क्या पता क्यों उसका नाम प्रेम रखा गया था, जबकि उसके हावभाव में कही भी प्रेम का अंश मात्र भी नहीं था। न तिरछी चितवन न सुंदरता को उभारने का जोग जतन ना ही रसभरी बातें और ना ही मदमाती मुस्कान कुल मिलाकर प्रेम नाम को वो कहीं से भी सार्थक नहीं करती थी। अवश्य ही अनाथालय वालों ने पुकारने के लिए जो सुझा वो नाम उस पर चस्पा कर दिया।