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Kabhi Gaanv Kabhi College । कभी गाँव कभी कॉलेज

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ये कहानी है ऊँची दुकान के फ़ीके पकवानों की, बड़े-बड़े नाम वालों की, पर छोटे दर्शन वालों की। कहानी में जब-जब कॉलेज का ज्वार चढ़ता है, गाँव में आते ही भाटा सिर पर फूट जाता है।
कहानी के किरदार ऐसे कि प्रैक्टिकल होने के नाम पर ग़रीब आदमी की लंगोट भी खींच लें। कुछ कॉलेज के छात्र ऐसे हैं जिनकी जेबों तक से गाँव की मिट्टी की सुगंध आती है और कुछ ऐसे जो अच्छे शहरों की परवरिश से आकर इस ओखली में अपना सि‍र दे गए हैं।


कहानी के हर छात्र का सपना आईएएस/आईपीएस बनने का नहीं है, कोई सरपंच भी बनना चाहता है तो कोई कॉलेज ख़त्म होने के पहले ही ब्याह का प्लेसमेंट चाहता है।


कहानी में अर्श है और फ़र्श भी, आसमान भी है और खजूर भी। कहानी में गाँव में कॉलेज है या कॉलेज में गाँव, प्रेम जीतता है या पढ़ाई, दोस्ती जीतती ह

134 pages, Kindle Edition

Published May 18, 2024

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Agam Jain

2 books

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1 (3%)
Displaying 1 - 6 of 6 reviews
Profile Image for Nikhil Talwar.
221 reviews7 followers
December 22, 2025
एक गाँव जो हम छोड़ आए और एक शहर जिसको हम छोड़ कर भाग जाना चाहते हैं, इन दोनों के बीच की कहानी हैं ये उपन्यास

हास्य और गंभीर विचारों की माला में अपनी एक विशेष प्रेरणा भी है , कहानी अपने आप में जीवन है।

एक फिल्म की तरह चली इस पढ़ने की यात्रा को करने में मजा आया
Profile Image for Mansi.
17 reviews
October 12, 2024
Simple plot. stereotypical characters. however, good observations, analogies, choice of words, and that makes the book readable.
2 reviews
May 17, 2025
Simple, easy going and engaging. Finished in one day. Just in case you want to read something ligh hearted.
Profile Image for Sowmya.
23 reviews5 followers
December 28, 2025
A simple read and a good relatable story. Really well written characters.

The depth of the story was surface level though. Would've preferred if the author took time with characters and let the story unfold a little more than the rush it was towards the end.
Profile Image for Shashwat Ratna Mishra.
80 reviews
August 10, 2025
कभी गाँव कभी कॉलेज लेखक अगम जैन का पहला उपन्यास है और इसकी थीम UPSC की तैयारी पर आधारित है, जो आजकल युवाओं के बीच काफी चर्चित विषय है। शायद इसी वजह से यह किताब भी काफ़ी लोकप्रिय हो गई। लेकिन अगर मैं अपनी बात करूँ, तो मुझे इसकी कहानी काफ़ी सामान्य और सीधी-सादी सी लगी। पूरी कहानी एक ही मुद्दे के इर्द-गिर्द घूमती रही और कई जगहों पर काफी खिंची हुई महसूस हुई। कुछ हिस्सों में बोरियत भी होने लगी, क्योंकि ज़्यादा कुछ नया या अलग नहीं था।

हां, ये ज़रूर कहूँगा कि लेखक का ये पहला प्रयास होने के नाते उनकी कोशिश अच्छी रही है, और उन्होंने एक युवा वर्ग से जुड़ा मुद्दा उठाया है जो काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन शायद मैं इस कहानी से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया। मेरे लिए ये किताब ज़्यादा असरदार नहीं रही।
Displaying 1 - 6 of 6 reviews

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