‘वरदायिनी’ एक नारी प्रधान उपन्यास है और नायिका अपने इर्द-गिर्द के वातावरण को लाभान्वित करते हुए स्वयं भी जीवन पर्यंत सरस्वती की उपासक बनी रहती है। यह कहानी नायिका के जन्म के पश्चात की समस्त उपलब्धियों को व करती है। वैसे भी, एक नारी की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं उसके नारी होने में है। क्योंकि एक नारी अपने पूरे जीवन में जिन झंझावातों को सहते हुए आगे बढ़ती है, वो किसी और के बस की बात नहीं है। विवाहोपरांत ससुराल में रहकर नायिका अपना घर सँभालने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी करती है, जो सरस्वती का परम उपासक होने की मिसाल है।