‘चक्का जाम’ की क़िस्सागोई बहा ले जाती है। देवानन्द दूबे की इस दुनिया में बंगाली माई का चमत्कार भी है और आज़ाद भारत में बचे एंग्लो-इंडियन समुदाय की त्रासदी भी; हवा में उड़ते संन्यासी भी हैं और छात्र-आन्दोलन को संरक्षण देती गृहिणियाँ भी।
यह उपन्यास एक बड़े देश की बड़ी घटनाओं में उलझे इनसान के छोटे सपनों की कहानी है। यहाँ व्यक्तिगत आदर्श पारिवारिक, ऐतिहासिक और राजनैतिक आदर्शों की छाया से दूर, खुले आकाश में आज़ाद खिलने को बेचैन है। यह मासूम बेचैनी इस उपन्यास में कुछ इस तरह उभरती है कि पात्र, घटनाएँ और उनकी बोली-बानी पाठकों के दिल-दिमाग में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं।
चक्का जाम प्रकाशित हुए कुछ महीने बीत गए हैं। मैं उत्सुकता से पुस्तक के किंडल वर्शन का इंतेज़ार कर रहा था। अब वह भी आ गया है।
उत्सुकता का कारण यह था कि ये उस समय की कहानी है जिसे मैं अपना ज़माना कह सकता हूं। यानी 70 का दशक, जब मैं स्कूल में भी था, कॉलेज में भी था और नौकरी में भी! जब मेरा शहर पटना देश- व्यापी संपूर्ण क्रांति का केंद्र था। आपातकाल के भयानक किस्सों वाले दिन और 1977 में आई जनता सरकार के सब्ज़ बाग़ वाले साल!
पुस्तक का मुख्य पात्र देव (देवानंद) कभी शाहाबाद के गाँव में दिखता है, कभी बंगाल के भद्रा रेलवे कॉलोनी में, वह जे पी आंदोलन के बीच पटना भी जाता है, और रांची के भी सांप्रदायिक दंगों में फंसता है। फलस्वरूप, उन दिनों का बहुमुखी चित्रण देखने को मिलता है। शहरों में क्या माहौल था इससे तो मैं वाक़िफ था पर छोटे कस्बों और गांवों में लोगों पर क्या गुज़र रहा था ये इस किताब के ज़रिए देखने को मिला।
उपन्यास का कैनवस बहुत बड़ा नहीं है, पर बारीकियां कई। 1962 का युद्ध, हड़तालों का दौरा, शहरों में बेरोज़गारी का आलम, छात्र आक्रोश, संपूर्ण क्रांति के सपनों वाला आंदोलन, सब का ज़मीनी स्तर से आंखों देखा हाल।
किताब में बदलते समाज का भी सुंदर चित्रण है। देव की बुआ छुआछूत मानती हैं। पर रहने की स्थिति बदल चुकी है इसलिए सिर्फ मुसलमानों और ईसाईयों से परहेज़ है, अन्य जातियों से नहीं। बच्चे इसको भी बकवास जानते हैं और बेझिझक मुसलमानी होटल में नाश्ता करते हैं और ईसाई दोस्त के घर केक और बिस्किट खाते हैं।
भाषा सरल है। और साथ में ठेठ बिहारी लहज़े और शब्दों का तड़का।
पर मुझे कथन थोड़ा बिखरा हुआ लगा। कथा कभी अतीत की, कभी वर्तमान की, अनावश्यक आगे-पीछे। परिणामस्वरूप, कहानी का प्रवाह बार-बार टूटा लगा। पर इसके बावजूद मैने इस किताब को बहुत दिलचस्प और पठनीय पाया।
समीक्षा : चक्का जाम (उपन्यास) लेखक : गौतम चौबे जी प्रकाशक : राधाकृष्ण पेपरबैक्स (राजकमल प्रकाशन समूह ) प्रथम संस्करण : दिसम्बर 2024 कुल पृष्ठ : 222 ___//___
कहानियों की एक खास बात होती है कि वो आपकों अपनी दुनियां में रखते हुए भी आपकी दुनियां बदल सकने की ताकत रखती है। कब कौनसा किरदार आपकी यात्रा की दिशा बदल दे कब कौन सा किस्सा आपके जीवन की कहानी का हिस्सा बन जाए ये भी एक संयोग की बात है। संयोग जिसका एक बहुत खास रिश्ता है गौतम चौबे जी द्वारा लिखे उपन्यास "चक्का जाम" से भी और ये संयोग ऐसा रचनात्मकता से से घुला मिला है देव की कहानी से की आप कब इस संजोग की नाव पर बहते हुए देव की ज़िंदगी के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंच जाओगे आपकों पता भी नहीं चलेगा। चक्का जाम उपन्यास की कहानी देवानंद नाम के एक व्यक्ति के इर्द गिर्द या यूँ कहे कि उससे गुजरती हुई वो कहानी है जिसमें उसके सफर के साथ इस देश के भी बहुत से अहम पड़ावों की झलकियां भी आपकों पढ़ने को समझने को मिलती है। देवानंद या देव पैदा होने से लेकर इस कहानी के ख़त्म होने तक जिन अवसादों से जूझता है, ये कहानी उसकी भी है। ये कहानी उस पिता की भी है जिसकी छत्रछाया में देव की ज़िंदगी गुजरी, ये कहानी एक बड़े भाई हरीश की भी है जिसके प्रति देव का प्रेम, लगाव और संवेदना आपकों मन की गहराइयों तक नम कर देगी। ये कहानी "नेपाल " नाम के उस दोस्त की भी है जिसके सपनों ने, विचारों ने देव की कहानी में कई अनोखे रंग तो भरे ही साथ ही उसे थोड़ा खुलकर जीने की राह भी दिखाई, ये कहानी माधवी के रूप में मिली उस पत्नी की भी है जिसने देव को महिलाओं के प्रति और कृतज्ञता से और समानता के भाव से देखने समझने का नज़रिया दिया और कई जगह देव की भी ज़ुबान बनकर जरूरी विद्रोह प्रकट किया चाहे फिर वो परिवार के सामने हो या सामाजिक मुद्दों पर। चक्का जाम को कहानी में रेल और देवानंद, फिल्म, पत्रिकाओं और संगीत की भी उतनी ही अहम जितनी किसी और किरदार की ये सभी मिलकर देव को देव बनाए रखने की कोशिश करते है और आखिर में क्या देव , देव बन पता है या नहीं इसके लिए आपकों इस उपन्यास को पढ़ना होगा। लेखन की बात करें तो मुझे इसका लेखन बेहद रोचक और ईमानदार लगा, भाषाएं, लहजा और अंदाज का बिल्कुल सदा हुआ उपयोग कहानी और किरदार की अवश्यता, परिवेश के हिसाब से एक दम नपा तुला। किरदारों के बीच के संवाद जितना अपने लिखे हुए में कहते है उससे कही अधिक उनके बीच अनकहे में आपसे कह जाते हैं जो कि मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से कमाल की बात रही। मुझे देव के किरदार के अलावा नेपाल और हरीश के किरदार इस हद तक पसंद आए की मैं उन सभी जगहों पर रो दिया जहां जहां देव की आँखें नम हुई। देश की राजनीति, सामाजिक और सरकारी व्यवस्थाओं पर जिस तरह से ये कहानी बात करती है जिस तरह से ये देव की नज़रों से हमे दिखाती है वो बहुत ही बारीकी से लिखा गया है इस उपन्यास का कैनवास इतना वृहद है कि इसमें देव के साथ आप देश को भी बदलते देख सकते है। कमियों की बात करे तो मुझे इसमें जो एकमात्र कमी महसूस हुई वो थी इसका हर बार अपने आसपास के वातावरण की बहुत ज्यादा डिटेल्स देना जो थोड़ा नीरस करता है पाठक के तौर पर क्योंकि देव की कहानी इतनी मार्मिक और जरूरी लगती है कि हमारे लिए बाकी चीजें हमें रुकावट सी लगने लगती है। साल 2025 का मेरा पहला उपन्यास है और क्या ही कमाल की शुरुआत हुई है इस साल की उम्मीद है आगे इसी तरह की और शानदार कहानी पढ़ने को मिले। गौतम चौबे जी को उनके इस उपन्यास के लिए ढेरों शुभकामनाएं आने वाले वर्षों में हिंदी साहित्य में उनका नाम और इस तरह चमकता रहें यहीं शुभकामनाएं है हमारी। आप भी चक्का जाम को अपना प्रेम जरूर दीजिए यक़ीन मानिए आप निराश नहीं होंगे देव की कहानी से।
An ordinary man's tale of wanting job safety to lead a happy family life and satisfy some of his wishes, is the story of Chakka Jaam by Gautam Choubey. Set in the 1970s, the story is about the life of Devanand Dubey who was born on the day Mahatma Gandhi was assassinated. A beautifully woven yarn. each story related to the protagonist's life unfolds itself in multiple layers, switching between past and present smoothly.
The characters surrounding the protagonist have stories and back stories of their own and become part of the larger picture seamlessly. Reading this book in 2025, it took me back to an India that had just got its independence, an India that was being built everyday. A major backdrop of the story is the Indian Railways and the 1974 Railway Strikes. The languages and the dialects used in the story reflect the diversity of people who surrounded Devanand Dubey as well as highlight the variety of dreams and wishes everyone has.
I took my own sweet time reading this book and with each, the story held me and kept me hooked. The stories you read from the supporting characters, not only add new flavour, but also add a new layer to a rather simple life of the main character.
Having read modern Hindi literature so far, I found this book to be more on the classical lines, and that was a refreshing experience. Even though set in rural and semi-urban India of the 70s, the presence of strong female characters at par with the urban woman of today makes this book stand out from the rest of the books in its category.
The book is well researched in terms of the socio-cultural and political narrative it gives you. If you're someone wanting to know about the 1974 Indian Railway Strike or just want to read a uniquely written story, this book is something to be picked up.
📖✨ Book Review by Book Buddy ✨📖 Title: चक्का जाम Author: गौतम चौबे Genre: समकालीन राजनीति × व्यंग्य × यथार्थ
🚦 रुकावटें ��िर्फ ट्रैफिक में नहीं होतीं… कभी विचारों में भी होती हैं। इस उपन्यास ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया — व्यवस्था, विरोध और विचारधाराओं के जा��� में उलझे भारत की एक बेबाक झलक।
🔥 हमारा रिव्यू: ✔ गहरी राजनीतिक अंतर्दृष्टि ✔ कड़वे सच को चुटीले अंदाज़ में पेश किया गया ✔ पढ़ने के बाद मन शांत नहीं, बल्कि सवालों से भरा हुआ है
उपन्यास की शुरुआत रोचक है, और बाद के भी कुछ प्रसंग आकर्षित करते हैं, परन्तु लेखक ने इसे कालजयी बनाने के चक्कर में उबाऊ बना दिया है। आधे उपन्यास के बाद ऐसा लगता है कि लेखक अपनी ही कहानी में फंस गए हैं, जिससे कई प्रसंग को बिना वजह लिथराते नजर आते हैं। ३ सितारा रेटिंग मैने उन प्रसंगों के लिए दिए हैं जो मुझे इसमें अच्छे लगे, बाकी हिस्सा पढ़के प्रतीत होता है कि वो बस आलोचकों के विश्लेषण के लिए लिखा गया है।