जब लेखक अपनी रचना को किताब का रूप देता है, तो यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं होता, बल्कि एक साधना होती है। लेखन और ध्यान में गहरी समानता है। ध्यान में साधक अपने मन को स्थिर कर आत्ममंथन करता है, वैसे ही लेखक शब्दों के माध्यम से अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है।
लेखन में धैर्य, एकाग्रता और अनुशासन की आवश्यकता होती है। जैसे ध्यान में व्यक्ति बाहरी दुनिया से हटकर अपने भीतर झांकता है, वैसे ही लेखक अपनी कल्पना और अनुभवों को गहराई से महसूस करता है। लेखन की यह प्रक्रिया उसे स्वयं से जोड़ती है और एक आत्मिक संतोष प्रदान करती है।
ध्यान और लेखन, दोनों में मौन की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेखक जब लिखता है, तो वह अपने भीतर की आवाज को सुनता है। यह संवाद उसकी रचना में गहर&#