ये कहानी है ऊँची दुकान के फ़ीके पकवानों की, बड़े-बड़े नाम वालों की, पर छोटे दर्शन वालों की। कहानी में जब-जब कॉलेज का ज्वार चढ़ता है, गाँव में आते ही भाटा सिर पर फूट जाता है। कहानी के किरदार ऐसे कि प्रैक्टिकल होने के नाम पर ग़रीब आदमी की लंगोट भी खींच लें। कुछ कॉलेज के छात्र ऐसे हैं जिनकी जेबों तक से गाँव की मिट्टी की सुगंध आती है और कुछ ऐसे जो अच्छे शहरों की परवरिश से आकर इस ओखली में अपना सिर दे गए हैं।
कहानी के हर छात्र का सपना आईएएस/आईपीएस बनने का नहीं है, कोई सरपंच भी बनना चाहता है तो कोई कॉलेज ख़त्म होने के पहले ही ब्याह का प्लेसमेंट चाहता है।
कहानी में अर्श है और फ़र्श भी, आसमान भी है और खजूर भी। कहानी में गाँव में कॉलेज है या कॉलेज में गाँव, प्रेम जीतता है या पढ़ाई, दोस्ती जीतती ह
A simple read and a good relatable story. Really well written characters.
The depth of the story was surface level though. Would've preferred if the author took time with characters and let the story unfold a little more than the rush it was towards the end.
कभी गाँव कभी कॉलेज लेखक अगम जैन का पहला उपन्यास है और इसकी थीम UPSC की तैयारी पर आधारित है, जो आजकल युवाओं के बीच काफी चर्चित विषय है। शायद इसी वजह से यह किताब भी काफ़ी लोकप्रिय हो गई। लेकिन अगर मैं अपनी बात करूँ, तो मुझे इसकी कहानी काफ़ी सामान्य और सीधी-सादी सी लगी। पूरी कहानी एक ही मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती रही और कई जगहों पर काफी खिंची हुई महसूस हुई। कुछ हिस्सों में बोरियत भी होने लगी, क्योंकि ज़्यादा कुछ नया या अलग नहीं था।
हां, ये ज़रूर कहूँगा कि लेखक का ये पहला प्रयास होने के नाते उनकी कोशिश अच्छी रही है, और उन्होंने एक युवा वर्ग से जुड़ा मुद्दा उठाया है जो काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन शायद मैं इस कहानी से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया। मेरे लिए ये किताब ज़्यादा असरदार नहीं रही।