औरत ने कुदरत को सँवारकर रखने में अपनी हिस्सेदारी निभाई क्योंकि उसका जन्म ही सृजन के लिये हुआ था। उसने युद्ध नहीं रचे। उसे इसकी फ़ुरसत ही नहीं थी। तमाम तरह की विभीषिकाओं के बीच और उनके गुज़र जाने के बाद भी उसने जीवन के बीज बोए। इसके लिये उसे कभी किसी अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं रही। यह और बात है कि न जाने कब से पिलाई जाती रही त्याग, ममता और श्रद्धा की घुट्टियों ने उसके अस्तित्व को इस कदर बांधा कि वह आज तक इन्हीं छवियों में मुक्ति तलाशती आ रही है।
बहुत मुमकिन है आपने इस किताब में आने वाली औरतों में से अनेक के नाम न सुने हों। जीवन की भयानक त्रासदियों से गुज़रकर वे टूटीं, गिरीं और फिर उठकर खड़ी हुईं। ज़रूरी नहीं कि उन्हें किसी के सामने ख़ुद को किसी तरह साबित ही करना था लेकिन उन्होंने ज़िंदगी चुनी। उनमें से एक-एक हमारे ही भीतर लुक-छुपकर बैठी है, हमारे-आपके आसपास की औरत है। इस औरत ने बड़े एहतियात से तमाम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई है। अशोक पाण्डे इसी औरत का हाथ थाम लेते हैं। —स्मिता कर्नाटक
अशोक पाण्डे जब लिखते हैं तो हमारी आपकी भाषा में, और उन्हीं शब्दों से किसी भी दृश्य को जीवंत कर देते हैं! इस किताब में जो दुनिया भर की औरतों की कहानियां उन्होंने लिखी हैं वो हर किसी को पढ़नी चाहिएं. इनमें से कुछ को हम जानते हैं और कुछ के बारे में बहुत ही कम. इनमें से कुछ औरतें तो हमारे पास ही मिल जाएंगी, पड़ोस में, ऑफिस में, परिवार में! मेरे विचार में ये किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए और कुछ नहीं तो जीवन को अच्छी तरह समझने के लिए. और कहानियों को इतना रोचक तरीके से लिखा है कि बस पढ़ते ही जाएं...