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Pathik Mein Arawali Ka
“अरावली सिर्फ़ पहाड़ ही नहीं है, वह हमारी सभ्यता और संस्कृति का संरक्षक भी है। अरावली की यात्रा के दौरान जहाँ मुझे ध्वस्त सभ्यताएँ भी दिखीं तो युद्ध की रणभेरियों के मैदान भी मिले। आदिदेव शिव तो बार-बार सामने आते ही रहे पर महावीर भी कोई कम मंदिरों में नहीं दिखे, यहाँ तक कि बुद्ध और मोहम्मद के चाहने वाले भी खूब मिले। कुल मिलाकर एक लघु भारत की खोज का अवसर मिला और जिस ‘आइडिया आफ़ इंडिया’ की बात बार-बार होती है, उसकी झलक अरावली में जगह-जगह मिली। लेकिन साथ ही मिले तेज़ी से ध्वस्त होते वहाँ के पहाड़, जंगल, पेड़-पौधे और प्रकृति के विनाश के अनगित उदाहरण। ये सब देखकर महसूस हुआ कि आने वाले समय में शायद अरावली पर्वत केवल किताबों में ही पढ़ने-देखने को मिलेगा और भविष्य की पीढ़ियाँ क्या इसका महत्त्व समझ पायेंग
202 pages, Kindle Edition
About the author
Bhanwar Meghwanshi
9 books12 followersBorn in 1975, Bhanwar Meghwanshi joined the Rashtriya Swayamsevak Sangh at the age of thirteen. Since leaving the RSS in 1991, he has been an activist and a journalist chronicling the Dalit movement. He divides his time between overseeing the Ambedkar Bhavan in Sirdiyas and his political work that takes him across the country. Main ek swayamsevak tha (2019) is his first book.
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Community Reviews
Displaying 1 - 1 of 1 review
August 22, 2026
यह यात्रा वृतांत उन चंद पुस्तकों में से है जो किसी पर्वत श्रृंखला के साथ चलते हुए लिखी गई है l पिछली बार ऐसा यात्रा वृतांत मैंने लेविसन वुड की वाकिंग द हिमालय पढ़ा थी l
25 दिन की अरावली यात्रा मे लेखक ने अपनी कलम से बहुत कुछ लिखा है, जिसमें कई कुरीतियों को जैसे जातिवाद,धर्म उन्माद, अति राष्ट्रवाद इत्यादि का बखूबी वर्णन किया है lलेखक अरावली से भलीभांति परिचित है l इसका पाठक को लाभ तब मिलता है जब पाठक गोविंद गुरु, कालीबाई भील, कर्नल जेम्स टोड इत्यादि जैसे ऐतिहासिक किरदारों को जानता है l यह समस्या तब बन जाती है जब लेखक को यह लगता है पाठक को अरावली के बारे में सतही जानकारी तो है ही l परंतु, मुझ जैसे पाठक के लिए अरावली इस पुस्तक से पहले एक भूगोल का अध्याय मात्र था l मैं न वहां की बोली जानता हूँ न वहां के लोगों को l
पुस्तक में न कोई ऐसा चित्र है जो मेरा वहाँ के मेलों,नदियों,जंगलों, लोगों, शहरों, ग्रामों इत्यादि से परिचय कराने में सक्षम हो l उसके अतिरिक्त लेखक के साथ चलने वाले लोग कौन थे, इस सम्बंध में विशेष जानकारी नहीं दी गई है l
अतः यह एक अच्छी पुस्तक बन कर रह जाती है, एक उत्कृष्ट पुस्तक बन नहीं पाती l मेरी तरफ से तीन 🌟 l
25 दिन की अरावली यात्रा मे लेखक ने अपनी कलम से बहुत कुछ लिखा है, जिसमें कई कुरीतियों को जैसे जातिवाद,धर्म उन्माद, अति राष्ट्रवाद इत्यादि का बखूबी वर्णन किया है lलेखक अरावली से भलीभांति परिचित है l इसका पाठक को लाभ तब मिलता है जब पाठक गोविंद गुरु, कालीबाई भील, कर्नल जेम्स टोड इत्यादि जैसे ऐतिहासिक किरदारों को जानता है l यह समस्या तब बन जाती है जब लेखक को यह लगता है पाठक को अरावली के बारे में सतही जानकारी तो है ही l परंतु, मुझ जैसे पाठक के लिए अरावली इस पुस्तक से पहले एक भूगोल का अध्याय मात्र था l मैं न वहां की बोली जानता हूँ न वहां के लोगों को l
पुस्तक में न कोई ऐसा चित्र है जो मेरा वहाँ के मेलों,नदियों,जंगलों, लोगों, शहरों, ग्रामों इत्यादि से परिचय कराने में सक्षम हो l उसके अतिरिक्त लेखक के साथ चलने वाले लोग कौन थे, इस सम्बंध में विशेष जानकारी नहीं दी गई है l
अतः यह एक अच्छी पुस्तक बन कर रह जाती है, एक उत्कृष्ट पुस्तक बन नहीं पाती l मेरी तरफ से तीन 🌟 l
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