यह प्रेम बैर करा देता है, हम अपनी-अपनी सोचते रहते हैं यह हमें अपनों से दूर कराता रहता है। यह ऊपर ले देखने में प्यार लगता है, पर असल में यह काम होता है, जो अपने फूलों के बाणों से घायल करता हैं और हमें मारता है, हम प्रेम समझते रहते हैं और काम के आवेश में गर्त में गिरते रहते हैं। और घर वाले हमारी इस दशा को देख हमसे दूर हो जाते हैं। पर हम उन्हें कुछ न मानते हुए अपने मन के अर्थात काम के अनुसार चलते जाते हैं। जब मैंने लिखने के तीन महीने बाद इन कविताओं को पढ़ा तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह मैंने ही लिखी है। जरा-जरा से वाक्यों में मैंने कितनी बड़ी बात कह दी है। यह प्यार की तड़प जाहिर करतीं, बिछुड़न की गुस्सा भी है और भगवान से दुख मिटाने की और महबूब से मिलाने की प्रार्थना भी है। इसी प्रेम या काम के आवेश म