नब्बे के ही दशक में जब राजनेताओं के दिन-दहाड़े सरेआम मर्डर होने लगे तो ज़ाहिर है कि नेताओं के मन में ख़ौफ़ बैठ जाना ही था और नई पीढ़ी के वह लोग, जो देश के लिए राजनीति के सहारे कुछ करने की वाक़ई चाह रखते थे, उन्होंने इस राह पर चलने के अपने इरादों पर लगाम लगा दी। राजनीति को अपराधियों, हत्यारों, डकैतों और बलात्कारियों के हाथों में जाने देने का यह यथार्थ बड़ा भयावह था।
बस, यही वह समय था जब बड़े-बड़े ख़ूँख़्वार अपराधियों के लिए राजनीति के प्रवेश द्वार पर स्वागत के लिए फूल मालाएँ लेकर ख़ुशी-ख़ुशी लोग नज़र आने लगे। राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण की यह शुरुआत धमाकेदार थी, उसमें ग्लैमर था, धन-दौलत थी और आधुनिक हथियारों को निहारने का मज़ा भी और जलवा अलग से। इन सियासी माफ़ियाओं की गाड़ियों का
The book is about one of the most wanted Gangster of UP, shree prakash Shukla who was very popular in 90's because of its openly shoutout by AK 47. Book is written by the ex IPS officer Rajesh pande who was not just part of STF ( special task force) but also lead it and within 6 months he and his team encounter the famous gangster for which the STF was found. All the incidents and investigation of this operation is described very briefly and each small details are also captured. Previously lot of written on the same subject I.e about this Gangster, one web series also released about shriprakash Shukla but none of any Previous works were as detailed as this book captured. It is a nicely written book 📖.
2.5/5 I would have rated the book much lower had most of the major events mentioned not been verifiable through public records. One shudders at the thought of the impunity with which criminals used to operate in UP and Bihar of the 90s.
इस किताब की शुरुआत ही बिहार के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र से होती है। उसके बाद 90 के दशक के अपराधी श्री प्रकाश शुक्ल और उसके गैंग की कहानी शुरू होती है। समाज इन लोगों के आपराधिक कार्यों से कितनी डरी होती है इसके कई उदाहरण देखने को मिलते है इस किताब में । अपराध पूरी तरह चरम पर होती है जिसकी वजह से बिहार से लेकर उत्तरप्रदेश तक लोगों में दहशत होता है ।
घटनाएँ इतनी है कि कई बारी आह भी निकलती है, कई बड़ी पलक भी नहीं झपकता है। बेहतरीन लेखन के साथ शब्द सच के साथ बगल में खड़ा दिखता है। कई बार किताब सोशल साइकोलॉजी की भी बात करती है कभी स्कूल के ज़रिये तो कभी ख़ुद जब लेखक अपने बच्चों की बात करते है श्रीप्रकाश के पहले फ़ोन कॉल के बाद लेकिन एक तरह से ये भी समझा जा सकता है। अच्छी बात यह है कि किताब पूरी तरह अपराध और अपराधियों पर ही फोकस्ड है।
प्रथम दृष्टांत अनुभव है ये लेखक राजेश पांडेय जी का जो की उत्तर प्रदेश से आई जी चुनाव सेल के पद से सेवानिवृत्त हुए और एस टी एफ के संस्थापक रहे है जिसका गठन श्रीप्रकाश शुक्ला को ख़त्म करने के लिए किया गया गया था।
पाण्डेय जी बहुत ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी रहे हैं इनका नाम 90के दशक के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों में है मोबाइल ट्रेसिंग में इनकी ही भूमिका मुख्य रूप से थी जिसकी वजह से ही S T F ने इतने बड़े मिशन को शानदार ढंग से पूर्ण किया
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कथाशैली में मसाले की अधिकता है। सत्यकथा - मनोहर कहानियाँ के पाठकों को ये पुस्तक बहुत रोचक लग सकती है। लेखक ने न सिर्फ खलनायक और उसके साथियों के काल्पनिक वार्तालाप में भरपूर मसाला डालने के साथ-साथ उनके मुँह से अपनी तारीफ भी करवा ली है। कई जगहों पर कच्चा-पक्का लेखन भी मुँह का स्वाद बिगाड़ता है, पुस्तक का सही संपादन इसे और भी चुस्त बना सकता था।