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Ummeed Prem ka Anna hai

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उम्मीद प्रेम का अन्न है - अनुराग वत्स

Ummeed Prem ka Anna hai
(Hope is the Food of Love)

अनुराग कविता के आँगन में दबे पाँव जाते हैं और उसे निपट वैसा ही देख पाते हैं जैसी वह अपने मूल रूप में है, बिना किसी अतिरिक्त आरोपण और बनाव-शृंगार के। आज के समय में जब प्रेम कविताओं के साथ ऐसा संकोची आचरण लगभग असंभव हो गया है, वह एक विरल कवि की तरह लिक्खाड़ों के मोहल्ले में अपना पहला क़दम रखते हैं। कवि के तौर पर उनका संकोच इन कविताओं में इस तरह झिलमिलाता है, जैसे संध्या आरती के दीयों की रोशनी नदी में झिलमिलाती है और पानी से टकराकर एक जगमगाते दृश्य का रचाव करती है। कठिन कविता लिखना बहुत कठिन काम नहीं है, असल चुनौती सरल कविता में कविता को बचाए रखने की है। अनुराग अपनी स्वाभाविक सहजता के साथ कविता में उस अलक्षित तरलता को सहेज पाते हैं। एक कविता-प्रेमी के तौर पर उनकी कविताओं से गुज़रते हुए मुझे यह आश्वस्ति मिलती है कि ये कविताएँ जीवन की धूप में पर्याप्त सिंकी हुई हैं, मगर कहीं से भी जली हुई नहीं। कविता जिन लोगों के लिए भोजन-पानी का काम करती है, अनुराग की कविताएँ उन्हें जीवन-ऊर्जा से भरेंगी। ये ज़ेहन की ज़ुबान पर लंबे समय तक बने रहने वाले स्वाद की कविताएँ हैं।

64 pages, Paperback

Published November 1, 2023

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Displaying 1 - 2 of 2 reviews
Profile Image for Anurag.
179 reviews2 followers
January 17, 2024
Lovely collection of simple-sweet-beautiful poems.
Profile Image for Ankita Chauhan.
178 reviews66 followers
September 9, 2024
उम्मीद प्रेम का अन्न है’ एक कविता-संग्रह है। लेखन यात्रा में नींव के पत्थर सरीखा। यह लेखक जगह नहीं घेरता, अपनी नन्हीं कविताएँ साझा कर, एक स्पेस क्रिएट करता है, जहाँ पाठकों की सोच विस्तार पा सके। लेखक अपनी रचनाओं के ज़रिए अपने जीवन के सबसे छुपे हुए बिंबों को उघाड़ता है। एक रहस्य का, मंद गति से खुलना। जीवन-छाया में बिंधी स्मृतियों को तराशने जैसा। सबसे सुंदर बात, अनुराग वत्स की कविताओं को आप विजुवलाईज़ कर सकते हैं, साफ़-सुथरे शब्द एक इमेज़री बनाते चलते हैं, चेहरों या जगहों की नहीं, भावों की - जेस्चर्स की।
साल 2024 में पढ़ी गई यह मेरी पहली किताब है। जनवरी-फरवरी यह बिस्तर के सिरहाने रही। शिकायत इतनी-भर, ग़र थोड़ा और पढ़ने को मिलता..!
किताब बुकशेल्फ़ में जाने से पहले कुछ कविताएँ दोबारा पढ़ी, साझा कर रही हूँ।
तुम बहुत देर से आईं मेरी पंक्ति में
जैसे बहुतेरे शब्दों के बाद आता है
दुबला-लजीला पूर्ण-विराम
पिछले बाक़ी का अर्थ-भार सम्भालता
प्रेम के पन्ने पर सबसे अन्तिम अंकन।
तुम्हारी आँखों से एक दिन
झर जाऊँगा
जैसे आसमान से रजत बूँदें
वृक्ष से फूल।
कितनी ही सरल क्यों न हो
हमारी ज़िन्दगी एक सीधी रेखा नहीं होती
उसे खींचने में ईश्वर के हाथ की काँप
क़ायम रहती है।
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