घुमक्कड़ क्यों दुनिया की सर्वश्रेष्ठ विभूति है? इसीलिए कि उसीने आज की दुनिया को बनाया है। यदि आदिम-पुरूष एक जगह नदी या तालाब के किनारे गर्म मुल्क में पड़े रहते, तो वह दुनिया को आगे नहीं ले जा सकते थे। आदमी की घुमक्कड़ी ने बहुत बार खून की नदियाँ बहाई हैं, इसमें संदेह नहीं, और घुमक्कड़ों से हम हर्गिज नहीं चाहेंगे कि वह खून के रास्ते को पकड़ें, किंतु अगर घुमक्कड़ों के काफिले न आते-जाते, तो समस्त मानव-जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पातीं। आदिम घुमक्कड़ों में से आर्यों, शकों, हूणों ने क्या-क्या किया, अपने खूनी पथों द्वारा मानवता के पथ को किस तरह प्रशस्त किया, इसे इतिहास में हम उतना स्पष्ट वर्णित नहीं पाते, किंतु मंगोल-घुमक्कड़ों की करामातों को तो हम अच्छी तरह जानते हैं। बारूद, तोप, कागज, छ
राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे। वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए। वह हिंदी यात्रासहित्य के पितामह कहे जाते हैं। बौद्ध धर्म पर उनका शोध हिन्दी साहित्य में युगान्तरकारी माना जाता है, जिसके लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था। इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं।
२१वीं सदी के इस दौर में जब संचार-क्रान्ति के साधनों ने समग्र विश्व को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में परिवर्तित कर दिया हो एवं इण्टरनेट द्वारा ज्ञान का समूचा संसार क्षण भर में एक क्लिक पर सामने उपलब्ध हो, ऐसे में यह अनुमान लगाना कि कोई व्यक्ति दुर्लभ ग्रन्थों की खोज में हजारों मील दूर पहाड़ों व नदियों के बीच भटकने के बाद, उन ग्रन्थों को खच्चरों पर लादकर अपने देश में लाए, रोमांचक लगता है। पर ऐसे ही थे भारतीय मनीषा के अग्रणी विचारक, साम्यवादी चिन्तक, सामाजिक क्रान्ति के अग्रदूत, सार्वदेशिक दृष्टि एवं घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के महान पुरूष राहुल सांकृत्यायन।
Sankrityayan was a multilingual linguist, well versed in several languages and dialects, including Hindi, Sanskrit, Pali, Bhojpuri, Urdu, Persian, Arabic, Tamil, Kannada, Tibetan, Sinhalese, French and Russian. He was also an Indologist, a Marxist theoretician, and a creative writer. He started writing during his twenties and his works, totalling well over 100, covered a variety of subjects, including sociology, history, philosophy, Buddhism, Tibetology, lexicography, grammar, textual editing, folklore, science, drama, and politics. Many of these were unpublished.He translated Majjhima Nikaya from Prakrit into Hindi.
One of his most famous books in Hindi is Volga Se Ganga (A journey from the Volga to the Ganges) — a work of historical fiction concerning the migration of Aryans from the steppes of the Eurasia to regions around the Volga river; then their movements across the Hindukush and the Himalayas and the sub-Himalayan regions; and their spread to the Indo-Gangetic plains of the subcontinent of India. The book begins in 6000 BC and ends in 1942, the year when Mahatma Gandhi, the Indian nationalist leader called for the quit India movement.
This book was translated by K.N. Muthiya-Tamilputhakalayam in Tamil as Valgavil irundu gangai varai and is still considered a bestseller. The Kannada translation done by B.N Sharma as "Volga Ganga" . The Telugu translation inspired many readers. Volga muthal Ganga vare, the Malayalam translation, became immensely popular among the young intellectuals of Kerala and it continues to be one of the most influential books of its times. The Bengali version is Volga Theke Ganaga [ভোল্গা থেকে গঙ্গা], which is still acclaimed by the critics.
More than ten of his books have been translated and published in Bengali. Mahapandit was awarded the Padmabhushan in 1963 and he received the Sahitya Akademi Award in 1958 for his book Madhya Asia ka Itihaas.
He maintained daily diaries in Sanskrit which were used fully while writing his autobiography. In spite of profound scholarship, he wrote in very simple Hindi that a common person could follow. He wrote books of varied interest. He was aware of limitations of Hindi literature and singularly made up the loss in no small measure.
The historian Kashiprasad Jaisawal compared Rahul Sankrityayan with Buddha. Rahul's personality was as impressive and memorable as are his achievements. He traveled widely and wrote in five languages — Hindi, Sanskrit, Bhojpuri, Pāli and Tibetan. His published works span a range of genres, which include autobiography, biography, travelogue, sociology, history, philosophy, Buddhism, Tibetology, lexicography, grammar, text editing, folklore, science, fiction, drama, essays, politics, and pamphleteering.
His travels took him to different parts of India, including Ladakh, Kinnaur, and Kashmir. He also travelled to several other countries includi
বই হাতে নিয়েই চমকে উঠতে হলো।শিরোনাম "ভবঘুরে শাস্ত্র"এর "শাস্ত্র" শব্দটা যে ভাবার্থে নয়,আক্ষরিক অর্থে ব্যবহার করা হয়েছে,তা বুঝেই চমকে ওঠা।ভবঘুরেমির দর্শন,ভবঘুরে হওয়ার জন্য উপযুক্ত বয়স,ভবঘুরে হওয়ার জন্য শারীরিক ও মানসিক যোগ্যতা,কোন কোন কাজে ও কলায় তাদের পারদর্শী হওয়া দরকার,নর ও নারীদের জন্য ভবঘুরেমির বাঁধা,উত্তরণের উপায় -সবই এই শাস্ত্রের আলোচ্য বিষয়!!!সংক্ষেপে-এ বই ভবঘুরেদের ধর্মগ্রন্থ।
শুধু শাস্ত্র নিয়ে আলোচনা থাকলে এখন এই পড়ার অর্থ থাকতো না কোনো। লেখক নিজে ছিলেন জন্ম ভবঘুরে।আক্ষরিক অর্থেই পায়ের তলায় সর্ষে নিয়ে পুরো পৃথিবী চষে বেড়িয়েছেন।ভবঘুরেমি করতে যেয়ে তার বিচিত্র অভিজ্ঞতা, দেশ বিদেশের সংস্কৃতি, মানুষ,বিভিন্ন সংস্কৃতির পার্থক্য, মানবতাবাদ, সাম্যবাদ,মানুষের জন্য অকৃত্রিম ভালোবাসা;গৌতম বুদ্ধ,রবীন্দ্রনাথ সহ বিভিন্ন মনীষীর দর্শন আলোচনা, গোঁড়ামি ও কুসংস্কারের বিরুদ্ধে অবস্থান -সব মিলিয়ে "ভবঘুরে শাস্ত্র" অতি উপাদেয় গ্রন্থ।পড়তে পড়তে মন উদাস ও উদার হবার সম্ভাবনা প্রবল।জয় হোক ভবঘুরেমির।
অসম্ভব রকমের অগোছালভাবে গোছালো বই একটা! নির্মলানন্দ বলতে যা বুঝায় তার ষোলো আনা উসুল পাবেন বইয়ে। বিশেষ করে যাদের রক্তে ঘুরে বেড়ানোটা নেশা; মনের অজান্তেই 'আমি ঘরের হইনি, বাহির আমায় টানে' গেয়ে উঠেন-- এই বইটা মনে দাগ কাটবে আপনার! আমার অবশ্য আফসোস হচ্ছে, বড্ড অজায়গায় কুজায়গায় বসে অসময়ে বইটা পড়ে ফেলেছি! এই বইটা পড়া লাগত ট্রেনের জানালার পাশে সিট দখল করে, বাইরে হালকা ঝড়ো হাওয়া কিংবা বৃষ্টি ছাঁট হতে পারত... কানে থাকতে পারতো জলের গান কিংবা মহীনের ঘোড়াগুলি.. যেটাই হোক, বইটা উপভোগ্য ; এটাই সারকথা।
बकौल राहुल सांकृत्यायन, “संसार में यदि कोई अनादि सनातन धर्म है, तो वह घुमक्कड़ धर्म है।” और बकौल मेरे, यह किताब, घुमक्कड़ शास्त्र, उस धर्म का आधुनिक पवित्र ग्रंथ है, कि जिसका पाठ इसके अनुयायियों को साँसों की तरह अनिवार्य है―हालाँकि ऐसा भी कोई कट्टर आग्रह नहीं है, फिर भी। घुमक्कड़ी, यानी सीधे शब्दों में, घूमना। घूमते तो हम सभी हैं, मगर हम घुमक्कड़ नहीं हैं। घुमक्कड़ हैं कौन? घुमक्कड़ी क्या है? आ तो घुमक्कड़ वे लोग, जिन्होंने एक शुरुआती उम्र के बाद के घर छोड़ दिया और फिर मृत्युपर्यन्त विचरते रहे। जिनके लिए अंग्रेज़ी में नोमैड, वैगाबॉण्ड, जिप्सी आदि शब्द प्रचलित हैं―‘इनटू द वाइल्ड’ याद आयी ना? बस, वही हैं घुमक्कड़। यानी, घूमना जिनके लिए शौक और/या जीवन से ब्रेक लेने की वस्तु नहीं है बल्कि जीवन ही है, पेशा है, वे हैं घुमक्कड़। घुमक्कड़ी इनके कार्य का संज्ञारूप।
राहुल स्वयं जीवन भर एक घुमक्कड़ रहे। हिंदी के आधुनिक यात्रा वृतांत को विधा के रूप में प्रचलित किया और कितनी तो यात्राएँ कीं। यह किताब उन्हीं यात्राओं से प्राप्त अनुभवों, ज्ञान और जानकारियों का एक छोटा संग्रह है, जिसमें भावी घुमक्कड़ों को घुमक्कड़ी के लिए वे सारी बातें विस्तार से बतायी गयीं हैं, जिनको घर से निकलने से पहले जान लेना आवश्यक है और वे सारी ज़िम्मेदारियाँ, शर्तें तथा सुझाव हैं, जो घुमक्कड़ी करते वक्त ज़रूरी होती हैं―क्योंकि राहुल बार बार ज़ोर देकर कहते हैं, घुमक्कड़ी स्वान्तः सुखाय नहीं है, इसका एक उद्देश्य निरुद्देश्य घूमने में भी है।
किताब के शुरुआती हिस्सों में बाधाओं और प्रेरणाओं का इतना कमाल का ज़िक्र है कि किताब पढ़ते वक्त मन होता है कि ‘अबे छोड़ो बे ये जीवन-संबंध वगैरह और दो तीन किताबें उठा के निकल पड़ो किसी रात!’ लेकिन फिर होता है कि नहीं, कोरोना है, रुको कुछ साल, सबर करो! हालाँकि यह बात तो बिला शक कही जा सकती है कि चाहे आप घुमक्कड़ हों या शौक़ के लिए ही घूमते हों, यह किताब आपको घूमने के प्रति इतना ऊर्जावान तो बना ही देगी कि अगली बार घूमने जाते वक्त दूसरा विचार नहीं आएगा।
किताब में 15 अध्याय हैं। सबमें भिन्न भिन्न विषयों पर राहुल के अपने विचार, इतिहास से कई कई उदाहरण तथा यात्राओं के छिटपुट ज़िक्र हैं। लड़कियों के घूमने पर भी एक अध्याय है, जिसमें उस समय का तो छोड़िए, आज के हिसाब से भी बहुत खुले विचार हैं। किताब जैसे जैसे ख़त्म होती जाती है, समझ आता जाता है कि घूमना किसी तारीख़ की टिकट कटा, एकाध हफ़्ते होटल आदि में रुक, दो चार तस्वीरों के साथ पाँच छह सस्ती फेसबुक पोस्ट लिख, घर वापिस लौट कर बायो में वांडरर, वांडरलस्ट लिखना तो कतई घुमक्कड़ी नहीं है! यह महज घूमना है, जो होना चाहिए; मगर घुमक्कड़ी, वह तो एक अलग ही कला है। उसको करने की शुरुआत हेतु भी बहुत मेहनत की आवश्यकता है, करते वक्त तो ख़ैर है ही और उत्तरार्ध में भी ढेर सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं जैसे लिखना, या किसी भी तरह से यात्राओं का वर्णन छोड़ जाना आदि। घुम्मकड़ी में भी अलग अलग लेवल्स, श्रेणियाँ आदि हैं, जो कदमों से नापी ज़मीन के अनुपात और सालों की मेहनत और अनुभव से तय होती हैं। अन्य शब्दों में, नाम से ही ज़ाहिर, किताब घुमक्कड़ों का वह शास्त्र है, जो उन्हें सिखाता है कि घूमते कैसे हैं।
भाषा प्रवाहमयी, परिमार्जित और सरल है। हास्य का पुट भी कहीं कहीं मिल जाएगा। हिंदुस्तान, चीन और वृहत्तर भारत के अन्य देशों के कुछ घुमक्कड़ों के बारे में खूब विस्तारपूर्ण बयान हैं और ह्रास हुई भारत की घुमक्कड़ी पर क्षोभ भी। कुछ वन्य जातियों का डिटेल्ड वर्णन है तथा घुमक्कड़ी के लिए ज़रूरी कुछ कामों और कलाओं पर टिप्पणियाँ और सुंदर उदारहण भी। कुछ विदेशी जातियों और घुमक्कड़ों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियाँ हैं। यह भी कि कैसे एक भारतीय जाति घूमते घूमते भारत से बाहर निकल गयी और विदेशों में ही उसकी पीढ़ियाँ रह गयीं―यद्यपि घुमक्कड़ी करते ही―और आज उन्हें पता ही नहीं है कि वे कभी भारतीय थे। राहुल कहते हैं कि यह दुनिया घुमक्कड़ों ने बनाई है। लोगों ने घूम घूम कर जगहें खोजीं―जैसे वास्को डा गामा और कोलंबस―फिर अलग अलग जगहों के लोग अन्य अलग अलग जगहों को गए और दुनिया को विस्तार मिला―मनुष्य एक जंगम प्राणी है और ऐसे काम उसे करते रहने चाहिए। कुल मिलाकर घुमक्कड़ी के बारे में अच्छी जानकारियाँ और प्रेरणा देती किताब है।
किताब छोटी है। किंडल के संस्करण में वर्तनी की ख़ूब गलतियाँ हैं, गद्य कोश पर पूरी किताब उपलब्ध है, मगर उसमें भी यही गलतियाँ हैं। अगर पढ़ने जा रहे हैं, तो किताब के शब्दों से ज़्यादा अपने भाषिक विवेक पर भरोसा करें। अपरिचित शब्दों का क्या करना है, मुझे भी नहीं आया समझ। मुझे नहीं पता किताब के प्रिंट में भी ऐसी गलतियाँ हैं या नहीं, इसलिए सुझाव खरीद के पढ़ने का ही रहेगा, गलतियाँ हुईं तो ठीक, ना हुईं तो बस फिर और क्या!
अंत में, किताब है शानदार! मतलब काफी ज़ोरदार। घूमने को लेकर इतना गंभीर अप्रोच, इतनी निष्ठा देखकर तो जी जुड़ा जाता है। अंदाज़ हो जाता है कि आख़िर क्यों हिंदी के यात्रा वृत्तान्त का नाम लो तो राहुल सांकृत्यायन मन में आते हैं! क्यों उनको पढ़ना इतना ज़रूरी समझा जाता है। मौका मिले तो पढ़ें, और अगर किस�� यात्रा में पढ़ सकें तो बेहतर। मुझे यक़ीन है तब कुछ और अलग तरीके से किताब हिट करेगी। पढ़ें और जानें कि क्यों घुमक्कड़ी या घूमना इतनी ज़रूरी चीज़ है। कैसे यह जीवन के अलग अलग हिस्सों और पूर्णता में जीवन को भी, सुंदर बनाती है, उसे परिमार्जन बख्शती है। क्यों राहुल कहते हैं कि घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से कम सिद्धिदायिनी नहीं है, और निर्भीक तो वह एक नंबर का बना देती है (अध्याय 1: अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा)! कि घुमक्कड़ी एक रस है, जो काव्य के रस से किसी तरह भी कम नहीं है (अध्याय 4: स्वावलंबन)। बाकी राहुल सांकृत्यायन का पसंदीदा शे’र तो, जो उनके जीवन का ध्येय भी रहा है, किताब को दो मिसरों में ही बाँध देता है ―
“सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ”
গৃহী থেকে মুসাফির বানানোর পাক্কা প্রোপাগান্ডামূলক বই। অতিঅল্প বয়সেই পৃথিবীর পথে হাঁটা ধরেছিলেন কিশোর কেদারনাথ পাণ্ডে ওরফে আজকের বিখ্যাত রাহুল সাংকৃত্যায়ন। এমন কোনো রাজপুরুষের ব্যাটা ছিলেন না ; তাই পকেটে মোহর দূরঅস্ত পয়সাই ছিল না। তবু দুনিয়া দেখবার, ঘুরবার লোভ সামলাতে পারেননি। হয়তো পায়ের তলায় সর্ষে ছিল বলেই শূন্য পকেট নিয়েও ঘুরে বেরিয়েছেন নানা জায়গায়।
ট্যুরিস্ট বা পর্যটক কোনোটাই ছিলেন না রাহুল সাংকৃত্যায়ন। বরং ছিলেন ষোলআনা পথের মানুষ। তাই পথের দাবি মেটাতে হেন কোনো কাজ নেই করেননি। পথের দেবতাকে তুষ্ট করতে লোকে যাকে 'ছোট লোকে'র কাজ বলে নিন্দে করে, সেইসব কাজের মাধ্যমেও নিজের রাহাখরচ জুগিয়েছেন। তবু অচেনাকে চেনার, অদেখাকে দেখার নেশায় মজেছিলেন।
দারুণ আ্যডভেঞ্চারাস মানুষ রাহুল সাংকৃত্যায়ন। এই বই তাঁর ভবঘুরে জীবনের অম্ল-মধুর নানা ঘটনায় পূর্ণ। এমনকি যাঁরা ঘরকুনো, তাঁদেরকে সত্যিকারের ভবঘুরে বনাবার নানা লোভনীয় টোপ এই বইতে আছে। সুতরাং সাবধানে পড়ুন "ভবঘুরে শাস্ত্র"।
ভবঘুরে শাস্ত্র এক কথায় ঘুরে বেড়ানোর একটি টেক্সট বই যার মধ্যে ঘুরে বেড়ানোর ফজিলত, ঘুরে বেড়ানোর বয়স, কি কি শর্ত পূরণের মাধ্যমে একজন মানুষ এই সুন্দর পৃথিবী দেখার মাধ্যমে আত্ম উপলব্ধি ও নিজের উন্নতি সাধন এবং ভ্রমণের বিভিন্ন দিকনির্দেশনা বিস্তারিতভাবে আলোকপাত করেছেন যা আপনার সামগ্রিক দৃষ্টিভঙ্গিকে একটু ভিন্নভাবে পৃথিবীকে বোঝার এবং দেখার প্রয়াস ঘাটাবে।
আমরা যখন কোন একটি অপরিচিত জায়গায় ভ্রমণ করি, আমরা তখন ওই নির্দিষ্ট এলাকার সংস্কৃতির পোশাক -পরিচ্ছদ, খাবার ও প্রাকৃতিক সৌন্দর্য উপভোগ করি এবং একই সাথে জ্ঞান অর্জন করে যা আমাদের পরবর্তী জীবনে বিভিন্ন সময় বিভিন্নভাবে আমাদেরকে উপকৃত করে।
রাহুল সাংকৃত্যায়ন এর প্রথম বই পড়া এটি। খুবই সহজ প্রাঞ্জল ভাষায় লেখক ঘুরে বেড়ানোর ফজিলত বর্ণনা করেছেন। পৃথিবীতে যারা বদলিয়ে দিতে চেয়েছিলেন এবং বদলিয়েছেন তা করো না কোন সময় দেশ-বিদেশ ভ্রমণ করেছেন। উদাহরণ হিসেবে বিভিন্ন ধর্মের অবতারগণ, রাষ্ট্রনায়ক, পরিব্রাজক।
ভ্রমন করা হচ্ছে জীবনের একটি নির্দিষ্ট সময় থেকে কিছু স্মরণীয় ঘটনা ক্রয় করা অর্থাৎ এটি একটি জীবনের গুরুত্বপূর্ণ ইনভেস্ট যা আপনার পরবর্তীতে বিভিন্ন সময় বিভিন্নভাবে দেহ মনের উন্নতি সাধন করবে।
সব বিষয় বইপুস্তক পড়ে উপলব্ধি করা যায় না, আসল রস আস্বাদন করা যায় না। বই পড়ে হয়তো কিছুটা ভবঘুরেমির রস পাওয়া যেতে পারে, কিন্তু ফটো দেখে আপনি হিমালয়ের গহন দেওদার বন এবং শুভ্র হিমমুকুট শিখররাজির সৌন্দর্য, তার রূপ, তার গন্ধ অনুভব করতে পারেন না। তেমনি ভ্রমণকাহিনি থেকেও আপনি সে জিনিসের স্বাদ কণামাত্র পাবেন না যা একজন ভবঘুরে নিত্য আস্বাদন করেন। ভ্রমণকাহিনি পাঠকের সপক্ষে বড়জোর এটা বলা যায় যে, তিনি আর সব অন্ধের তুলনায় কিছুটা দৃষ্টিশক্তির অধিকারী হতে পারেন আর তার সঙ্গে এমন প্রেরণাও পেয়ে যেতে পারেন যা স্থায়ী না হোক অন্তত কিছুদিনের জন্য হয়তো নিজেকে ভবঘুরে বানিয়ে দিল।
ভবঘুরে পৃথিবীর সর্বশ্রেষ্ঠ বিভূতিসম্পন্ন কেন? এ জন্যই যে, তিনি আজকের পৃথিবীকে বানিয়েছেন। আদিম মানুষ যদি নদী বা দিঘির ধারে গরম কোনো অঞ্চলে ঠায় পড়ে থাকতেন তাহলে তারা পৃথিবীকে এগিয়ে নিয়ে যেতে পারতেন না। মানুষের ভবঘুরেমি যে বহুবার রক্তের নদী বইয়েছে তাতে সন্দেহ নেই, আর আমরা কখনোই চাই না যে, ভবঘুরে রক্তারক্তির রাস্তায় চলুন। কিন্তু ভবঘুরের দল যদি আসা যাওয়া না করতেন তাহলে দুর্বল মানবজাতিগুলো ঘুমিয়ে থাকত, পশুদের ছাড়িয়ে তারা উপরে উঠতে পারত না। আদিম ভবঘুরেদের মধ্যে আর্য, শক, হুন কী কী করেছিল, তাদের খুন, পন্থার দ্বারা মানবতার পথকে কীভাবে প্রশস্ত করেছিল তার বিস্তারিত বিবরণ আমরা ইতিহাসে পাই না। কিন্তু মোঙ্গল ভবঘুরেদের কেরামতির কথা তো আমরা ভালোভাবেই জানি। বারুদ, তোপ, কাগজ, ছাপাখানা, দূরবীণ প্রভৃতি জিনিসগুলোই পশ্চিমে বৈজ্ঞানিক যুগের সূচনা করল, আর এগুলো সে দেশে নিয়ে গিয়েছিলেন মোঙ্গল ভবঘুরে।
কলম্বাস ও ভাস্কো দা গামা দুজনেই ভবঘুরে ছিলেন। আর ওঁরাই পশ্চিমের দেশগুলোকে সামনে এগোবার রাস্তা খুলে দিলেন। এসবের আলোকেই ভবঘুরে শাস্ত্র বইয়ের লেখক রাহুল সাংকৃত্যায়ন তার বইটির শুরুতেই লেখক বলেছেন এই পৃথিবীর যা কিছু মহৎ, তা পর্যটকদের সৃষ্টি। তিনি মনে করেন, মানুষ যদি আদিমকাল থেকে এক জায়গায় স্থির বসে থাকত, তবে সভ্যতা আজ এই পর্যায়ে পৌঁছাত না। বুদ্ধ, যিশু কিংবা আর্যরা যদি ঘর না ছাড়তেন, তবে বিশ্ব আজ তাঁদের দর্শন পেত না। লেখকের মতে, ভবঘুরেরা হলেন পৃথিবীর শ্রেষ্ঠ সন্তান, কারণ তাঁরাই অজানাকে জেনে সমাজকে আলোর পথ দেখান।
এখন একটা প্রশ্ন থেকে যায়, এই যে সভ্যতা বদলে দেওয়া ভবঘুরেদের মতো ভবঘুরে একজন মানুষ কেমনে হবে? তারই উত্তর দিয়ে গিয়েছেন লেখক তার ভবঘুরে শাস্ত্র বইয়ে। রাহুল সাংকৃত্যায়ন তার লেখায় বেশি জোর দিয়েছেন যৌবনকালে ঘর ছাড়ার ওপর। তিনি মনে করেন, যখন শরীর শক্ত থাকে এবং মন কৌতূহলী থাকে, তখনই পৃথিবী দেখার আসল সময়। বয়স বেড়ে গেলে সংসারের মায়া এবং শরীরের অক্ষমতা মানুষকে আষ্টেপৃষ্ঠে বেঁধে ফেলে। তাই তিনি তরুণদের আহ্বান জানিয়েছেন যেন তারা ডিগ্রির মোহ বা চাকরির সংকীর্ণ গণ্ডিতে আটকে না থেকে অজানার পথে পা বাড়ায়। তাঁর মতে, বই পড়ে যা শেখা যায় না, মাইলের পর মাইল হেঁটে মানুষের সাথে মিশলে তার চেয়ে ঢের বেশি শেখা যায়।
একজন আদর্শ ভবঘুরে কেমন হবেন, তার একটি বাস্তবসম্মত নির্দেশিকা হচ্ছে এই বইটি। লেখক বলেছেন, ভবঘুরের সম্পদ হবে সামান্য, যাতে তা বহনে কষ্ট না হয়। নরম বিছানা বা সুস্বাদু খাবারের আশা ত্যাগ করতে হবে। যা পাওয়া যায়, তাতেই তৃপ্ত থাকাই হলো আসল ভবঘুরে ধর্ম। লেখক নিজে বহু ভাষা জানতেন। তিনি পরামর্শ দিয়েছেন যে, যে অঞ্চলে যাওয়া হবে সেখানকার ভাষা শিখলে মানুষের হৃদয়ের কাছাকাছি পৌঁছানো সহজ হয়। এছাড়া শিক্ষা অর্জন, ম্যাপ সম্পর্কে জানা, দীর্ঘরাস্তা পারি দেওয়ার মতো শক্ত সামর্থ্য অর্জন করাসহ নানান পরামর্শ লেখক লিখেছেন।
একটি বিষয় পরিষ্কার করা প্রয়োজন, রাহুল সাংকৃত্যায়নের ‘ভবঘুরে শাস্ত্র’ কোনো গল্প বা উপন্যাসের বই নয়। বইটি মূলত তাত্ত্বিক বা দার্শনিক প্রবন্ধ গ্রন্থ বলা যেতে পারে। এখানে কোনো নির্দিষ্ট চরিত্র বা কাহিনীর ধারাবাহিকতা নেই, বরং লেখক এখানে ‘ভবঘুরে’ হওয়ার একটি সম্পূর্ণ জীবনদর্শন বা গাইডলাইন তুলে ধরেছেন।
সবমিলিয়ে বইটি আমার ভালো লেগেছে, একেবারে ভিন্ন একটা বিষয় সম্পর্কে লেখক বলেছেন। তার গদ্যশেলীটাও বেশ আকর্ষণীয়। অবশ্য লেখক যখন বইটি লিখেন তখন বর্তমান সময়ের মতো এতোটা যোগাযোগ বলেন কিংবা যেকোনো জায়গা সম্পর্কে জানাটাও বেশ কঠিন একটা বিষয় ছিলো। তাছাড়া বর্তমান সময়ের মতো তখন সীমান্ত সমস্যাও অতোটা ছিলো না মানুষ চাইলেই যেকোনো জায়গাতেই যেতে পারতো। তাই লেখাটি পড়ার ক্ষেত্রে সেই সময়ের প্রেক্ষাপটকেই বিবেচনা করা উচিত।
ওস্তাদ তো মাথা গরম কইরা ফেলছে। বের হওয়ার জন্যে আকুপাকু মন একটু ঠান্ডা হয়েছে যদিও। নিজের শরীরের সাথে ইংরেজি আর ম্যাপের হিশেব নিকেশ সাথে ক্যামেরা হাত একটু পাকা হোক আমি বের হয়ে যাবরে, আমি বের হয়ে যাব!
একদম বাস্তবিক বিচারে ভবঘুরেদের কী কী ব্যাপারে প্রস্তুতি নেওয়া উচিত তার একটা নির্দেশিকা পাওয়া যায় রাহুলের এই বইটিতে। ভবঘুরেমিকে সার্বক্ষণিক পেশা হিসেবে নেওয়ার ইচ্ছে বা সাধ্য আমার নেই, কিন্তু বলতে বাধা নেই বইটা পড়তে গিয়ে প্রায়ই ভবঘুরেদের মত জীবন কাটিয়ে দেওয়ার আকাঙ্খা প্রবল হয়ে উঠছিল। বস্তুত ভবঘুরেমি ছাড়া পৃথিবী বা মানুষ কোনটি সম্পর্কেই সার্বিক জ্ঞান হওয়া এক প্রকার অসম্ভব। আর এই যে পৃথিবী আর মানুষের মধ্যে হাজারো বৈচিত্র্য, এই বৈচিত্র্যের আকর্ষন উপেক্ষা করা তো আমাদের বৈচিত্র্যসন্ধানী মনের পক্ষে ব্যাপক কষ্টসাধ্যই।
যথার্থ ভবঘুরেরাই সম্ভবত মানুষকে বুঝতে পারে সবচেয়ে বেশি, কারণ তাদের অভিজ্ঞতার ভান্ডার অপরিমিত। এই অভিজ্ঞতাই আবার তাদেরকে বিশ্বমানবেও পরিণত করে, যে পর্যায়ে মানুষকে শুধু জাত-পাত-ধর্ম-লিঙ্গ- সর্বোপরি বৈষম্যমূলক কোন কিছুতে বিচার করার প্রয়োজন থাকে না। প্রকৃত উদারতা একজন পুরোদস্তুর ভবঘুরের মধ্যে্ই দেখা যায়; খুঁটিতে বাঁধা পড়া মানুষের পক্ষে উদার হওয়া, বা বিশ্বমানব হওয়া, অবশ্যই অসম্ভব।
সার্বক্ষণিক ভবঘুরে হওয়া হবে না এই জীবনে, কিন্তু খুব বেশি চাই শখের ভবঘুরে হতে।
ভবঘুরে শাস্ত্র সম্পূর্ণ বইটার Message একটিই, তা হলো - পৃথিবীকে জানতে সাতপাঁচ না ভেবে বেড়িয়ে পড়া, কিন্তু শুধু বেড়িয়ে পড়লেই তো হয় না! কিভাবে আমাদের এই বিশ্ববীক্ষণের পদযাত্রা সাফল্যমণ্ডিত হবে সেই খুঁটিনাটি বিষয়াদিই লেখক বইতে আলোচনা করেছেন। রাহুল আমার চেনা সাম্প্রতিক সময়ের গুরুত্বপূর্ণ পর্যটকদের একজন—যার সামগ্রিক জীবনে, জ্ঞানচর্চায় বিরাট অবদান ছিলো তাঁর ভ্রমণঅভিজ্ঞতার। যখন তিনি ভ্রমণের খুঁটিনাটি বিষয় নিয়ে আলোচনা করেন, তখন আগ্রহ নিয়ে শুনতে বসতে হয়। লেখকের কল্পনার চেয়ে পৃথিবী অনেক বেশি এডভান্সড হয়ে গেছে এখন, ভ্রমণ হয়েছে সহজতর। তথাপি এই বইয়ের ভ্রমণনির্দেশিকা আজও প্রাসঙ্গিকতা হারায়নি। * এটি কোনো বই রিভিউ নয়।
Lovely book! Most of things are very much or even more relevant today, around 70 years after the book was written. I would love to make some additions that would make some sections much more relevant in the contemporary world.
I read it while proofreading the upcoming Punjabi translation of the text (translated by my father)
বইয়ের শুরুতে লেখক ভবঘুরে শব্দটি এত পুনঃপুন ব্যবহার করছিলেন, আর ভবঘুরে হয়ে উঠার জন্যে এতটাই চাপ দিচ্ছিলেন যে আশংকা করছিলাম, এটি আমার লেখকের প্রথম অপছন্দনীয় বই হতে যাচ্ছে। তবে শীঘ্রই লেখক তার সুন্দর স্বরুপে ফিরেছেন আর একটা জ্ঞানগর্ভ শাস্ত্র উপহার দিয়েছেন। রিশিকেশ যাত্রার ২ দিন আগে বইটি পড়া শুরু করে ফেরার ২ দিন পর শেষ করলাম বলে হয়ত লেখকের দ্বারা গুরুতর প্রভাব ফিল করছি।
মোটামুটি ভালোই। কিছু কিছু অংশে বিরক্ত হয়েছি, কিছু অংশে উদ্বুদ্ধ। উন্নত কোনো দর্শন খুঁজে পাওয়ার লোভে বইটি পড়তে বসলে হতাশ হতে হবে। তবে রাহুল সাংকৃত্যায়নের ভবঘুরেমির অভিজ্ঞতা জানতে চাইলে বইটি ভালোই সংগ দেবে।
इस पुस्तक को पढ़ने के बाद एहसास होता है की कुछ लोग जीवन में यात्राऐं करते हैं और कुछ के लिए यात्रा ही जीवन होता है । पर शायद “यात्रा करने” और “घुमक्कड़ी करने” में अंतर है जिसे केवल राहुल सांस्कृत्यायन जैसे घुमक्कड़ ही भाषा-बद्ध कर सकते हैं । क्या घुम्मकडों ने इतिहास को यथा-दृश्य रूप में वृतांतों में वर्णित किया है या उनकी घुमक्कड़ी ने इतिहास को नए अध्याय दिए हैं - इस प्रश्न का उत्तर ही इस शास्त्र की आत्मा है । यह शास्त्र 1949 में लिखा गया था । यदि राहुल जी आज की नई घुमक्कड़ी देखते तो शायद विस्मय से भर उठते । भविष्य “डिजिटल नोमैड” नामक घुमक्कड़ का है । पर ये नए घुमक्कड़ सभ्यता को किस प्रकार बदलेंगे यह एक यक्ष प्रश्न है जिसे कोई नया घुम्मकड लिपि-बद्ध करेगा। आशा करता हूँ की वह भारत का ही कोई घुमक्कड़ होगा ।
this book is all about rules of being a great and prominent wanderer. this book is pretty informative and helpful. it is also a must read for those who want to travel this whole world. highly recommend it.
বই পড়ায় আমার এ বছরের লক্ষ্য হচ্ছে বাংলা ও বিশ্ব সাহিত্যের সেরা ভ্রমণ গ্রন্থগুলো পড়া; পাশাপাশি ভ্রমণ জনরার মুভিগুলো দেখা। বাংলা সাহিত্যের সেরা কাব্যগ্রন্থগুলোও এবছর শেষ করবো। কেদারনাথ পাণ্ডে অর্থ্যাৎ রাহুল সাংকৃত্যায়নের ভবঘুরে শাস্ত্র অনেকদিন ধরে পড়বো পড়বো করে আর পড়া হয়নি। অবশেষে শুরু করেছিলাম এবং শেষ করতে পেরে আনন্দ কাজ করছে।
আগামী বইমেলার পূর্বে অন্তত ১৫-২০ টি ভ্রমণ বিষয়ক বই পড়তে চাই। সেই পরিকল্পনার তৃতীয় বই হচ্ছে ভবঘুরে শাস্ত্র। ভবঘুরে কী, ভবঘুরে কারা, তাঁদের কী করা উচিত বা অনুচিত সেগুলো নিয়েই ভবঘুরে শাস্ত্র।
ভবঘুরে শাস্ত্র আবার কী? এটা কী ধর্মের মতোই বিধিবিধান আরোপ করা কোনো জিনিস?
উত্তর হচ্ছে না এবং হ্যাঁ দুটোই। অর্থ্যাৎ আপনি যদি উন্মুক্ত বিহঙ্গের মতো জীবনকে বেছে নিতে চান তবে আপনাকেও কিছু নিয়ম কানুন মেনে নিতে হবে। যদিও ভবঘুরে শব্দেই নিয়মের তোয়াক্কা না করাকে বোঝায়। আবার শাস্ত্র দিয়ে সেই বোহেমিয়ান জীবন কেমন হওয়া উচিত সেটার ব্যবচ্ছেদ করা হয়েছে এই বইতে।
রাহুল সাংকৃত্যায়ন সম্ভাবনাময় অগোছালো জীবনের অফুরান সম্ভাবনা ও সমস্যা মোকাবেলা করবার পথ বাতলে দিয়েছেন। কোনো মানবসন্তান চাইলেই যেমন চিকিৎসক, প্রকৌশলী, কৃষক বা রাজনীতিবিদ হতে পারেন তেমনি কোনো কিশোর যদি চায় তবে সে ভবঘুরে ধর্মের অনুসারি হতে পারবে। কিশোর বয়স-ই ভবঘুরে হওয়ার মোক্ষম সময়। ভবঘুরে বীজ বপন করার বেশ কিছু শর্ত ও কিসব যোগ্যতা অর্জন করলে নিজেকে কেউ ভবঘুরে দীক্ষায় দিক্ষিত করতে পারবে সেসবের খুটিনাটি এই বইতে।
একজন ভবঘুরেকে যেমন তার মায়ের চোখের জল, পিতার নির্ভরতা অথবা বিপরীত লিঙ্গের প্রেমের মোহে পড়া চলবে না তেমনি তাঁর পথ চলায় কোথাও কোনো মায়ায় আটকাবে না। স্নেহ, ভালোবাসা কিংবা প্রেম থেকে বিচ্ছিন্ন থাকা সম্ভব না হলেও সেই বন্ধনের ব্রাকেটে একজন ভবঘুরে তাঁর জীবনকে বন্দী রাখবে না। ভবঘুরে কেবলই সময় ও প্রকৃতির সন্তান; সমগ্র বিশ্ব-ই তাঁর আবাসস্থল।
দেশকে কেবল প্রকৌশলী, শিক্ষক বা চিকিৎসক তৈরি করবার পাশাপাশি ভবঘুরেও তৈরি করতে হবে। যা চাইলেই সম্ভব না, সেজন্য প্রথম দরকার স্নেহ ও ভালোবাসার বেড়াজাল থেকে বের হওয়া। পরিবারের মায়েদের মূঢ়মাতা না হয়ে হতে হবে বুদ্ধিমতী, বংশ বা নির্বংশের কথা না ভেবে বাবাদের হতে হবে সন্তানদের সংকল্পের ভাগিদার।
একজন ভবঘুরের উদ্দেশ্যে রাহুল সাংকৃত্যায়ন বলেছেন -
”আপনি আপনার শহর ছাড়ুন দেখবেন হাজার হাজার শহর আপনাকে আপন করে নেবার জন্য তৈরি। আপনি আপনার গ্রাম ছাড়ুন দেখবেন হাজার হাজার গ্রাম আপনাকে অভ্যর্থ্যনা জানাতে তৎপর। একজন বন্ধুর জায়গায় হাজার বন্ধু আপনার আগমনের প্রতীক্ষা করছে। আপনি একা নন।”
ভবঘুরে কেবল পথ চলাতেই জীবন ফুড়িয়ে দিবে না। বরং পথচলায় তাঁর অভিজ্ঞতা স্মৃতির ঝুলিতে সযত্নে তুলে রাখবে। এজন্য নিয়মিত ডায়েরি লেখার অভ্যেস কিংবা ছবি তুলো সংরক্ষণ করার মতো পরামর্শ লেখক দিয়েছেন। নানা সংকটে কিভাবে মানুষের থেকে সাহায্য পাওয়া যেতে পারে বা নিজের কায়িক পরিশ্রমকে কাজে লাগিয়ে আর্থিক সংকট থেকে মুক্তি পেতে পারে সেসব কথাও লেখক শাস্ত্রের ন্যায় তুলে ধরেছেন।
ভবঘুরে হওয়ার প্রধান শর্ত দূর্বলতা ত্যাগ করা। পৃথিবীর সকল দূর্বলতাকে অবজ্ঞা করার মতো ক্ষমতা থাকাই একজন ভবঘুরের প্রধান বৈশিষ্ট্য। রাহুল সাংকৃত্যায়ন ভবঘুরেদের উদ্দেশ্যে লিখেছেন -
”তুমি তোমার মনের দূর্বলতা ত্যাগ করো, তাহলে পৃথিবী জয় করতে পারবে, পৃথিবীর যে কোনো প্রান্তে যেতে পারবে, বিনা পয়সা কড়িতেই যেতে পারবে; শুধু সাহসের দরকার, বাইরে বেরনোর দরকার এবং বীরের মতো মৃত্যুকে অবহেলা করার দরকার।”
কোনো সমাজকে একজন অন্তঃসারশুন্য মানুষের আদতে কিছু দেওয়ার থাকে না। ভবঘুরে পৃথিবী থেকে যত নিবেন তার বহুগুণ সে পৃথিবীকে ফিরিযে দিবে। যা কেবল মেধাবী ও সচেতন মানুষের দ্বারাই সম্ভব। তাই ভবঘুরেকে তাঁর চলন-বলনে মেধার বিকাশ ঘটাতে হবে। সমাজের স্তরে স্তরে বিচরণ করবার উদ্দেশ্যে একজন ভবঘুরের প্রয়োজনীয় শিল্প-জ্ঞান জানা থাকা আবশ্যক।
লোক ঠকানো ভবঘুরেমির ধর্মবিরুদ্ধ। সংকীর্ণমনা মানুষ কখনও ভবঘুরে হতে পারে না। তাছাড়া ভবঘুরে কখনও দল ভারি করে চলে না। সে চলবে একা, নিরবে ও নিভৃতে। একজন প্রকৃত ভবঘুরে কখনও মৃত্যুকে ভয় পায় না। মৃত্যু চিরন্তন এবং সেই সত্যকে আলিঙ্গন করেই সে চলবে পৃথিবীর পথে পথে। মৃত্যুকে জীবনের কাছে পরাস্ত করাই যেন তার প্রধান ব্রত।
ভবঘুরে তার জীবন দিয়ে অন্যকেও আকর্ষিত করে। এভাবেই ভবঘুরেমি ধর্মের প্রসার হয়। নারী-পুরুষ যে কেউ এই অলিখিত শাস্ত্রের অনুসরণ করতে পারে।
সর্বোপরি, যে কেবল ঘর ছেড়ে কিছু দূর অতিক্রম করেছে সে প্রথম স্তরের ভবঘুরে। দীর্ঘ পথ চলায় ভুলগুলো তাঁর পাথেয়। প্রতিনিয়ত শিখতে শিখতে একজন ভবঘুরে হয়ে ওঠে অভিজ্ঞ থেকে অভিজ্ঞতর । পথ চলতে চলতে সে-ও কোনোদিন প্রথম স্তুরের ভবঘুরে হয়ে উঠবে। একজন রাজনীতিবিদ, গবেষকের মতো প্রথম স্তরের ভবঘুরেরাও দেশ ও সমগ্র পৃথিবীর সম্পদ। সেই সম্পদ হতে হলে এই বই প্রাথমিক পাঠ্য হতে পারে।
ভবঘুরে হওয়ার জন্য প্রথমেই এই বই না পড়া উচিত। পূর্বে বেশ কিছু সিনেমা ও প্রসিদ্ধ কিছু ভ্রমণ গ্রন্থ পড়ে নেওয়া যথার্থ। এসব পড়বার পরে কারো যদি মনে হয় সে ভ্রমণ করতে ইচ্ছুক, পর্যটক বা পরিব্রাজক হতে প্রস্তুত তখন সে এই বই পড়লে বেশ কাজে দিবে।
এই বইখানা আরো চার-পাঁচ বছর আগে পড়লে আমার জীবনও ভিন্নতর হতে পারতো। আমি নিশ্চিত যে আমারও ভবঘুরে দীক্ষায় দিক্ষিত হওয়ার সম্ভাবনা ছিলো।
বইয়ের কিছু কিছু ব্যাপার অগোছালো মনে হয়েছে। অল্প কথাকে অনেকসময় অতিরিক্ত ব্যাখ্যা দেওয়া হয়েছে। সেসব বাদে ভ্রমণ সাহিত্যে এই বই অনেকটা সংবিধান সমতু্ল্য সম্পদ।
বই পর্যালোচনা বই: ভবঘুরে শাস্ত্র লেখক: রাহুল সাংকৃত্যায়ন
घुमक्कड़ी का अंकुर पैदा करना इस शाश्त्र का काम नहीं है बल्कि जन्मजात अंकुरों की पुष्टि , परिवर्धन तथा मार्गदर्शन इस ग्रन्थ का लक्ष्य है। घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। घुमक्कड़ी किसी बड़े योग से काम सिद्धि दायिनी नहीं है और निर्भीक तो वह एक नंबर का बना देती है। चलना मनुष्य का धर्म है जिसने इसे छोड़ा वह मनुष्य होने का अधिकारी नहीं है। महिमा घटी समुद्र की , रावण बसा पड़ोस। घुमक्कड़ी के लिए चिन्ताहीन होना आवश्यक है और चिन्ताहीन होने के लिए घुमक्कड़ी आवश्यक है। घुमक्कड़ी में कभी कभी होने वाले कड़वे अनुभव उसके रस बढ़ा देते हैं। पुत्रवती युवती जग सोई , जाको पुत्र घुमक्कड़ होई। मन माने तो मेला नहीं तो सबसे भला अकेला। आप अपना शहर छोड़िये , हजारों शहर आपको अपनाने को तैयार मिलेंगे। तुम अपने ह्रदय की दुर्बलता को छोडो , फिर दुनिया को विजय कर सकते हो। उसके किसी भी भाग से जा सकते हो ,बिना पैसा कौड़ी के जा सकते हो केवल साहस की आवश्यकता है , बाहर निकलने की आवश्यकता है वीर की तरह मृत्यु पे हंसने की आवश्यकता है। समय समय पर केवल उतना ही पैसा लेकर घूमना चाहिए की भीख मांगने की नौबत न आये और साथ ही भव्य होटलों में ठहरने को स्थान न मिल सके। जिसमे आत्मसम्मान का भाव नहीं वो कभी अच्छे दर्जे का घुमक्कड़ नहीं हो सकता। लेखनी, पुस्तकी, नारी परहस्तगता गता। अनाडी आदमी शास्त्र के साथ अच्छा व्यव्हार करना नहीं जानता। उचकोटी का घुमक्कड़ दुनिया के सामने लेखक, कवी या चित्रकार के रूप में आता है। घुमक्कड़ लेखक बनकर सुन्दर यात्रा साहित्य प्रदान कर सकता है। नवीन स्थान में जाने का यह गुर ठीक है की लोग���ं को जैसा करते देखो उसकी नक़ल तुम भी करने लगो। हमारे देश की तरह दुसरे देशों में भी कई जातियां ऐसी हैं जिनका न कोई एक घर है न गाँव। दो स्वछंद व्यक्ति एक दुसरे से प्रेम करें यह मनुष्य की उत्पत्ति के आरम्भ से होता आया है। प्रेम रहे पर पंख भी साथ में रहें। यदि जीवन में कोई अप्रिय वास्तु है तो वह मृत्यु नहीं बलिक मृत्यु का भय है। बिना किसी उद्देश्य के पृथ्वी पर्यटन करना , यह भी कम उद्देश्य नहीं है।
It is a pleasant surprise how this book published in 1948 organically contains feminist awareness & is truly inclusive in that sense. Author mentions people as "nar naari", "taruNi tarun", "paaThak Paathikaayein" constantly, & in many places, adds a couple of lines as suggestions as to what a young woman can do for the referenced matter. Such a breath of fresh air! It is quite literally a guidebook to becoming a wanderer, globetrotter (old, pompous word) or "traveler"(in today's vocabulary). It's an enjoyable book, regardless of whether you will ever embark on such a journey, or your age-bracket. It touches upon temperament, skills, preparation, & treats "traveling" as a valid profession esp. for the youth. In some of the low-star reviews, I read that his advice is "impractical". I recently went on a conducted tour arranged by a young woman who had been "traveling" India on a literal shoestring, doing her corporate day-job on "work-from-home" mode & shifts in the front-desk, kitchen or guiding for hostels & home-stays in exchange for boarding, hitch-hiking & living with the families of the "working-class" people that she met on the way - quite literally following what Sankrityayan has written in this book, & documenting it on InstaGram, (yes, Sankrityayan would have totally approved of that, he constantly encourages ghumakkaDs to document their experience for future ghumakkaDs) before quitting her job a year ago to start a travel co. It is because I knew of this young woman, that I was able to take all that Sankrityayan has written here seriously at face value, & also enjoyed the book more! In the end chapters, the language shifts to "aadmi", & it becomes a trifle disappointing then. It's a lovely book to start reading in Hindi, for people who are used to reading in English.
Ghumakkad Shastra is less a conventional travel book and more a philosophy of wandering. Rahul Sankrityayan doesn’t write to document places so much as to justify the act of travel itself—as rebellion, curiosity, and intellectual freedom. The essays are infused with conviction: that stagnation dulls the mind, and movement sharpens it.
Read today, the book feels especially interesting in hindsight. Sankrityayan was, in many ways, doing what modern travel bloggers and vloggers do—sharing journeys, observations, and personal reflections—but with a radically different intent. Where today’s blogs and vlogs often center on aesthetics, consumption, and self-branding, Ghumakkad Shastra is driven by restlessness of thought. Travel here is not aspirational; it is educational, ideological, even ethical.
That said, the book can feel didactic at times. The tone occasionally shifts from reflective to prescriptive, and the essays assume a shared belief in travel as a superior way of life. Readers expecting vivid travelogues or narrative immersion may find it abstract, even repetitive in parts.
Still, its ideas have aged remarkably well. In an era of curated itineraries and algorithm-friendly wanderlust, Ghumakkad Shastra stands as a reminder of a slower, more inward form of travel—one that values learning over listing, and transformation over documentation.
A fun read, but ultimately impractical and with too many digressions. I enjoyed the scarce historical coverage of ancient Buddhist "ghumakkads" like Dharmakirti, Kumarajiva, etc. Outside of that, this book wasn't that interesting.
महापंडित राहुल सांकृत्यायन बीसवीं शताब्दी के भारत के सबसे बड़े ज्ञानियों में से थे और अवश्य ही वह अपनी घुम्मकड़ प्रवृति के कारण ही ज्ञान के उस दर्जे तक पहुंचे होंगे।