सिंगला मर्डर केस
जीतसिंह के हाहाकारी कारनामे “कोलाबा कांस्पीरेसी” को बाज़ार में आये ४० दिन भी मुश्किल से नहीं हुए थे की पाठक साहब ने “राजा पॉकेट बुक्स” से अपना नया उपन्यास “सिंगला मर्डर केस” भी अपने प्रशंसकों को उपहार स्वरुप दे दिया। हालांकि होली का तोहफा थोडा लेट मिला। लेकिन कहते हैं न, मालिक के घर देर है पर अंधेर नहीं। सुनील के किरदार से मैं हमेशा मुतासिर रहा हूँ। सुनील चक्रवर्ती एक ऐसा किरदार है, जिसे सभी प्रशंसक अपना आदर्श मान सकते हैं। “सिंगला मर्डर केस” सुनील सीरीज में पाठक साहब का १२१ वां उपन्यास है।
“सिंगला मर्डर केस” एक पूर्ण मर्डर-मिस्ट्री है। जिसका केंद्रबिंदु एक क़त्ल है और उससे जुडी सुनील की तहकीकात है। वैसे तो एक शहर में एक दिन में कई क़त्ल होने की संभावना होती है, लेकिन पाठक साहब अपने केंद्रीय किरदार सुनील को उपन्यास की कहानी में इतनी ख़ूबसूरती से घुसाते हैं जिससे पूरा फोकस एक ही केस पर हो जाता है। हालांकि ऐसे किसी केस में पुलिस का दखल तो होता ही है लेकिन “सिंगला मर्डर केस” में सुनील, पुलिस का दायाँ हाथ बना हुआ है। वहीँ पाठकों और सुनील का खासमखास, रमाकांत, इस उपन्यास में सुनील का दायाँ हाथ बनकर कदम-कदम पर सुनील का साथ देता है।
राजनगर में “हिमेश सिंगला” नामक एक स्ट्रोक ब्रोकर का उसके घर में क़त्ल हो जाता है। “हिमेश सिंगला” का बड़ा भाई “शैलेश सिंगला”, सुनील को इस केस में दखल देने के लिए कहता है। जैसे-जैसे सुनील “हिमेश सिंगला” के क़त्ल की तहकीकात करता जाता है, वैसे-वैसे नए-नए तथ्य उजागर होते जाते हैं। साथ ही साथ, क़त्ल के कई सस्पेक्ट भी धीरे-धीरे सामने आते जाते हैं। प्रारंभ में जिस केस में उद्येश और संदिग्धों की कमी थी, उसमे अब उद्येश और संदिग्धों की संख्या बढ़ जाती हुई नज़र आती है।
सुनील के तर्क के अनुसार, कातिल की लम्बाई ५’६” से ५’१०” के बीच है, कातिल पक्का निशानेबाज है, कातिल “हिमेश सिंगला” का करीबी है, कातिल कोई पुरुष है। कहानी के निरंतरता के अनुसार ही सुनील और भी कई तर्कों को उपन्यास में उजागर करता हुआ जाता है।
कहानी में संदिग्धों की कोई कमी नहीं है। मानसी मेहता, जो वारदात के दिन हिमेश सिंगला के साथ डिनर डेट पर थी। हिमेश सिंगला, मानसी मेहता के पीछे हाथ धो कर पड़ा हुआ था। इसी कारण, मानसी मेहता के बॉयफ्रेंड आदित्य कौशल ने हिमेश सिंगला को जान से मार देने की धमकी दी थी। आदित्य कौशल को वारदात के समय हिमेश सिंगला के घर के आसपास अविनाश उपाध्याय ने देखा था। अविनाश उपाध्याय हिमेश सिंगला का करीबी दोस्त था, जिसने हिमेश सिंगला के साथ १० लाख रूपये के जाली चेक से धोखा किया था। लेकिन हिमेश सिंगला ने उसे ९० दिन का समय दिया था उस पैसे को वापिस लौटाने के लिए, जिसकी मियाद हिमेश सिंगला के क़त्ल के तीन दिन बाद समाप्त होने वाली थी।
वहीँ सुनील ने एक थ्योरी का इस्तेमाल करते हुए, मकतूल हिमेश सिंगला की हाउस-कीपर को भी संदिग्ध की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। जिस दिन क़त्ल हुआ, जहाँ क़त्ल हुआ, जब क़त्ल हुआ, उस समय हाउस-कीपर कमला दयाल दुसरे फ्लोर पर अपने कमरे में सो रही थी और उसे कोई खबर नहीं हुई। ठाकुर सुजान सिंह जो हिमेश सिंगला का पुराना मित्र था, उसकी भी स्थिति और एलिबाई पूर्ण नहीं थी, सुनील ने उसे भी अपनी थ्योरी से संदिग्धों की लिस्ट में खड़ा कर दिया था।
एक क़त्ल, पांच संदिग्ध। पाँचों संदिग्धों के पास हिमेश सिंगला को मारने का उद्येश था। पाँचों संदिग्धों की एलिबाई लचर और कमजोर थी। पुलिस और सुनील ने पाँचों को ड्रिल किया लेकिन कोई भी क़त्ल का इलज़ाम लेने को तैयार नहीं। पुलिस का कातिल को पकड़ने का तरीका होता है – संदिग्धों में से एक-एक को चेक करो और एलेमिनट करते रहो, जो अंत में बचेगा वो कातिल होगा। लेकिन इस कहानी में न पुलिस और न ही सुनील, किसी संदिग्ध पर से अपनी शक की दृष्टि हटा पा रहे थे। “हिमेश सिंगला” के क़त्ल से जुड़ा ऐसा कौन सा टुकड़ा रह गया था, जिसको न जोड़ पाने के कारण कातिल की तलाश नहीं हो पा रही थी। ऐसा क्या कारण था की, सुनील उसी तहकीकात करते हुए उसी जगह पहुँच गया था जहाँ से उसने शुरुआत किया था।
एक अत्यंत उलझी हुई, मकड़ी के जाले की तरह उलझी हुई, मर्डर-मिस्ट्री जिसका कोई अंत नज़र नहीं आता, जब तक आप अंत तक इस उपन्यास को नहीं पढ़ते। कहानी की शुरुआत, एक क़त्ल के तहकीकात से होती है और ख़त्म उस तहकीकात के द्वारा कातिल को पकड़ लिए जाने पर होती है। यह उपन्यास एक मर्डर-मिस्ट्री है लेकिन इसमें पाठक साहब का व्यंगात्मक नजरिया भी दिखाई देता है। सुनील और रमाकांत की सयानी बातें (स्मार्ट टॉक) भी आपका मनोरंजन करती है। प्रभुदयाल और सुनील के बीच की तर्क-वितर्क, जिसमे सुनील अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से प्रभुदयाल पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था। हालांकि, कई प्रशंसकों को यह आशा थी की इस उपन्यास में सुनील और प्रभुदयाल की भयंकर टक्कर होगी लेकिन इस बार भी सभी प्रशंसकों को मायूस होना पड़ा।
इस उपन्यास की सबसे ख़ास बात – इसका लेखकीय था। इस लेखकीय में पाठक साहब ने अपने विस्तृत ज्ञान को महंगाई के बिंदु से लेकर हमारे साथ साझा किया है। जिन प्रशंसकों को इस बात से निराशा हुई थी की “कोलाबा कांस्पीरेसी” में लेखकीय नहीं मिल पाया, उन्हें इस लेखकीय से अभूतपूर्व ख़ुशी होगी।
आप इस उपन्यास को कितने सितारे देते हैं, यह मैं पूछना नहीं ��ाहुगा लेकिन मैं आपको जरूर बताना चाहूँगा की यह उपन्यास ५ सितारों में से पुरे ५ सितारे का हक़दार है।
आभार
राजीव रोशन