'असल-अनंत' को फिर पढ़ा; फिर वही जादू चेतना को चौंकाने लगा। इन कविताओं के शब्द तरह-तरह के पवित्र पानियों और अमृतधाराओं से धुले हुए हैं; उनमें एकांत और मौन का वास है ; वे शब्द ना हों साक्षात पेड़ और पत्थर हों, जिन्हें किसी जनूनी शिल्पी ने किन्ही दैवी छेनियों से तराशा हो.ये कविताएँ रास्ते दिखाती हैं जिन पर चले बग़ैर हिंदी कविता अपनी नियति के नज़दीक भी नहीं पहुँच सकती. इन्हें पढ़ते-पढ़ते मैं किसी दूसरी दुनिया की सैर करता रहा।