विक्रमादित्य साहसांक उनके द्वारा लिखा गया ऐतिहासिक उपन्यास है जो उन्होंने अत्यधिक अध्ययन और खोज के बाद लिखा। इस उपन्यास का नायक चन्द्रगुप्त द्वितीय है जिसे गुरुदत्त जी ने विक्रमादित्य साहसांक मानते हुए विक्रम संवत का प्रवर्तक सिद्ध किया है। प्राचीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर राजनीति तथा प्रेम का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है यह उपन्यास अति रुचिकर तथा विवेचनापूर्ण है। निःसन्देह हिन्दी भाषी पाठकों के लिये यह उपन्यास अत्यन्त ही मनोरंजक सिद्ध होगा।
श्री गुरुदत्त की अपार खोज के परिणामस्वरुप प्रणयित उपन्यास जिसमें उन्होंने भारतीय इतिहास के युगपुरुष, विक्रम संवत के प्रवर्तक, देश, धर्म व भारतीय वाङ्मय के सेवक, भारतवर्ष की सीमाओं के विस्तार व शत्रु विनाशक, महाराज विक्रमादित्य को नायक के रूप में उभारा है।