़ पर भीतर कुछ रेशा रेशा सुलझता है और टूट जाता है। तुम हलके होते जाते हो। हलके और साफ़।

अंत में तुम वह नहीं रहते जिसने यात्रा शुरू करी थी या वह कोई और था, और तुम खुद को यात्रा के अंत में पाते हो? सवाल का जवाब जो भी हो, यह तय है कि तुम्हारा नाम बदल चुका होता है। 🦋
Profile Image for A.
189 reviews
March 22, 2024

हिन्दी किताबों का review हिन्दी में होना चाहिए, नहीं? :)

कोशिश करती हूँ, कोई भूल हो तो माफ़ कीजिये।

मानव कौल की एक बहुत खूबसूरत कला है, कहानी बना देना ऐसे जज़्बातों के बारे में जो हम में से कितने सारे लोग समझ भी नहीं पाते। जैसे अगर आपने ये किताब पढ़ी है तो माला की कहानी, क्या हम उस जगह तक कभी पहुँचे भी है? ख़ैर मैं तो इनके काम की तारीफ़ ही करूँगी मगर ये किताब सच में कुछ हरकत कर देती है आपके दिल में। चाहे वो सारथी की कहानी है या रिदम की, या फिर वो नेनी की बात हो, हर एक पात्र को कैसे उन्होंने ऐसे जोड़ दिया है अपने travels में की मानो ये fiction हो ही ना ।

कब वो ऋषब से सलीम और सलीम से रिदम बने, मानो हम सब साथ में इस पतझड़ को होते देख रहे हैं। एक पूरा season बदलते देख पायी हूँ मैं इस कहानी में, और ये सब पात्र मेरे साथ रहेंगे।
Profile Image for Gaurav Prince.
50 reviews
April 16, 2025
पतझड़, मानव कौल का एक और उपन्यास है, जो लगभग एक यात्रा वृत्तांत सा मालूम पड़ता है। एक बार फिर, किताब का शीर्षक जो स्वयं में ही एक भाव उत्पन्न करता है, उसका उपन्यास से काफी गहरा संबंध है।

कहानी का मुख्य किरदार ऋषभ एक सतत् यात्रा पर है जो मुख्यतः खुद की तलाश कर रहा है। इस कहानी की अच्छी बात ये थी कि ये कहानी जैसी लगती नहीं, पर सीख कई देती है। इस कहानी में मेरा सबसे पसंदीदा विवरण "कैसे हो?" प्रश्न का उत्तर था, जो पतझड़ का आश्रय लेकर काफ़ी भावपूर्ण तरीके से लिखा गया है।

कहानी का मुख्य भाग Norwegian Painter Edvard Munch और उनके कार्य से काफ़ी ज्यादा प्रभावित है। एक तरह से आप कहानी पढ़ते हुए Munch को कहानी का एक प्रमुख किरदार मानने को विवश होते हैं और साथ ही उनके जीवन के बारे में जानने का भी अवसर मिलता है।
एक आलोचना जो मानव कौल के लेखन की मैं कर सकूं तो वो ये होगी कि कभी कभी कुछ संवाद अनुवादित लगते हैं, चूंकि किरदारों से असल में बातें अंग्रेजी में हुई हों तो हो सकता है कि मानव ने अनुवादित संवाद लिखना उचित समझा हो, पर उन संवादों में वैसी भावना नहीं आ पाती जो हिंदी के संवादों में होती हैं। पर फिर भी ये किताब काफ़ी दिलचस्प है और पढ़ी जा सकती है।
28 reviews
February 23, 2025
अगर किसी को ये समझना हो की यात्रा क्यों करते है लोग, क्यों चढ़ जाते है पहाड़ों पर, क्यों किसी नदी के साथ बहना चाहते है, क्यों समुद्र के पास उमड़ते या फिर क्यों जंगलों में खो जाना चाहते है, तो हो सकता है उन्हे इन सवालों के जवाब इस उपन्यास में अवश्य मिल जायेंगे, क्युंकि लेखक ने न सिर्फ यात्रा का वर्णन किया बल्कि ये भी बताया है की यात्रा में सिर्फ गंतव्य नही बदलते उसके साथ यात्री मे भी बदलाव आता है
यात्रा से पहले इंसान खाली canvas की तरह होता है, और हर यात्रा के बाद उसमें रंग भर जाते है । ये उपन्यास यात्रा के मायने बताती है, ऋषभ जो कथावाचक है, किस तरह खुद की दुनिया के क़ैद से बाहर निकल यात्रा पर निकलता है और बताता है की जो वो खुद के बारे मे जानता है वो शायद उसके द्वारा ही बनाया हुआ मुखौटा है, जिसके बारे मे उसे खुद भी नही पता ।
पतझड़, जो की एक प्राकृतिक बदलाव का उदाहरण है, इस कहानी के औ��ित्य को सिद्ध करता है । हालाँकि इसे पढ़ते समय हर वक़्त ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये किसी english novel का हिंदी रूपांतरण है, जिससे एक दूरी जैसा अनुभव होता है, फिर भी ये जरूर पढ़ा जाना चाहिए ।।
Profile Image for Ashish Kumar.
104 reviews5 followers
December 15, 2023
ख़ुद के साथ सच्चाई से रहना कितना ज़रूरी है,कितना ज़रूरी है ख़ुद को समझना,कितना मुश्किल है ख़ुद के गिल्ट से निकालना और कितना आसान है टूटते हुए पत्तों को देख कर समझना कि पत्ते आज़ाद हुए या अलग हुए इन सब बातों के लिए पतझड़ की दुनिया में प्रवेश कर लेना चाहिए।थोड़ा ख़ुद को टटोलना आसान हो जाए शायद ।
इस पूरे पतझड़ के यात्रा के दौरान ऋषभ उन उँगलियों की तरह नज़र आता है जिसके पोर पर तितलियाँ आती है बैठती है और जब उँगलियाँ उन तितलियों को पकड़ कर छोड़ती है तो कुछ रंग ऋषभ को दे जाती है।

जो आप समझ रहे है या मान रहें हैं उसमें कितनी सच्चाई है कई बारी बहुत देर बाद समझ आती है। शायद ऋषभ भी अपनी ग़लतियों को सारथी के लिए वैसे ही मान कर गिल्ट की दुनिया में बार बार प्रवेश करता दिखता है इस पूरे पतझड़ में।
ये तो सच है वर्तमान से भूत की तुलना ख़ुशी के साथ आपको गिल्ट में भी ले जा सकती है अगर आप सच के साथ और थोड़े समझदारी से भावनाओं को समझना चाहेंगे तो फिर चाहे नोटोडन के कब्र से मैक्लॉडगंज के कब्र की तुलना करनी हो या फिर एक कैरेक्टर को दूसरे से जोड़कर सिचुएशन समझना हो सब कुछ क्लियर नज़र आने लगता है।

Profile Image for Pragyaa Jain.
102 reviews4 followers
November 23, 2024
Manav Kaul's Patjhad is one of those rare books that stays with you long after you've turned the last page. I know I’ve said this about many books, but for this one, it feels profoundly true. It’s not just a book—it’s an experience.
Books often have a calming effect on me, which is why I read so many of them. Some I pick up for the story, others for the drama or thrill. But this book was different. When I started *Patjhad*, it took me a little while to get comfortable reading Hindi again. While my Hindi is good, I hadn’t read a Hindi book in a long time. However, Manav Kaul’s writing style quickly drew me in. His words are simple yet profound, blending Hindi and English seamlessly in a way that feels natural and conversational.
The book is a tapestry of conversations, self-reflection, and travel. It’s not just a story; it’s an exploration of the human condition. Through the character of Rishabh, I found myself immersed in his world. While I’ve never experienced some of the things he went through—like being cheated on or abandoned in a relationship—I could relate deeply to his musings. His self-analysis, the way he comforts and justifies himself, and then turns around to critique himself—it all felt incredibly real.
I don’t think I’ve ever come across musings so raw and authentic. It struck me how naturally we humans oscillate between self-protection and self-sabotage. This realization made the book cathartic for me, a rare quality in literature.
This is a book for anyone who has ever felt lonely, confused, or lost in self-reflection. If you enjoy travel, introspection, or even just observing human nature, *Patjhad* will resonate with you. The language is accessible, and the flow of thoughts is so organic that it often left me feeling relaxed and thoughtless—in the best way possible.
I now count myself as a lifelong fan of Manav Kaul. His ability to capture the innate contradictions of human emotions and present them so effortlessly is remarkable. Patjhad is more than just a book—it’s a companion for those moments when you need to feel understood.
Profile Image for Amit.
3 reviews
September 12, 2024
First time reading Manav , filled with lot of introspection and love for travel and art
Profile Image for Anuprita.
41 reviews
May 4, 2024
Patjhad by Manav Kaul - So I finished this book!!! And boy!!! This author's style of writing is ❤️❤️. The story essentially revolves around finding ourselves, but the way he has opened the layers of emotions, I don't have words to express that. The way he describes the cities, artists and museums in the book stays with you even after. The pace of the book is slow but the overall treatment of the writing is also like one is strolling through their own thoughts. Also this is not a one seating book, if you don't take your time reading and feeling this book you might miss what's said between the lines. If you are not frequent in reading hindi, you might need help with some words but you will get the context anyways. Definitely a good read!
Profile Image for Swati Saxena.
47 reviews28 followers
December 30, 2024
कुछ किताबें आपके जीवन में सही वक़्त पर आती हैं. ऐसे वक़्त पर जब आप उन्हें समझने और उनके बारे में देर तक सोचने के लिए तैयार हों. पतझड़ पढ़के मुझे बिलकुल ऐसा ही लगा. इस साल के शुरुआत में मेरा बर्गेन जाना हुआ. मुझे पता भी नहीं था कि इतनी दूर आया जा सकता है, वो भी ऐसी जगह जिसका नाम भी मुझे कुछ समय पहले ही पता चला था. बर्गेन नॉर्वे में एक शहर है, जिसके एक airbnb में मैं पैंतीस दिन रुकी थी. वो घर हो गया था. जैसे इस किताब में कोपेनहेगेन का एक कमरा ऋषभ का घर हो जाता है.

फिर वहां से ओस्लो, गोथेनबर्ग, माल्मो, कोपेनहेगन, बर्लिन होते हुए प्राग, वापस बर्लिन, बॉन, जेनीवा, और पेरिस जाने का मौका मिला. मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ होगा. शायद यही है मेरे जीवन का मकसद. ऐसी चीज़ें करते रहना जो कभी लगा नहीं कि होंगी. सपने में भी नहीं क्योंकि सपने देखने के लिए भी उन चीज़ों के बारे में मालूम होना चाहिए. मैंने नॉर्वे का नाम बस स्कूल में जनरल नॉलेज की किताब में देखा था - की उसे land of the midnight sun कहते हैं. इसका मतलब समझने की कोशिश भी कभी नहीं की थी. शायद यही है आनंदित रहने की recipe. ख़ुद को विस्मित और आश्चर्यचकित करते रहना. जैसे इस किताब में ऋषभ करता है, कभी सलीम बनके तो कभी रिदम और कभी सारथी.

ख़ैर, दो महीने की यात्रा के बाद जब मैं वापस आकर अपने दोस्तों से मिली और सबने पूछा 'कैसा रहा' तब इतना कुछ था कहने को कि मैंने कुछ नहीं कहना ठीक समझा. ऐसा लगा कि कुछ कहकर मैं इस अनुभव को ख़राब न कर दूँ. ये ट्रिप जो अभी भी एक कल्पना लग रही थी, कहीं बिखर न जाए. इसलिए अगर कुछ कहा भी, तो वो संक्षिप्त में कुछ first impressions और कुछ दिलचस्प लोग जो मुझे मिले उनके बारे में था. वैसे भी, किसी भी अनुभव के बारे में बात करने के लिए उसका settle हो जाना ज़रूरी है. अब शायद थोड़ा-बहुत हो गया है - साढ़े सात महीने बाद. इसीलिए अब जब पतझड़ पढ़ी तो कुछ यादें जिन्हें मैंने अपने दिमाग में पीछे धकेल दिया था, वो आगे आ गयीं. उस समय ली गयी तसवीरें देखूंगी तो क्या पता और आगे आ जाएं.

जब-जब लेखक बस/ट्रेन बुक करने, कॉफ़ी पीने, बीयर आर्डर करने, यूहीं सड़कों पर भटकने और art में अपनी नासमझी का ज़िक्र कर रहा था, मैं अपने साथ घटित इसी तरह के अनुभवों के बारे में सोच रही थी. ये कोई अनोखी बातें नहीं हैं, हर कोई जो हिंदुस्तान से यूरोप फुर्सत में गया है, उसने ये सब किया ही होगा. लेकिन कई लोगों के अनुभव कर लेने से मेरा अनुभव कुछ कम ख़ास तो नहीं हो जाएगा न. शायद यही है first world में समय बिताने का लाभ - कि आप ख़ुद के बारे में अच्छा महसूस करने लगते हैं. ऋषभ जो हमेशा फ़ायदे-नुकसान के बारे में सोचा करता था, उसने भी वहां जाकर माफ़ी माँगना और खुद से सच बोलना सीख लिया. Third world में वापस आकर हम चाहे-अनचाहे चिन्दी हो जाते हैं. शारीरिक रूप से first world में रहते हुए मानसिक तौर पर third world में अटके रहना भी काफी हद तक संभव है क्योंकि दिमाग की training तो वैसे ही हुई है न. ये कहते हुए मुझे पूरा एहसास है कि मैं third world में रहने वाले लोगों में सामजिक-आर्थिक रूप से शायद सबसे ऊपर के 5% में आती हूँ.

किताब में जब लेखक लिखता है कि कैसे उसे बाकी सभी लोग दुखी दिखे क्योंकि वो खुद दुखी था, मुझे याद आया कैसे मुझे पहले दस दिन बर्गेन के अपने airbnb के कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए सब अकेले लगते थे क्योंकि वो अकेलापन मेरे अंदर था. जैसे-जैसे लोगों से मिलना-जुलना हुआ और दोस्त बने, मुझे आते-जाते उन्ही अनजान लोगों के बीच एकजुटता दिखने लगी, फिर चाहे वो धूप में सबका बाहर निकल आना हो या फिलिस्तीन के समर्थन में मोर्चा निकालना.

बर्गेन और ऑस्लो जाकर मुझे ऐसे लगा कि जो लोग नॉर्वे northern lights देखने आते हैं, वो बस lights का ही पीछा करते रह जाते होंगे. उन्हें बाकी किसी चीज़ का लुत्फ़ उठाना आ पाता होगा क्या. जैसे लेखक Munch के पीछे दीवाना हो गया और मैं कहीं से कहीं भी जाने वाली बसों और ट्रेनों में बैठती चली गयी. क्या वो खुले मन से ये सब कर पाते होंगे. क्योंकि northern lights देखने से ज़्यादा सुन्दर अपने अंदर की light को जलाए रखना है, है न.
Profile Image for Avinash Jain.
32 reviews3 followers
March 29, 2024
एक खुशनुमा सी खुमारी है इस किताब को पढ़ने में। एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचते-पहुँचते भीतर कुछ भर-सा जाता है। कुछ उमड़ जाना चाहता है, बेतरतीब! यह लिखते हुए मैं उस दृश्य में सराबोर हूँ जहाँ ऋषभ Munch की पेंटिंग्स में उतर चुका है। शायद में भी इसी तरह 'पतझड़' में उतरा हुआ हूँ, रंगों में भीगा हुआ।
मानव के दृश्य बड़े ही स्वप्निल से होते हैं। अगर आँखें मूंदकर आप इसकी कल्पना करेंगे, तो लगेगा जैसे आप हल्की धुंध में देवदारों के बीच चल रहे हैं। एक बड़ी ही रोचक और खूबसूरत बात है जो मैं, हमेशा, मानव के लिखे में पाता हूँ। भीतर के गहरे द्वंद, गहनतम और अनबूझे भावों को, मानव अक्सर किसी भौतिक घटना या सदृश्य पलों से पूरक बनाते हुए दृश्य सुनते हैं। जैसे 'रूह' का वह नीला दरवाज़ा या 'पतझड़' में छत के रोशनदान से छनती धूप। अद्भुत है यह शिल्प।
मानव का संसार सबसे सरल संसार है। यह वही संसार है जिसे हम अनवरत जी रहे हैं। भीतर। ऊपर प्रकट नहीं होने देते। और मानव इस संसार को जीवंत कर देते हैं, सामने ला देते हैं। कभी-कभी इतनी सरलता असहज कर देती है। और इस तरह असहज होना बहुत ज़रूरी है, अपने भीतर के 'इंसान' को जीवित रखने के लिए।
हम अपने निज को कितना छुपा के रखते हैं! तमाम तरह के लबादे ओढ़ाकर। कुछ सच्चे, पर ज़्यादातर झूठे। झूठे लबादों के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें बार-बार तुरपाई लगती है। ज़रा सा सच, झूठ के लबादे फाड़ डालता है। और फिर करो तुरपाई! 'पतझड़' इन्हीं तुरपाईयों की गिरह है। अपने निज का अक्स जब बाहर आकर किसी दूसरे की आँखों में दिखने लगे तो हम सिहर उठते हैं। 'पतझड़' वही सिहरता काव्य है।

इस कहानी में एक किस्म की थेरेपी का सा अनुभव है। जैसे पतझड़ में पत्तों के गिरने से पेड़ का ढांचा दिखने लग जाता है, वैसे ही इंसानी भावनाऐं गिरते-गिरते जब अवचेतन के तल पर पहुंच जाती हैं तब रूह दिखने लग जाती है।

यह कहानी एक यात्रा है। अपने निज की, बाहर की, ऋतुओं की, भागे हुए शरणार्थियों की। पर क्या हम सभी शरणार्थी ही नहीं हैं! कोई बाहर के युद्धों में पिसकर भागा हुआ शरणार्थी है तो कोई भीतर के द्वंदों में पिसता हुआ शरणार्थी। कभी-कभी अंतस् में उतरने की सीढ़ियां बाहर तलाशनी होती हैं। मानव को पढ़कर एहसास होता है कि यात्रा, समय और जगह के आयामों से इतर एक और आयाम में साथ-साथ प्रवाहमान होती है। वह आयाम है - "मैं"। शायद संसार का सबसे दार्शनिक सबसे बड़ा कोई यात्री ही होगा। और यात्रा में हम अपने हिस्से के लोग अक्सर बहुतेरों में तलाश लेते हैं।

'पतझड़' बदलाव का परिचायक है। सब्ज़ रंग पत्ते, कत्थई और पीले होकर गिरते जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक तरह की उदासीनता है। पर यह प्रक्रिया निहायती खूबसूरत भी है। उदासीनता के आवरण में एक उत्साह छिपा हुआ है। उत्साह, नए पत्तों का, बसंत का, नवीनता का। यही तो जीवन भी है! कुछ गिरता है कुछ नया उभर आता है। कुछ उदासी है और कुछ उत्साह। शानदार!
Profile Image for Ankita Bora.
23 reviews8 followers
April 9, 2024

Patjhad by Manav Kaul is an exquisite masterpiece that transcends the boundaries of storytelling. From the very first page, Rishabh's journey resonates deeply, weaving its way into the fabric of your own existence. As you walk alongside him, navigating the complexities of life, you find yourself unraveling knots within your own soul. Each twist and turn in the narrative reveals a world brimming with myriad journeys, each one shedding light on the human experience.

Kaul's narrative prowess is truly captivating, effortlessly intertwining the lives of characters like Sarthi, Ridam, and Neni. Their stories, though distinct, seamlessly merge into a tapestry of emotions that leaves an indelible mark on the reader's heart. Through their trials and tribulations, we witness the changing seasons of life, each character transforming like the leaves in autumn.

Patjhad is not just a book; it's an immersive experience that leaves you spellbound long after you've turned the final page. Kaul's evocative prose and poignant storytelling evoke a myriad of emotions, inviting introspection and reflection. Whether it's the poignant tale of Sarthi or the enigmatic journey of Ridam, each character leaves an indelible impression, reminding us of the transient nature of life.

In the end, Patjhad is more than just a story; it's a testament to the beauty of human creativity and the power of storytelling to touch hearts and minds alike. As I reflect on the journey I've taken alongside these unforgettable characters, I am reminded of the profound impact literature can have on our lives. Patjhad will stay with me, its characters etched in my memory like the changing seasons.
5 reviews
February 10, 2024
अभी हाल में मैंने हिन्दयुग्म द्वारा प्रकाशित मानव कौल का पाँचवा उपन्यास ‘पतझड़’ समाप्त किया। इस उपन्यास की कथावस्तु प्रेम और प्रेम में धोखा खाए, एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है। यदि गहराई से देखा जाए, तो प्रेम में धोखा खाना, तो एक धक्का मात्र है। असल में यह उपन्यास कथा के नायक ऋषभ के अपने जीवन के आकलन और उसके व्यक्तित्व के विकास की कहानी है।

मानव कौल के लेखन की कुछ अपनी ख़ासियतें हैं। उदाहरण के लिए उपन्यास के पहले प्रकरण ‘कैथरीन’ को ही लेते हैं।यह समझ नहीं आता कि इस प्रकरण में लेखक स्वयं है या उपन्यास का नायक ऋषभ है। क्योंकि बेंजमिन को परिचय देते समय, वह (लेखक या ऋषभ?) कहता है, “हे बेंजमिन, आई एम ऋषभ।” इस संवाद के आगे के वाक्य से ही यह पूरा संशय खड़ा होता है।आगे के वाक्य हैं - “मेरे ऋषभ बोलते ही कैथरीन के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई, उसे पता था ये मेरा नाम नहीं है।”

इसके बाद पूरे उपन्यास में न बेंजमिन का ज़िक्र है, न ही कैथरीन का। इसके बाद की सारी कहानी मुख्य चरित्र ऋषभ और सहायक या गौण चरित्रों (रिदम, ओल्गा, नेनी, ऐरिस, माला, शशि आदि) को लेकर आगे बढ़ती है। पाठक के लिए इस तरह की उलझनें पैदा करना मानव का शगल है। यदि आपने मानव का बाकी लेखन भी पढ़ा है, तो आप यह जानते होंगे कि यह केवल शगल नहीं है, बल्कि इसका एक उद्देश्य है। अपने एक और उपन्यास ‘अंतिमा’ में लेखक (‘अंतिमा’ का मुख्य चरित्र भी एक लेखक है।) अपने संपादक से बात करते हुए कहता है, “मेरी यह एक बुरी आदत हैं कि मैं प्रक्रिया भी लिखता चलता हूँ।” तो शायद ‘कैथरीन’ प्रकरण केवल ऋषभ नामक चरित्र के जन्म के बारे में है। शायद लेखक यह बताना चाहता कि चरित्र ऋषभ का जन्म कब और कैसे हुआ!

इस भ्रम को आगे भी जारी रखा जाता है, लेकिन वहाँ पाठक के लिए यह बिल्कुल स्पष्ट है। इसलिए इसे ठीक-ठीक भ्रम की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती है। ऋषभ जब रिदम से मिलता है, तो रिदम उसे सलीम बना देती है और वह सलीम बना रहता है। जब वह नेनी और शशि से मिलता है, तब वह रिदम हो जाता है। सोनिया से मिलता है, तो सारथी हो जाता है। लेखक शायद ऋषभ को दूसरे चरित्रों में इसलिए बदलता है, ताकि ऋषभ अपने-आपको उनकी जगह पर रखकर अपने-आपको आँक सके। उनके नज़रिए को समझ सके। जिन चरित्रों में भी ऋषभ बदलता है, वे चरित्र उसके बहुत करीब हैं। सारथी उसकी पूर्व-प्रेमिका है, जिससे रिश्ता टूटने के बाद, वह दिल्ली से कोपेनहेगन चला आता है। रिदम उसको कोपेनहेगन में मिलती है, जिससे उसकी दोस्ती गहराती है; पर उनकी दोस्ती प्रेम में परिवर्तित हो, इससे पहले ही पारूल से बनाए एक रात के संबंध के अपराधबोध में वह Horsens से कोपेनहेगन वापस चला आता है। रिदम को धोखा देने की असहजता उसे वहाँ भी टिकने नहीं देती और वह हैमबर्ग चला जाता है।

कहानी की शुरूआत का ऋषभ लकीर का फ़कीर है। वह समाज की बनी-बनाई परिपाटी पर चलता है। वह अपने घर से नौकरी पर जाता है और वापस घर आ जाता है। वह अपने जीवन में कुछ भी अनियोजित नहीं करता। उसके मन में सारथी की तरह पहाड़ पर घर बनाने के न सपने हैं, और न ही आकांक्षाएँ। वह एक कुत्ता है, मालिक उसकी तरफ़ गेंद फेकता है और वह उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़ता है। लोगों को उसको बताना होता है कि क्या करना है, वह अपनी इच्छा से ज़्यादा कुछ नहीं करता। उसकी ऐसी स्थिति क्यों है?; लेखक इसका कोई ख़ास ब्यौरा तो नहीं देता, लेकिन रूपात्मक रूप में यह बता देता है कि वह एक अति सामान्य व्यक्ति क्यों है! ‘मध्यवर्गीय डरों’ ने उसको इस तरह का व्यक्ति बना दिया है।

इस मध्यवर्गीय दुनिया से बाहर न वह कुछ सोचता है और न ही जानता है। वह सारथी के साथ वफ़ादार है। उसके जन्मदिन पर वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर सरप्राइज़ पार्टी दे देता है। वह प्रेम को बस इसी तरह जानता है और इसी तरह समझता है। उसे केवल नॉर्वे जाकर यह समझ आता है कि उसका व्यक्तित्व कितना बोझल और उबाऊ है।

उसके व्यक्तित्व में कुछ परिवर्तन तो उसके इस यात्रा के अनुभवों के साथ ही होने लगते हैं, लेकिन उसके व्यक्तित्व का असल पतझड़, इस अहसास के बाद ही शुरू होता है। कहानी के अंत के ऋषभ पर नए पत्ते उग आए हैं।

उपन्यास की भाषा जितनी सरल हो सकती है, उतनी है। सीधी, सरल और सटीक है। ‘नई वाली हिन्दी’ की जितनी रचनाओं से, मैं आजतक मुख़ातिब हुआ हूँ। वे बेहद सरल हैं। इस तरह की भाषा नए-नवेले पाठकों को अपनी तरफ़ काफ़ी आकर्षित करती है।
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80 reviews
March 25, 2025
कोई पूछता है तुम्हारी सबसे पसंदीदा किताब बताओ,
झट से बोल पड़ता हूँ “ बहुत दूर कितना दूर होता है”
“चिढ़ों पर चाँदनी” और “बहुत दूर कितना दूर होता है” ने यात्रा करना और यात्रा में रहना सिखाया। हमेशा सोचता था काश मानव एक और यात्रावृत्तान्त लिखते।
“पतजड़” ने इच्छा पूर्ति की है। यात्रा में हम अपने आप से नये तरीक़े के संवाद करने की प्रेरणा और हिम्मत जुटा पातें हैं। बिना हड़बड़ी और व्याकुलता के अकेले की गई यात्रा आपको निरंतर बदल रही होती है, इस सूक्ष्म बदलाव को लिखने में मानव को महारत हासिल है। कला से आपके संबंध इस बदलाव को बखूबी दर्ज करतें हैं । कला का आपके जीवन में प्रवेश सांत्वना का प्रवेश है, कोमलता का प्रवेश है। कला में आस्था, आस्था का पूरक हो सकती है।
अच्छी किताबों के बारे में लिखा जाना चाहिए पर ज़्यादा नहीं लिखना चाहिए। “बहुत दूर कितना दूर होता है” और “पतझड़” में फ़िल्म बनने का सामर्थ है, जीवन बदलने का सामर्थ है।
ये यात्रा ट्रेन टिकट से भी सस्ती हैं, मँगवायें और पढ़ डालें।
4 reviews
March 8, 2025
पतझड़ सिर्फ एक किताब नहीं है। यह @manavkaul19 सर की एक और खूबसूरत रचना है, जिसमें मानव सर ने शब्दों के ज़रिए यादों, इच्छाओं और बीते हुए पलो को बेहद ख़ूबसूरती से चित्रित किया है। मानव कौल के लेखन में एक अजीब सी शांति है, कुछ ऐसा जो शोर से अधिक शक्तिशाली है। उनके शब्दों का चयन न तो अत्यधिक जटिल है और न ही बहुत भारी, बल्कि एक नरम रूप की गद्य है जिससे हर कोई कभी न कभी जुड़ सकता है। यह पुस्तक उन क्षणों का दस्तावेज करती है जब अपने आप से बातचीत करना अतीत की यादों के माध्यम से यात्रा में बदल जाता है और आगे का एक नया रास्ता बनाने की कोशिश होती है। यह किताब अपेक्षा से अधिक समय तक आपके साथ रहती है।
Profile Image for Kunal Verma.
7 reviews
March 29, 2025
• The book’s plot strikes me as overly dramatic and emotionally exaggerated.

• He endeavored to explore art and literature in the book but fell short of capturing their depth.

• I would not regard this book as a noteworthy contribution to Hindi literature.

• The dialogues resemble the style of Hindi narration commonly found in National Geographic documentaries, which, in my view, undermines the richness of Hindi literature.

• At times, he delves into life philosophy, offering insights that I find reasonable.

• I would describe him as the Hindi counterpart of Chetan Bhagat.
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95 reviews6 followers
November 18, 2024
कुछ अलग होती हैं ये क़िताबें…. पतझड़ जैसी। एक अलग सा एहसास आपको भीतर तक भर देता है, एक सुकून, एक ख़ुद से प्रश्न की सी भावना, जिसे शब्दों में समझना और समझाना कठिन है।एक क्षण आपको लगेगा ये यात्रा वृतांत है और दूसरे क्षण आप लेखक की जी हुई जगहों पर स्वयं को महसूस करने लगोगे। पतझड़ आपको बहुत सी भावनाओं से एक साथ रूबरू करवाती है, और भीतर ही भीतर आपको आपसे मिलवाती है।

अलग है मानव कौल की क़िताबें।”पतझड़” उन्हीं अलग क़िताबों की फ़ेहरिश्त में एक और क़िताब है।❤️❤️
Profile Image for Manisha Meena.
16 reviews
June 10, 2024
It's my first reading a hindi novel, and it was beautiful. Along the way, it felt like I could related to Rishabh so much. Feeling lost in ones own skin and then trying to find oneself out. The book explained the emotions really nicely, if I had read the same things in english, I might not be able to connect that much.
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41 reviews3 followers
March 10, 2025
आगे क्या होगा
मानव कौल को पढ़ते वक्त एक ही सवाल मन में चलता रहता है,
सलीम का सफर अकेलेपन से शुरू होता है और चलते-चलते कितना कुछ समेट लेता है वो,
मेरी एक रिक्वेस्ट है कि किताब को धीरे-धीरे पढ़े और जहां भी किसी शहर का नाम आए उसे गूगल पे सर्च करके थोड़ा देख लेना,
सलीम के साथ आप भी इस यात्रा में शामिल जो जाओगे ।
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34 reviews
September 20, 2025
This is the 50th book I completed reading!

मुझे काफ़ी हिन्दी शब्दों से लगाव होने के कारण, मैंने सोचा क्यों न मेरा पचासवाँ पुस्तक हिन्दी ही चुनूँ।

यह किताब काफ़ी रोचक थी, मुझे ऐसा लगा यह किताब Queen का पुरुष संस्करण है।

जिसमें मुख्य किरदार के स्वभाव में आए बदलाव को दिखाने में यह सफल रही।

पुस्तक: पतझड़
लेखक: मानव कौल
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85 reviews3 followers
January 10, 2024
हमारा अधूरापन, हमारा खुद के नंगेपन पर ओढ़ाया सभ्य होने का लबादा हमेशा हमारे साथ रहता है। इसी सब को ढकने की जद्दोजहद हमारे जीवन को एक आकार देती हैं जिनमें हम खुद को एक पहेली के टुकड़े की तरह पाते हैं।
किताब, स्नेह और रिस्क.
यात्राएं और लोग
हम!
17 reviews1 follower
October 27, 2024
I tried reading a Hindi novel for the first time and I am amazed by ManavKaul 's writing. Another beautiful read for this year wherein he says, "प्रेम के चेहरे कितने एक जैसे होते हैं!"
"आज और अभी खुश रहना सीख जाओ, ये वक़्त युं निकल जाएगा!"
Profile Image for Timsi Gupta.
62 reviews35 followers
May 1, 2024
2.5 rounded off to 3. I felt this was one of his weakest works. The writing didn't have the kind of impact his other books usually do.
57 reviews1 follower
April 11, 2025
I could not finish this book. Changing names. travelling without any motive. I tried reading but at one point it appeared worthless. It would have been better if it was written in English.
8 reviews3 followers
April 27, 2025
यह कहानी एक व्यक्ति के अपने आप को समझने की एक यात्रा है जिसमें हम उसके साथ कब हो जाते हैं पता ही नहीं लगता एवं प्रकृति, कला और यात्रा से आपका प्रेम इस कहानी के हर एक पन्ने के साथ बढ़ता रहता है।
Profile Image for AYUSH KUMAR.
120 reviews4 followers
December 23, 2023
"पतझड़" एक उपन्यास हैं जो मान�� कौल के द्वारा रची गई हैं।
कहानी में एक मुसाफिर हैं या यूं कहें कि एक इंसान है जो हर विपरीत परिस्थितियों से भागने की कोशिश कर रहा है , अलग अलग नाम बदल कर । कहानी है कई शहरों की सुंदरता की , munch के पेंटिंग्स के रंगों में छिपे हुए ज़िंदगी के रंगों की की , पतझड़ के मौसम की । कहानी हैं पीड़ा, प्रेम और अकेलेपन की।कहानी है की कैसे कोई पेंटिंग्स और पतझड़ किसी को जिंदगी जीने के नए आयाम देते है।

मानव कौल को पढ़ना आपको देखने का एक नया नजरिया देती है , आपकी सूझ बूझ को विकसित करने का काम करती हैं ।
Profile Image for Avinash Jain.
32 reviews3 followers
June 27, 2024
एक खुशनुमा सी खुमारी है इस किताब को पढ़ने में। एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचते-पहुँचते भीतर कुछ भर-सा जाता है। कुछ उमड़ जाना चाहता है, बेतरतीब! यह लिखते हुए मैं उस दृश्य में सराबोर हूँ जहाँ ऋषभ Munch की पेंटिंग्स में उतर चुका है। शायद में भी इसी तरह 'पतझड़' में उतरा हुआ हूँ, रंगों में भीगा हुआ।
मानव के दृश्य बड़े ही स्वप्निल से होते हैं। अगर आँखें मूंदकर आप इसकी कल्पना करेंगे, तो लगेगा जैसे आप हल्की धुंध में देवदारों के बीच चल रहे हैं। एक बड़ी ही रोचक और खूबसूरत बात है जो मैं, हमेशा, मानव के लिखे में पाता हूँ। भीतर के गहरे द्वंद, गहनतम और अनबूझे भावों को, मानव अक्सर किसी भौतिक घटना या सदृश्य पलों से पूरक बनाते हुए दृश्य सुनते हैं। जैसे 'रूह' का वह नीला दरवाज़ा या 'पतझड़' में छत के रोशनदान से छनती धूप। अद्भुत है यह शिल्प।
मानव का संसार सबसे सरल संसार है। यह वही संसार है जिसे हम अनवरत जी रहे हैं। भीतर। ऊपर प्रकट नहीं होने देते। और मानव इस संसार को जीवंत कर देते हैं, सामने ला देते हैं। कभी-कभी इतनी सरलता असहज कर देती है। और इस तरह असहज होना बहुत ज़रूरी है, अपने भीतर के 'इंसान' को जीवित रखने के लिए।
हम अपने निज को कितना छुपा के रखते हैं! तमाम तरह के लबादे ओढ़ाकर। कुछ सच्चे, पर ज़्यादातर झूठे। झूठे लबादों के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें बार-बार तुरपाई लगती है। ज़रा सा सच, झूठ के लबादे फाड़ डालता है। और फिर करो तुरपाई! 'पतझड़' इन्हीं तुरपाईयों की गिरह है। अपने निज का अक्स जब बाहर आकर किसी दूसरे की आँखों में दिखने लगे तो हम सिहर उठते हैं। 'पतझड़' वही सिहरता काव्य है।

इस कहानी में एक किस्म की थेरेपी का सा अनुभव है। जैसे पतझड़ में पत्तों के गिरने से पेड़ का ढांचा दिखने लग जाता है, वैसे ही इंसानी भावनाऐं गिरते-गिरते जब अवचेतन के तल पर पहुंच जाती हैं तब रूह दिखने लग जाती है।

यह कहानी एक यात्रा है। अपने निज की, बाहर की, ऋतुओं की, भागे हुए शरणार्थियों की। पर क्या हम सभी शरणार्थी ही नहीं हैं! कोई बाहर के युद्धों में पिसकर भागा हुआ शरणार्थी है तो कोई भीतर के द्वंदों में पिसता हुआ शरणार्थी। कभी-कभी अंतस् में उतरने की सीढ़ियां बाहर तलाशनी होती हैं। मानव को पढ़कर एहसास होता है कि यात्रा, समय और जगह के आयामों से इतर एक और आयाम में साथ-साथ प्रवाहमान होती है। वह आयाम है - "मैं"। शायद संसार का सबसे दार्शनिक सबसे बड़ा कोई यात्री ही होगा। और यात्रा में हम अपने हिस्से के लोग अक्सर बहुतेरों में तलाश लेते हैं।

'पतझड़' बदलाव का परिचायक है। सब्ज़ रंग पत्ते, कत्थई और पीले होकर गिरते जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में एक तरह की उदासीनता है। पर यह प्रक्रिया निहायती खूबसूरत भी है। उदासीनता के आवरण में एक उत्साह छिपा हुआ है। उत्साह, नए पत्तों का, बसंत का, नवीनता का। यही तो जीवन भी है! कुछ गिरता है कुछ नया उभर आता है। कुछ उदासी है और कुछ उत्साह। शानदार!
Profile Image for Santosh Jha.
200 reviews
Read
December 31, 2024
"Patjhad" by Manav Kaul is the first novel I picked up in 2024, and I was quite excited to read his book. It feels like you are in the story; it's so real and engaging. The beauty of his books lies in the way they focus on small things, little details, urging us to preserve, enjoy, and savor them. When you read "Patjhad," you literally go on a journey with Rishabh. You connect with his story, feel his guilt, appreciate his honesty with himself, cheer for him, get sad for him, and sense the pain. You meet people with him, visit places, and see everything through his eyes. My last favorite of his was "Antima," which was dear to me, but now, this is my favorite novel from him. It couldn't be a better reading start than this. I highly recommend it in this fast-paced life of stories. If you want to read a calm, composed, yet effective story that teaches us to enjoy and adore every small thing, this is it.
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