यह उपन्यास जेएनयू जीवन पर आधारित है। कहते हैं जो भी यहाँ कुछ साल रहकर पढ़ाई-लिखाई कर लेता है उसे प्रेम हो जाता है, यहाँ की हवा से, पहाड़ी से, यहाँ तक कि कैंटीन, रास्ते और वो सब कुछ से जिसे आँखों से देखा जा सके। जो यहाँ के हो गए वे फिर कहीं और के नहीं हो पाए। उपन्यास में तीन मुख्य पात्र हैं- शेखर, इवा और जेएनयू। शेखर नाम का एक युवा पूरब से जेएनयू में पढ़ाई के लिए आता है और फिर जेएनयू कैसे शेखर के जीवन को साँचे में ढालता है यही इस उपन्यास का विषय है। यहाँ प्रेम है तो छात्र राजनीति भी, लाइब्रेरी में पढ़ाई है तो लाइब्रेरी कैंटीन में दोस्तों के बीच डिस्कशन भी, द्वेष है और द्वंद्व भी, ऐकडेमिक करियर है तो जीवन के संघर्ष भी। छात्र जीवन के तमाम पहलुओं को आपस में समेटे यह उपन्यास आपको देश के सबसे प्रसिद्ध और सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय में आमंत्रित-सा करता प्रतीत होता है।
तो आइए चलते हैं शेखर, इवा और उनके जेएनयू की दुनिया में…
ये खुद को खुद के लिए चलना सिखा रही। जीवन में सादगी होना या रखने का प्रयास करने की कोशिश रहे। समय और जगह का आनंद लेना और उसे जीना इस सफ़र में एक जरूरी पड़ाव है। समय को बदलते हुए देखना और किसी के लिए रुकना संभव नहीं है, कोई किसी के लिए ना रुकता है और ना ही रुकेगा। जीवन कभी ना रुकने वाली गाड़ी है। आंशिक मिलाप और अलगाव होना तय है मगर इस समय अवधि में कोई कितना भावनात्मक रूप से खुद को अडिग रखता है ये असल जीवन के मायने है। मोह रूपी माया जो भावना को इस मायावी दुनिया में तैराती है। मनोभाव का इतना भंजन हो और ये इतना अडिग हो जाए कि किसी क्षण के लिए इसका विलाप या उल्लास हो तो अपने वास्तविक रूप में एक क्षण बाद उसी आवेग और सहजता से चलने लगे।
This book was recommended to me by one of my friends who is an alumni of JNU. Bought it few months back but didn’t read it. However today somehow I decided to read it. Finished the entire book in a single day. The book is lucid and easy to read. The characters Sekhar, Eva etc are well introduced. The novels nicely portrays the complexities and struggles of the a middle class student. It also gives a glimpse of how JNU provides a level playing field and opportunity to such students who come from the rural and relatively poor background. The love story between Sekhar and Eva is also nicely portrayed and shows the reality of many of the college relationships.
Having come from a rural background studying in a University and going on to clear the UPSC exam myself, I could relate to the narrative of the author.
यह उपन्यास जेएनयू जीवन पर आधारित है। कहते हैं जो भी यहाँ कुछ साल रहकर पढ़ाई-लिखाई कर लेता है उसे प्रेम हो जाता है, यहाँ की हवा से, पहाड़ी से, यहाँ तक कि कैंटीन, रास्ते और वो सब कुछ से जिसे आँखों से देखा जा सके। जो यहाँ के हो गए वे फिर कहीं और के नहीं हो पाए। उपन्यास में तीन मुख्य पात्र हैं- शेखर, इवा और जेएनयू। शेखर नाम का एक युवा पूरब से जेएनयू में पढ़ाई के लिए आता है और फिर जेएनयू कैसे शेखर के जीवन को साँचे में ढालता है यही इस उपन्यास का विषय है।
Set in the backdrop of JNU, the fictional characters of Shekhar and Eva give different meaning of love and life. While most of the story revolves around Shekhar's poignant journey of finding his purpose of life around Eva; the last part of the novel has a twist for the readers to fall in love with.
The characters of Eva, Pradeep, Snigdha, Chacha are all contributing in making the storyline perfect. Though these characters are fictional as claimed by the author, the JNU in which they lived their best part is real and living. The life called JNU is so vividly portrayed in the work that one who lived in JNU find a slice of their life in the novel and those who are yet to be part of JNU will long to live there after reading this masterpiece.
The book grows on you gradually with each page and by the end leaves you with craving for more. Characters stays with u for long and each one of us who have ever gone through hostel life for higher education will find their own reflection in the characters.
जिस तरीके से लेखक ने शेखर और ईवा के मध्य प्रेम प्रसंग को बुना है ,एक तरफ ईवा अपनी शर्तो और अपने स्वच्छंद जीवन को बिना किसी बंधन की जीना चाहती थी वहीं शेखर का ईवा के प्रति अटूट समर्पण के साथ प्रेम । चच्चा जेएनयू कोई अपना बसेरा बना दिया
यहाँ के विद्यार्थी चाय बहुत पीते है। कुछ अच्छा हो तो, कुछ बुरा हो तो, खाने के बाद, खाने से पहले, रात में घूमने जाते समय घूम के आते समय, दोस्त को लेने के समय, दोस्त को छोड़ते समय, क्लास जाते समय, क्लास से आते समय, दोस्त उदास हो तब, दोस्त ख़ुश हो तब, किसी का दिल जुडा हो तब, दिल टुटा हो तब..
किताब के मुख्य पात्र ने ऐसा बांध कर रखा की शेखर को अंत में इवा के प्रेम की स्वीकृति ना होने की उदासी से हमारा मन भी बहुत उदास हो गया। कहानी के अंत और मध्य को बहुत ही सजग तरीके रखने का साहस लेखक ने किया है इसके लिए उनको बहुत-बहुत सारी बधाई अगर आप भी जेएनयू के जीवन की जीवन और दिनचर्या से परिचित होना चाहते हैं तो जरूर इस उपन्यास को पड़े और पढ़कर अपने विचारों को लेखक के साथ साझा करें ।
किताब ने सिखाया की अंत में ये ही याद रखो की कुछ ना रुकता है।सबकुछ चलता रहता है अनवरत आपके साथ और आपके बिना भी.....
पुस्तक समीक्षा "615 पूर्वांचल हॉस्टल" लेखक: राघवेन्द्र सिंह (IAS) रेटिंग: 4/5 "615 पूर्वांचल हॉस्टल" एक युवा छात्र शेखर की आत्मकथात्मक यात्रा है, जो JNU जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में MA की पढ़ाई के लिए आता है। नई जगह, नया माहौल, और गहरे विचारों की दुनिया में कदम रखते ही उसका सामना होता है दोस्ती, संघर्ष, प्रेम और आत्म-खोज से। शेखर का जीवन गंगा ढाबा की चाय, हॉस्टल की चर्चाओं, और विचारधाराओं की बहसों में बीतता है। उसके जीवन में कई खास लोग आते हैं – प्रदीप, स्निग्धा, राजेश, चाचा, निधि और चंद्रशेखरन।इसी दौरान उसकी मुलाकात होती है ईवा से — जो टॉपर है, स्पष्ट सोच वाली है, और जीवन में सादगी चाहती है। शेखर उससे सच्चा प्रेम करता है, और ईवा भी उसे पसंद करती है। लेकिन वह शादी या लिव-इन जैसे किसी कमिटमेंट के लिए तैयार नहीं होती। शेखर भावनात्मक रूप से टूटता है, ईवा को मनाने की कोशिश करता है, लेकिन अंततः उसे यह समझ आता है कि प्यार में जबरदस्ती नहीं हो सकती। वह मेघालय में नौकरी स्वीकार करता है और दिल्ली छोड़ देता है — लेकिन ईवा के लिए मन में कोई कटुता नहीं रखता। "लेखक के अनुसार, संबंध भी जीवन की तरह होते हैं — जब तक वे पूरी तरह परिपक्व न हो जाएं, उनके बारे में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जा सकता। साथ होने का अर्थ है, एक-दूसरे को उसकी सभी कमजोरियों और अपूर्णताओं के साथ स्वीकार करना।" "यह उपन्यास लेखक के निजी अनुभवों से ओतप्रोत है, जिसमें जेएनयू का बौद्धिक और सामाजिक जीवन पूरी प्रामाणिकता के साथ चित्रित हुआ है — चाहे वो विचारधाराओं की गूंज हो, ढाबों पर चलती बहसें हों या छात्र राजनीति और प्रेम के उतार-चढ़ाव। हर दृश्य आपको उसी माहौल में ले जाता है।" "लेखक की लेखन शैली सरल होते हुए भी बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली है — उनके शब्दों में एक सहज प्रवाह है, और पात्रों की रचना इतनी सजीव और आत्मीय है कि पाठक हर भाव, हर दृश्य को महसूस कर पाता है। यही विशेषता उपन्यास को शुरू से अंत तक बांधे रखती है।" "छात्र से लेकर शिक्षक, और युवा से लेकर अनुभवी पाठक तक — यह किताब सभी के लिए प्रासंगिक और प्रेरणादायक है।" यह सोचने पर मजबूर करती है कि —
"समय की तरह ज़िंदगी भी बहती रहती है, रुकना इसका स्वभाव नहीं — हमें भी आगे बढ़ना ही होता है।" "मैं राघवेंद्र सिंह जी की आभारी हूँ, जिन्होंने इस गहन अनुभव को शब्दों में ढालकर पाठकों तक पहुँचाया। यह पुस्तक वास्तव में एक अनमोल सौगात है।" #615पूर्वांचलहॉस्टल #पुस्तकसमीक्षा #JNUlife #राघवेंद्रसिंह #हिंदीसाहित्य
615 पूर्वांचल हॉस्टल :” कहते है की JNU के जीवन को बग़ैर गंगा ढाबा , लाइब्रेरी कैंटीन और उस जैसे अन्य कई सारे जगहों को वास्तविक रूप में पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता “। यह किसी व्यक्ति की कहानी नहीं , यह एक शहर की कहानी है दिल्ली की , या यूँ कहे की दिल्ली की जान जेएनयू अपनी दास्ताँ ख़ुद कहता है । जेएनयू में जो भी आता है वो यहीं का होके रह जाता ��ै । शेखर भी आया था , जेएनयू , हॉस्टल , दोस्ती , प्रेम , इन्ही का होकर रह गया । इस किताब का अहम हिस्सा रही है चाय “ कुछ करना है तो चाय पीनी है , कुछ नहीं करना है तो भी चाय पीनी है “ शेखर जेएनयू में रहकर पढ़ाई से वो नहीं सीखा जो , जो जेएनयू की राजनीति , प्रदीप , इवा ने सीखा दिया ।
लेखक ने बेहतरीन किताब लिखी है , इसको पढ़ा तो लगा जैसे जेएनयू दिल्ली को मैंने अंदर से महसूस किया । लाजवाब