अस्तबल में नीलोत्पल मृणाल नए मुखर्जी नगर की वास्तविक झलक दिखाते हैं, जहाँ UPSC की तैयारी का सपना अब गहरी खाई में डूब चुका है। CSAT के नए पैटर्न ने पुराने हिंदी माध्यम के छात्रों को जैसे खारिज़ कर दिया है। पुराने धुरंधर कहते हैं, “हमसे ना हो पाएगा।” नए बांकुरे, जैसे रोहन त्रिवेदी, रेड बुल के घूँट के साथ जवाब देते हैं, “हमसे ही होगा!” यहाँ की लड़कियाँ चौखट लाँघकर अपना हक़ छीनने आई हैं। दूसरी तरफ PCS के जाल में फँसी पुरानी पीढ़ी, शादी-ब्याह के दबाव में घुटती जा रही है। अस्तबल इन्हीं संघर्षों का इमानदार दस्तावेज़ है।
Born in 1984 in Santhal Paragana, a remote area of Jharkhand, Nilotpal Mrinal has already established himself among the readers and literary intellectuals with his first novel 'Dark Horse'. Nilotpal, originally hails from Bihar, is also active in political and social activities for the last several years after completing his education from St. Xavier's College, Ranchi. Along with playing a special role in student movements, Mrinal has already reached to TV platform in the field of folk music. These days, he's also trying his luck in poet-concerts and gaining popularity.
नीलोत्पल मृणाल की अस्तबल एक ऐसी कृति है जो न केवल UPSC की तैयारी के केंद्र मुखर्जी नगर की सामाजिक-सांस्कृतिक परतों को उघाड़ती है, बल्कि एक पीढ़ी के सपनों, संघर्षों और टूटन को भी गहराई से दर्ज करती है। यह उपन्यास उस युवा भारत की कहानी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं के नाम पर एक अनिश्चित भविष्य की दौड़ में शामिल है।
📚 समीक्षा: अस्तबल — एक टूटते स्वप्न की गाथा
- वास्तविकता की बेबाक प्रस्तुति मृणाल ने जिस मुखर्जी नगर को चित्रित किया है, वह कोई आदर्श स्थल नहीं, बल्कि एक अस्तबल है—जहाँ घोड़े नहीं, सपने बाँधे जाते हैं। यहाँ के किरदार—रोहन त्रिवेदी, पुरानी पीढ़ी के धुरंधर, और चौखट लाँघती लड़कियाँ—सभी अपने-अपने मोर्चों पर जूझते हैं। UPSC की तैयारी अब एक सामाजिक दबाव बन चुकी है, जहाँ सफलता नहीं, बल्कि टिके रहना ही उपलब्धि है।
- हिंदी माध्यम के छात्रों की पीड़ा CSAT के नए पैटर्न ने हिंदी माध्यम के छात्रों को जिस तरह से हाशिए पर धकेला है, वह इस उपन्यास का केंद्रीय दर्द है। पुराने अभ्यर्थी “हमसे ना हो पाएगा” कहकर हार मानते हैं, जबकि नए लड़ाके “हमसे ही होगा” की हुंकार भरते हैं। यह द्वंद्व केवल परीक्षा का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और पहचान का है।
- लड़कियों की भूमिका उपन्यास की स्त्री पात्र केवल सहानुभूति की पात्र नहीं हैं, वे चौखट लाँघकर अपना हक़ छीनने आई हैं। यह बदलाव हिंदी साहित्य में स्त्री दृष्टिकोण को एक नई दिशा देता है—जहाँ वे केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि क्रांति की वाहक हैं।
- PCS और पारिवारिक दबाव PCS की तैयारी में उलझी पुरानी पीढ़ी शादी-ब्याह के सामाजिक दबाव में घुटती है। यह हिस्सा विशेष रूप से उस वर्ग को छूता है जो प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ-साथ पारिवारिक अपेक्षाओं से भी जूझता है।
- शैली और भाषा मृणाल की भाषा सहज, संवादात्मक और व्यंग्यात्मक है। वह पाठक को मुखर्जी नगर की गलियों में ले जाता है, जहाँ हर कोचिंग सेंटर एक कहानी है और हर किरायेदार एक संघर्षशील योद्धा।
⭐ निष्कर्ष अस्तबल केवल UPSC की तैयारी पर आधारित उपन्यास नहीं है, यह एक सामाजिक दस्तावेज़ है जो उस युवा भारत की कहानी कहता है जो सपनों की दौड़ में अपनी पहचान खोज रहा है। यह उपन्यास उन सभी के लिए जरूरी है जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दुनिया को केवल आंकड़ों और परिणामों से नहीं, बल्कि भावनाओं और संघर्षों से समझना चाहते हैं