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बनवास

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उषा प्रियंवदा के समग्र लेखन में से 13 श्रेष्ठ कहानियों का यह चयन उनकी मानवीय संवेदनाओं और सरोकारों का प्रतिनिधित्व करने वाला है, साथ ही साथ यह उनकी कहानी-कला के विकास का भी अनूठा दस्तावेज़ है।

‘नई कहानी’ आंदोलन के दौर में अपनी कहानियों के स्वर और दृष्टि की विशिष्टता की वजह से बहुचर्चित और बहुप्रशंसित रहीं उषा प्रियंवदा आज हिंदी कहानी की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। हिंदी कहानी की विशेषता पर होने वाली किसी भी तरह की चर्चा इनकी कहानियों के जिक्र के बगैर लगभग अधूरी है। बिना किसी तरह की नारेबाज़ी के उषा जी अपनी कहानियों में पक्षधरता जिस सादगी से अभिव्यक्त करती हैं, वह अपने आप में एक मिसाल है। व्यक्ति और परिवार, परिवार और समाज के अंतर्संबंधों की विसंगतियों और विडंबनाओं को जितनी सूक्ष्मता से उषा प्रियंवदा ने चित्रित किया है, उतनी ही व्यापकता में उन्होंने व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक संसार के बीच के संबंध को भी उकेरा है। आज़ादी के बाद के भारत के बदले हुए मानसिक और सामाजिक परिवेश को हम उषा जी की कहानियों में देख और महसूस कर सकते हैं।

263 pages, Paperback

First published January 1, 2009

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Usha Priyamvada

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Usha Priyamvada (Hindi: उषा प्रियंवदा) is the nom-de-plume of Usha Nilsson (née Usha Saksena; 1930, Kanpur – ), an Indian-born American emerita professor of South Asian Studies at the University of Wisconsin, Madison, a novelist and short-story writer in Hindi and a translator from Hindi to English. She was a winner of the Premchand Prize in 1976, and the Padmabhushan Moturi Satyanarayan Puraskar in 2009.

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