‘‘यही मुनासिब भी है। लड़की हामिला है। उम्र इसकी बाईस साल की है। और इसी नवम्बर में इसकी शादी नवाब वज़ीर अली खाँ से होना करार पा चुका है।’’परेशानी की रेखाएँ डाक्टर के माथे पर खिंच गईं। उसने कहा, ‘‘लेकिन, लेकिन इसमें मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ। आप मेरे मुरब्बी ज़रूर हैं, पर आप मुझसे कोई गैरकानूनी काम कराने की तो उम्मीद ही न रखेंगे।’’‘‘कतई नहीं, मैं तो आपसे महज़ एक इन्सानी फर्ज़ अदा कराना चाहता हूँ। आपके वालिद की दोस्ती के नाम पर, या उस सलूक के बदले जिसका अभी आपने ज़िक्र किया है। इसके सिवा मैं आपको इसका मुनासिब मुआवज़ा भी दूँगा।’’‘‘लेकिन आप चाहते क्या हैं? किस तरह मैं अपना फर्ज़ अदा कर सकता हूँ।’’‘‘बताता हूँ। पहले आप मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिए।’’‘‘पूछिए आप।’’‘‘आपकी शादी हो गई है?’’‘‘जी हाँ।’’‘‘आपको कोई बाल-बच्चा है?’’‘‘जी नहीं।’’‘‘बेहतर, तो आप इस बच्चे के ‘धर्मपिता’बन जाइए। मैंने हिन्दू आलिमों से सुना है, भले हिन्दू ‘धर्मपिता’होना सवाब का काम समझते हैं। मैं इक्कीस गाँवों का समूचा इलाका इस बच्चे के नाम कर दूँगा। लेकिन बज़ाहिरा आप बच्चे के धर्मपिता नहीं, असल बाप ही कहलाएँगे। यानी यह बच्चा मेरी लड़की का नहीं, आपका ज़ाती बच्चा, आपका और आपकी बीवी का पैदायशी बच्चा कहलाएगा। और मैं आपके इस बच्चे का ‘धर्मपिता’बनकर अपनी आधी जायदाद, यानी इक्कीस मौज़ो का इलाका बच्चे के नाम लिख दूँगा।’’डाक्टर का सिर घूम गया। उसने कहा—‘‘लेकिन यह हो कैसे सकता है?’’‘‘आप मंज़ूर कर लीजिए तो मैं यह भी अर्ज़ करूँगा।’’‘‘आप पूरी बात कर लीजिए, तो मैं कुछ सोचूं और अर्ज़ करूं।’
परन्तु दिलीप ने इस रिश्ते को बिलकुल अस्वीकार कर दिया। उसने कहा, ‘‘वे लोग बिलकुल भ्रष्ट हैं। सबके साथ उनका खानपान है। उनकी लड़की भी अंग्रेज़ी फैशन की गुलाम है। ऐसे लोगों के साथ सम्बन्ध नहीं कर सकता। न मैं विलायती बीवी पसन्द करता हूँ।’’दिलीपकुमार की स्पष्ट बातें सुनकर डाक्टर बड़े असमंजस में पड़े। दिलीप की बात में कुछ अनौचित्य न था। डाक्टर अपनी गृहवधू को स्वयं उसी रूप में देखना चाहते थे जिसमें दिलीप। वे एकाएक कुछ न कह सके। परन्तु उन्होंने दिलीप से बिना ही पूछे राय साहब को स्वीकृति का पत्र लिख दिया था–इसका उन्हें बहुत मलाल हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘दिलीप, मुझसे बड़ी गलती हो गई। मैंने तुमसे बिना पूछे ही रायसाहब को पत्र लिख दिया। अब क्या होगा भला?’’‘‘बहुत बुरा हुआ बाबूजी! उनसे अब भी सब बातें साफ-साफ कही जा सकती हैं। वे बडे़ आदमी हैं, सज्जन हैं, सब बातें समझते हैं। नाराज़ न होंगे, प्रसन्न ही होंगे।’’‘‘लेकिन बेटे, एक बार फिर सोच लो। यह तो तुम्हीं कह चुके हो कि वे सज्जन हैं, ऐसे सम्बन्ध मिलने सुलभ नहीं।’’‘‘परन्तु बाबूजी, मेरे विचार आपको मालूम हैं। मैं सीता-सावित्री का आदर्श पसन्द करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि सीता-सावित्री के वंश की ही कोई लड़की आपके चरणों का आशीर्वाद प्राप्त करे।’’विनम्रता और दृढ़ता दिलीप का स्वभाव था। डाक्टर उसकी विनय और दृढ़ता से निरुत्तर हो गए। उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘एक बार अपनी माँ से भी तो सलाह कर लो।’’‘‘माँ को जानता हूँ बाबूजी, वे तो मेरे ही धर्म को मानती हैं। मेम को बहू बनाना कभी पसन्द नहीं करेंगी।’’‘‘पर बेटे, वेशभूषा ही से क्या, रायसाहब की पुत्री रूप, गुण और शील में अद्वितीय है। देखोगे तो पसन्द करोगे।’’‘‘लेकिन रूप, गुण और शील से क्या–आदर्श और विचार भी तो उसके हमारे ही समान होने चाहिए, आचरण और भावना भी तो हमारे ही अनुकूल होनी चाहिए।’’‘‘लेकिन भैया, आज के स्वतन्त्रता और समानता के युग में जो तुम इतनी कट्टरता के विचारों को लिए फिरते हो सो क्या ठीक है?’’‘‘मैं आपके समान विद्वान् नहीं बाबूजी। पर देखता हूँ कि मैं कोरा कट्टर ही नहीं हूँ, कुछ विचार भी सकता हूँ, और आदर्श और संस्कृति में तो कट्टरता कायम रहनी ही चाहिए। नहीं तो फिर जातीयता कहाँ रह सकती है।’’‘‘जातीयता न रहने पर भी तो काम चल सकता है दिलीप।’’‘‘कहाँ, आपने हिटलर को देखा, मुसोलिनी को देखा, किस तरह जातीयता के नाम पर ही वे मर मिटे। अंग्रेज़ हैं, फ्रेंच हैं, यूरोप के अन्य राष्ट्र हैं, एक जातीयता के नाम पर, एक जातीयता के बल पर ही दुनिया में जीते हैं। हम हिन्दू दरिद��र हैं, गुलाम हैं। हमारी आर्थिक और राजनीतिक दासता ने शताब्दियों से हमें पंगु बना कर रखा है, इसी से गुणवान्, विद्वान्, धर्मात्मा धीर-वीर रहते हुए भी हम दास-भाव से मुक्त नहीं हो पाते; पराजित ही रहते हैं। अब एक जातीयता ही तो है–जिसके बल पर हम सब एक हो सकते हैं, संगठित होकर अपनी दासता की बेड़ी काट सकते हैं।’’
प्रेमालाप तो कुछ हुआ नहीं, पर प्रेम का अपरिसीम आदान-प्रदान हो गया। दिलीप का वह अस्पृष्ट यौवन आहत सांड की भाँति कराहने और चीत्कार करने लगा। वह बड़ी देर तक तो उस कमरे में प्रेत-आविष्ट की भाँति चक्कर काटता रहा, फिर शय्या पर गिरकर छटपटाने लगा। जैसे जलती हुई, दहकती हुई कोयलों की अँगीठी पर वह भूना जा रहा हो–जीवित। एक असह्य वेदना, एक अनिर्वचनीय आकांक्षा, एक दुर्दम्य भूख-प्यास उसे आक्रान्त कर गई। आज तक के जीवन में सर्वथा अनुभूत पीड़ा से उसके प्राण व्याकुल हो गए। उसका सारा आदर्शवाद, हिन्दू संस्कृति, धर्म-विचार, तर्क, बुद्धिवाद न जाने किस अतल भूतल में जाकर लोप हो गए। रह गई माया–केवल माया। उसके मानस-पटल पर, नेत्रों और आत्मा के अणु-अणु में माया शत-सहस्र मूर्त रूप धारण करके आनन्द-नृत्य करने लगी। उस आनन्द को–शोभा की सुषमा को आत्मसात् करने, अपने निकट लाने, अपने में ओतप्रोत करने को वह जितना ही व्यग्र होने लगा, उतना ही वह उससे दूर, अधिक दूर, उसकी पहुँच की सीमा के बाहर दिख पड़ने लगी।
वह अपनी आँखों से यूरोप के जीवन को देख आई थी; उसे जीवन में स्पर्श कर आई थी। वह उसके गुण-दोषों से भी परिचित थी। इसी से आर्य-सभ्यता, हिन्दू संस्कृति पर उसकी श्रद्धा थी। अपनी श्रद्धामयी माता का उस पर बहुत प्रभाव था। पर वह प्रगति की शत्रु न थी। नए विचार, ज्ञान-विज्ञान की विरोधिनी न थी। न वह कुरीतियों की समर्थक थी। रूढ़िवाद से उसे घृणा थी। दिलीप इतना उच्चकोटि का विद्वान्, दर्शनशास्त्र का ग्रेजुएट होने पर भी अपनी हिन्दू संस्कृति पर आस्था रखता था। इससे वह मन ही मन दिलीप के प्रति श्रद्धाभाव रखने लगी थी। दिल्ली को जब वह चली थी तो उसके मन में एक गुदगुदी हो रही थी। वह सोच रही थी–क्या हर्ज है, ममी की घड़ी जब दूँगी तो ज़रा नोक-झोंक भी होगी। देखूँगी बाबू साहेब की फिलासफी। ज़रा व्यंग्य करूँ, जलाऊँगी, चिकोटी काटूँगी, सूई चुभाऊँगी! फिर उस तड़प का मज़ा लूँगी।
डाक्टर ने सूखे मुँह घबराए आकर अरुणा से कहा, ‘‘दिलीप रंगमहल में आग लगाने गया है, बहुत-से संघी गुण्डे उसके साथ हैं।’’ अरुणादेवी का मुँह भय से सफेद हो गया। उन्हाेंने कहा, ‘‘तो अब बानू का क्या होगा?’’‘‘मेरी समझ में नहीं आता, क्या किया जाए।’’‘‘तुम्हें खुद जाकर उन्हें यहाँ ले आना चाहिए था।’’‘‘मैंने बहुत कहा, पर उन्होंने किसी तरह आना स्वीकार नहीं किया।’’‘‘दिलीप को तुम समझाओ।’’‘‘बेकार है, उस पर खून सवार है। क्या मैंने उसे कम समझाया है? समझाने-बुझाने का यह नतीजा हुआ कि आज आठ दिन से उसकी सूरत तक नहीं दिखाई दी।’’