"Talaash" defies the conventions of victory and defeat, hero and villain, instead offering an intimate exploration of two lives entwined in longing and selfdiscovery.
Sarthak and Sana’s paths cross and diverge repeatedly. Each meeting, each separation leaves an echo in their hearts—a reminder that some roads never end, and some desires remain perpetually unfulfilled.
This journey reveals how love finds refuge in the most unexpected places, lingers in forgotten corners of memory, and ultimately holds up a mirror, showing us the incompleteness within ourselves, and helping us discover our true selves.
Amid the silent reverberations of their choices and the unfinished spaces between them, one lingering question remains "What if everything we lost came back? Would it ever be the same again?"
"तलाश" जीतहार, नायकखलनायक की हदों को तोड़, दो ज़िंदगियों की गहराई में उतरती है, जो अनकही ख्वाहिशों और खुद को तलाशने की जद्दोजहद में एकदूसरे से जूझते रहते हैं।
सार्थक और सना के रास्ते आपस में मिलते हैं और फिर बिखरते हैं। हर मुलाकात, हर बिछड़ाव उनके दिलों में एक गूंज छोड़ जाती है... यह समझाने के लिए कि कुछ रास्ते कभी खत्म नहीं होते... और कुछ ख्वाहिशें हमेशा अधूरी ही रहती हैं।
यह एक ऐसा सफ़र है, जो दिखाता है कि प्यार कैसे अनजानी जगहों में बस जाता है, भूली हुई यादों के कोनों में ठहर जाता है। आखिर में, यह हमें वो आईना दिखाता है, जिसम&
यौवन में पदार्पण जीवन में एक नए अध्याय का आरंभ होना है, खासकर जब आप मध्यम वर्गीय परिवार से हैं, जहां सिर पर वर्तमान का बोझ तो होता ही हैं पर उससे ज्यादा आगे को पाने की तीव्र जिजीविषा। और मुश्किलें तब बढ़ जाती हैं जब आप खूबसूरती से भरी इस दुनिया की चकाचौंध में अपने आप को खोने लगते हैं। मनोज गर्ग कृत यह उपन्यास -"तलाश" जीवन के इन्ही प्रच्छन्न पहलुओं का विस्तृत आख्यान है।
21 वी सदी की शुरुआत भी आम सा दिखने वाले लड़के सार्थक के यौवन अवस्था की शुरुआत से होती हैं जिसे तंगी और अभाव भरे जीवन से निकलकर अब उसे अपना स्वतंत्र अध्याय शुरू करना है, ऐसे में वह अपने जीवन को किस दिशा ले जाएगा, देखना दिलचस्प है।
यौवन अवस्था से जुड़ी आसक्ति और विकर्षण का समुचित समृश्रण है यह उपन्यास। अभाव को पूरा करने की अभिलाषा ही व्यक्ति को नए की तलाश हेतु तत्पर बनाती है। आज के नव युवक भी उपन्यास के सार्थक की भांति प्रेम की तलाश में भटक रहे हैं, लेकिन यह भटकाव शाश्वत नही है, जवानी का नशा और मांग है। आखिर किसे अपना पेट भरने की चाह नही होती? परंतु उससे ज्यादा होती हैं अधूरे प्रेम की कसक!
आगामी जीवन को स्थिर बनाने के लिए हमारे सार्थक बसों, कैन्टीन, और कोचिंग के चौखट पर चक्कर लगा रहे है, इस दौरान कहीं संध्या से मुलाकात होती है तो कहीं निकिता से। और फिर शुरू होती हैं सिलसिला अनगिनत खूबसूरत एवं उत्तेजित करने वाले पलों की जिसमें प्रेम, कामुकता, बेचैनी, और दुनिया भर की उलझने होती हैं। यह कालखंड बहुत मूल्यवान और अविस्मरणीय होता है, तभी तो लेखक ने भी इस कहानी को इतने सही ढंग से उकेरा हैं कि मानो ये उनकी ही हो।
कल्पना का पुट होने के बावजूद पूरे उपन्यास में कही भी बनावटीपन का बोध नही होता, सबकुछ सहज और अपना सा जान पड़ता है, शायद यह मैं इसलिए कह पा रहा हूं की मैं भी कभी ऐसे एहसासों से गुजरा हूँ, अतीत को वर्तमान से जोड़ने का अलग ही अहसास है इस कृति को पढ़ने में।
यह उपन्यास पुरातन साथियों के लिए जितना जरूरी अतीत के अनुभवों के कोमल स्पर्श के लिए है उतना ही मुफीद आज की नई पौध genz को अपनी जड़ से जोड़ने के लिए भी है, आखिर है तो यह प्रेम कहानी हम सबकी जो पूरी न हो सकीं!!
मेरी आंखों में झांक कर देखो डोर सांसों की थाम कर देखो रूह से लग के मेरे ख्वाब बुनो दिल की धड़कन कान धर के सुनो हर जगह एक छब तुम्हारी है प्यार का तो नहीं पता मुझको आस पर हर घड़ी तुम्हारी है....
'तलाश' मनोज गर्ग द्वारा लिखित यह कहानी पारंपरिक जीत-हार नायक-खलनायक की अवधारणाओं से परे पात्रों - सार्थक और सना - के जीवन को संवेदनशीलता से उकेरती है, जो बार-बार मिलते और बिछड़ते हैं।
यह उपन्यास हमें यह महसूस कराता है कि प्रेम केवल साथ होने का नाम नहीं, बल्कि कभी-कभी यह स्मृतियों के कोनों में ठहर जाता है, अनकहे सवालों में गुजता है और हमें अपने ही अधूरेपन से परिचित कराता है। मनोज गर्ग की लेखनी सरल होते हुए भी बेहद प्रभावशाली है। वह पात्रों की भावनाओं और उनके आंतरिक द्वंद को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि पाठक खुद को उनके स्थान पर रखकर सोचने को मजबूर हो जाता है।
वे बिना भारी भरकम शब्दों का प्रयोग किए बहुत गहरी बातें कह जाते हैं। उनके शब्दों में एक काव्यात्मक प्रवाह है। पात्रों के मनोभाव इतने सूक्ष्मता से उकेरे गए है कि पाठक उनके दर्द और उनकी उलझनों को अपनी ही उलझनों की तरह महसूस करने लगता है। यह उपन्यास प्रेम और विछोह के बीच की उस महीन रेखा को तलाशता है, जिसे पार करके कोई भी रिश्ता पूरी तरह समाप्त नहीं होता - बल्कि वह स्मृतियों में जीवित रहता है, खामोश सवालों के रूप में अनकही भावनाओं के रूप में।
"तलाश" केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि यह उन अनसुलझे सवालों और अधूरी इच्छाओं की पड़ताल भी है, जो जीवनभर हमारे साथ चलती है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए एक भावनात्मक अनुभव साबित होगी, जो प्रेम और आत्म-खोज की गहराई को महसूस करना चाहते हैं।