1970 के दशक के उत्तरार्ध में, उत्तर भारत के एक छोटे-से क़स्बे रामनगर में बिताए गए एक बचपन का वृत्तांत है ‘लपूझन्ना’। नौ-दस साल के बच्चे की निगाह से देखी गई ज़िंदगी अपने इतने सारे देखे-अदेखे रंगों के साथ सामने आती है कि पढ़ने वाला गहरे-मीठे नॉस्टैल्जिया में डूबने-उतराने लगता है। बचपन के निश्चल खेलों, जल्लाद मास्टरों, गुलाबी रिबन पहनने वाली लड़कियों, मेले-ठेलों, पतंगबाज़ी और फ़ुटबॉल के क़िस्सों से भरपूर ‘लपूझन्ना’ भाषा और स्मृति के बीच एक अदृश्य पुल का निर्माण करने की कोशिश है। सबसे ऊपर यह उपन्यास आम आदमी के जीवन और उसकी क्षुद्रता का महिमागान है जिसके बारे में हमारे समय के बड़े कवि संजय चतुर्वेदी कहते हैं—‘रामनगर की इन कथाओं में लपूझन्ना कोई चरित्र नहीं मिलेगा। समाधि लगाकर देखिए तो लपूझन्ना कैवल्य भाव है -
बचपन की यादों में लेकर जाता बहुत ही खूबसूरत उपन्यास! हर कोई अपने लफ़त्तू को याद करने लगेगा पढ़ने के बाद। लाल सिंह का वात्सल्य, बंटू का लीचड़पन और लफ़त्तू के कारनामे इस उपन्यास को एक अलग दुनिया में ले जाते हैं । इस उपन्यास का हीरो बचपन है। इस उपन्यास में विस्थापित होकर किसी शहर में आने के सिलसिले से, उस शहर को अपना ब्रह्मांड बना लेना, फिर उसी शहर में लगभग मेहमान जैसे आने तक का सफ़र हैं ।दोस्ती, आशिक़ी, अफ़लातूनी, मस्ती, प्रेम, बेफ़िक्री, दर्द, अकेलापन और वो तमाम जज़्बात जो एक बचपन को बचपाँड़ बनाते हैं, सब हैं। फिर से उन दिनों में लेकर जाने और आजकल जिन शब्दों का प्रयोग लगभग बंद हो चुका हैं उन्हें फिर से पढ़ने का जो मज़ा पांडे जी ने दिया हैं उसके लिए बहुत आभार ♥️
अशोक जी की किताब आपको अपने बचपन कि यादों में गुम कर देगी। हममें से हर किसी की जिंदगी में एक लफफत्तू होता है जो हमारे बचपन की यादों का केंद्रबिंदु बन जाता है। हममें से जिसने भी अपना बचपन एक आम शहर में गुजारा है वो इस किताब के एक एक किस्से को अपने से जुड़ा हुआ पाएगा।
Rarely does a narrator enhance a book more than the solitary reading experience. Anil Datt’s captivating narration elevates Ashok Pande’s book, transporting every 80s and 90s kid down memory lane to relive days of mischievous innocence.
Pro tip : a) Listen in 1.5X+ speed. b) The book could lose its charm owing to repetition of themes. Enjoy it in short sporadic sessions, than in one continuous go.
“लपोझन्ना” पढ़ें और महसूस कीजिए 1970 के दशक का बचपन कितना जादुई और मासूम था। अनिल दत्त की सुनाने की कला ने इसे हज़ार गुना रोचक बना दिया है। छोटे शहरों की गलियों में खेलना, दोस्तों के साथ हर छोटी-छोटी शरारतें, और लाफट्टू या लाल सिंह जैसे दोस्तों की दोस्ती की कहानियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह कहानी कभी खत्म न हो, और लेखक का बचपन हमेशा जिंदा रहे। यह किताब बचपन की नर्म, प्यारी यादों का पुल बनाती है और दिल को छू जाती है|
बचपन की मासूमियत, बचपन बचपन की शरारत, बचपन की फ़िक्रें, बचपन की पक्की यारियाँ, बचपन की ही मोहब्बत को अगर आप अच्छे से मिला दें और मोबाइल फ़ोन के पहले वाली धीमी आँच पर पका लें तो लपूझन्ना नाम का शानदार व्यंजन आपके लिये तैयार है….
मेरी ये बात शायद किताब की ख़ूबसूरती के आगे फीकी लगे, पर फिर भी कहूँगा-लपूझन्ना पढ़ते हुए लगा जैसे मैं अपने ही छत से झाँककर अशोक, लफत्तू और लाल सिंह की दुनिया देख रहा हूँ। नैनीताल और रामनगर की वो गलियाँ, वो धूप, वो शरारतें-सब मेरी ही साँसों के आस–पास थे।✨
शायद इसलिए कि मैं भी नैनीताल की उन्हीं गलियों में बड़ा हुआ हूँ। किताब पढ़ते वक्त कई बार लगा कि ये सब तो मेरी ही यादें हैं, मेरी ही मोहल्ले की कहानियाँ हैं। छोटे शहर की दुनिया अलग होती है। यहाँ आधुनिकता देर से पहुँचती है, और उसी देरी से पैदा होती है नई खोजें। किताब में बच्चों का पेंसिल के छिलके से चुम्बक बनाना, कायपड्डा और पिड्डू जैसे "आइंस्टाइन के जुगाड़"-याद दिलाते हैं कि बचपन की मासूम बेवकूफ़ियाँ ही असल विज्ञान थीं।
मुझे भी अपने बचपन की याद दिला गई-बरसाती ढलानों पर पत्थर के नीचे साबुन लगाकर फिसलना, बुराँश के फूल 🌺तोड़कर रस बनाना, फुटबॉल खेलना जब तक साँस टूट न जाए, संडे की सुबह साइकिल निकालकर पूरे शहर का नक्शा नापना। बौनां के बम-पकौड़े पर लफत्तू की उधारी- कभी जेबों से निकला चमत्कारी कैश, कभी बाक़ीख़ाता-बस यही हमारी असली VIP पास थी, फिर आता झुककर देखा गया सिनेमा, पहाड़ की Netflix।🎞️
लफत्तू तो मेरा भी दोस्त लगने लगा। उसकी बातें- 'बलबाद हो दाएगा लौंदियों के तक्कल में! बेते' जैसे कोई पुराना साथी अब भी कान में फुसफुसा रहा हो। उसकी हकलाहट भरी सलाहें भी एकदम मासूम- “नैन्ताल कोई थाला इंग्लित मात्तलनी के बाप के जो क्या है कि कोई लामनगल वाला वाँ नईं जा सकता…”- और फिर ज़ोर से हँसकर कहना, “फिल लाल बैलबातम के साथ हैपी नूई कलेगा थाला!”😆
किताब ने वो पहली मोहब्बत भी याद दिला दी- स्कूल के fest में क्रश के लिए गाना डेडिकेट करना, और फिर cyber-cafe की तरफ़ भागना। वहाँ Orkut 💬 खुलता था- जहाँ testimonials ही ‘लव लेटर’ होते थे, scrapbook ही टाइमलाइन। छोटे शहरों की पहली मोहब्बतें वहीं लिखी जाती थीं, मासूम, बेपरवाह और सच।
और धर्म? जिस मासूमियत से ये किताब उसे छूती है-वो नैनीताल की गलियों जैसी ही है। जहाँ दोस्तियाँ मज़हब से ऊपर होती हैं, और मोहब्बत ही सबसे बड़ा धर्म।
कभी-कभी लगा, “अरे य-ये सब तो मैंने भी किया है…” और कभी लगा, काश लफत्तू सच में मेरे साथ पढ़ता और कहता- “बीयोओओई… जली को आग कैते ऐं बेते, बुजी को लाक। औल उथ आग थे निकले बालूद को विछ्छनात कैते हैं।”
और सबसे ज़्यादा याद लाल सिंह की आई- जो अशोक को नैनीताल पढ़ने भेजते वक्त बस अड्डे तक आया, संदूक पकड़ाया और पाँच रुपये थमाकर आँख पोंछते हुए चुपचाप लौट गया। वही दोस्त होते हैं, जो चुपचाप हमारी पीठ पर हाथ रखते हैं।🫂
तो हाँ, लपूझन्ना ने मुझे न सिर्फ अपने बचपन से जोड़ा, बल्कि अपने शहर से भी फिर मिलवाया। इतना कह सकता हूँ कि जो भी हिंदी में सहज है, वो इसे ज़रूर पढ़े। और जब वे पढ़ेंगे तो चेहरे पर वही हल्की मुस्कान बनी रहेगी-जो सिर्फ छोटे शहर की यादों से आती है।
कुछ किताबें पढ़ने से ज़्यादा जी जाती हैं-लपूझन्ना मेरे लिए वैसी ही रही।🙂↕️✨
अधिकांश लड़कियों की तरह जब मैं छोटी थी तब मैं भी सोचती थी कि काश मैं लड़का होती । ये ख़याल न सिर्फ़ लड़की होने के कारण झेलने वाली असमानताओं के कारण था बल्कि इसके अलावा एक और बड़ा कारण था वह यह कि मुझे पता था कि लड़कियों की अपेक्षा बचपन से ही लड़कों का संसार घर से बाहर के एक ज़्यादा बड़े दायरे में होता है । बाद में मैंने जाना की लड़कियों का जो अपना अलग अनुभव होता है वह भी कोई कम रोचक नहीं । पर लड़कों के इस बड़े दायरे से मुझे ईर्ष्या होती थी । इसलिए शायद वयस्क ज़िंदगी की शुरुआत से ही मुझे लड़कों की दोस्ती रोचक लगती क्योंकि अक्सर वे बचपन के अपने ये क़िस्से सुनाया करते । शायद मीडिया में भी अक्सर पुरुष अपने बचपन की ये कहानियाँ बड़े चाव के साथ सुनाते हैं और ये भी इस रोचकता का कारण है । इस किताब को पढ़ कर यही लगा कि एक वयस्क अपने लड़कपन के क़िस्से सुना रहा है । किताब की खूबी बहुत बारीकी से खड़े किए गए चरित्र हैं । यह बारीकियाँ हर चरित्र को उसे दिये गये मज़ाक़िया नाम से भी बहुत सा���ने आती है चाहे फिर वो ‘दुर्गा दत्त मासाब’ के भाई ‘मुर्ग़ा दत्त मासाब’ हों या ‘घुच्ची’ के खेल को गलती से ‘फ़ुच्ची’ कह देने वाला ‘फ़ुच्ची कप्तान’, चाहे शहर में रहने वाला पड़ौस की अंग्रेज़ी मास्टरनी का भाई ‘लाल बैल बॉटम’ हो या टॉकीज के पास पकौड़े बेंचने वाला बौना । एक स्कूल है जहां मास्टर साइंस के एक्सपेरिमेंट के नाम पर महीनों एक ज़िंदा कछुए में बच्चों को उलझा का ख़ुद जासूसी उपन्यास पढ़ते हैं, या कक्षा में शराब सेवन करते हैं, या उन्हें अपनी स्वरचित कविताओं का शिकार बनाते हैं या कि छोटी छोटी बातों में उनकी धुनाई करते हैं । यह सब बहुत रोचकता के साथ लेखक हमें बताता है, उसी चाव के साथ जैसे कोई बचपन का दोस्त आपको बताये । उपन्यास में लड़कपन के मज़ेदार खेल हैं, स्कूल है, फ़िल्मों के डायलॉग हैं, मासूम प्रेम प्रसंग हैं, और सबसे ज़्यादा मज़ेदार चरित्र हैं । लफ़्त्तू लेखक का सबसे
कुछ किताबें होती हैं, जो कहीं नहीं ले जातीं। बस वहीं खड़ा कर देती हैं, जहाँ से कभी चले थे। "लपूझन्ना" भी वैसी ही एक किताब है। ना कोई वायदा, ना कोई चालाकी बस एक सीधी आवाज़ "चल बे, वहीँ चलते हैं जहाँ धूल थी, दोस्त थे, और दुनिया सीधी थी।"
कुछ दिन पहले मनीष सर ने इस किताब का ज़िक्र किया था।नाम सुना *लपूझन्ना* तो लगा जैसे कोई पुराना यार नुक्कड़ से चिल्लाया हो, बिना लिहाज़ के, बिना वजह के। मनीष सर किताबों के मामले में वैसे भी हमारे जैसे लोगों के 'लफत्तू' हैं, जो बोलते हैं तो भरोसा होता है।
अशोक पांडे ने लपूझन्ना लिखते वक्त कोई कहानी नहीं गढ़ी। बस गली के मोड़ों से गर्द उड़ाई, छज्जों से टपकती पुरानी बातें उठाईं, और हमारे भीतर जो थोड़ा सा बच्चा अब भी जिंदा था उसके गाल खींच दिए हौले से।
कहानी चार दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है पर जो असल में हर उस लड़के की है, जो घर से बिना बताए घूमता था, जेब में मारबलें खनखनाती थीं।
"लपूझन्ना" तेज़-तर्रार किस्सा नहीं है। ये किताब टहलती है, जैसे बारिश के बाद गलियों में पानी बहता है धीमा, खिलखिलाता हुआ, खुद से बेख़बर।
अशोक की ज़ुबान कोई बनावटी मंच की ज़ुबान नहीं है। ये वही मोहल्ले की भाषा है जहाँ बातें पूरी नहीं होतीं, जहाँ अधूरे वाक्य भी पूरे समझ लिए जाते हैं।
पढ़ते-पढ़ते कई बार लगेगा कोई पीठ थपथपा कर कह रहा है "याद है बे, वो दिन?" और जवाब में हल्की सी गीली हँसी निकलेगी, बिना सोचे, बिना चाहे।
"लपूझन्ना" पढ़ना मतलब थोड़ी देर के लिए फिर से वही बन जाना, जिसे दुनिया डराना भूल गई थी। जहाँ सपने किसी अमरूद की तरह जेब में रखते थे, और जिन्दगी बस उतनी थी जितनी एक गली लंबी होती है।
अगर आपके पास भी कोई 'लफत्तू' था, अगर आपके लिए भी कोई गली दुनिया से बड़ी थी, तो फिर लपूझन्ना आपके ही लिए है।
पढ़िए धीरे-धीरे जैसे मिट्टी में पानी उतरता है बिना शोर किए, बस चुपचाप... गहरा...
लपूझन्ना अशोक पाण्डे का पहला उपन्यास है, और कितना ही खूबसूरत उपन्यास है। रामनगर में बिताए बचपन के दो साल और वहाँ बटोरी यादों को उन्होंने खूबसूरती से पन्नों पर उतारा है। कहानी किसी धीमी गति से चलती रेल के जैसे बढ़ती जाती है, और आप धीरे धीरे उस सफर की चाल में खोते जाते हैं। सबसे खास बात ये की ये किताब हम पढ़ने वाले को भी अपना बचपन जी लेने का दोबारा मौका देती है। कहानी आसान है और अंत आते ही जैसे मुझे लगने लगा की काश अंत ना हो। लेकिन बचपन की तरह, कहानी भी खत्म तो होनी ही है। उपन्यास सभी को पढ़ लेना चाहिए।
Dosti yarri pyar dill tutuna emergency and laffattu totally loved it uhu uhu also i have been all the place book talks about so it was like movie running infront of my eyes seeing laffattu doing everything. In last I will say i am laffafu's best friend.
आज के दौर में हमारे पास अपने पुराने दिनों को याद करने का वक्त बहुत कम होता है, खासकर महानगरों में। लपूझन्ना जैसी कहानी लगभग हर कस्बे, गांवों और छोटे शहरों में होती है। बचपन के कुछ ऐसे दोस्त होते हैं जो ताउम्र याद रहते हैं। अशोक पांडे जी ने लफत्तू के बोलने के अंदाज़ को बखूबी बयां किया है, किताब पढ़ते हुए लफत्तू की आवाज़ कानों में गूंजती महसूस होती है और मुंह उसी तोतली बोली में कुछ बोलने का अभ्यास करने लगता है। लपूझन्ना में बचपन की कहानी के ज़रिए आप 70-80 के दशक के रामनगर के सामाजिक ताने-बाने को जान पाते हैं। साथ ही वहां के भूगोल और इतिहास को भी जानते हैं। मेरा निजी अनुभव ये रहा है कि इस किताब को पढ़ते वक्त आप अपने बचपन की सैर कर आते हैं और छोटी-छोटी बातों को याद करते हैं। अपने बचपन के साथी, गली-मोहल्ले, स्कूल और टीचर, खेल के मैदान और दुकानें चलचित्र की भांति चलते जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ कि एक-दो पृष्ठ पढ़ने में घंटे-दो घंटे लग गए। बचपन की धुंधली स्मृतियों के आधार पर दिमाग अपनी कहानी बनाने लगा। इसके साथ ही भाषा की सरलता कहानी को अलग ही प्रवाह देती है। अशोक पांडे जी को सोशल मीडिया पर पढ़ता रहता हूं और उनकी लेखन शैली का प्रशंसक हूं। उनकी पहली किताब पढ़ी है। उम्मीद है जल्द ही कुछ और किताबें पढ़ूंगा।
Highly recommend the Hindi audiobook version - the regional dialect comes alive beautifully in audio format. Fair warning: you'll need to bear with the first few chapters while you adjust to the style. But then it starts flowing, and you'll enjoy every character. If you grew up in a small town before the 2000s, you'll relate to everything! Loved Lafattu and his dialogues! His stammering speech and hilarious lines like "apne paitte kato uncle aur apna taam talo", or "lool is lool" had me cracking up. What a character! Ashok Pande captures 1970s small-town life perfectly through a child's eyes. The nostalgia, the friendships, the mischief - it all feels incredibly authentic. Completely enjoyed it and can definitely listen to it again and again. Pure comfort reading that brings back childhood memories.
अगर बचपन के दिनों को याद करे तो हमें याद आएगा हमारे मौज मस्ती, बेफिक्री और लड़कपन के दिन और सबसे महत्वपूर्ण चीज जो याद आयेगी वो हैं हमारे बचपन के दोस्त जिनके बिना मौज मस्ती, बेफिक्री और लड़कपन सिर्फ एक शब्द हैं, दोस्ती इन शब्दों को एक नया आयाम देती है और लपूझन्ना कहानी भी इन्ही आयामों पे आधारित है जहां लेखक अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए लिखते है , कहानियों में जिक्र होती है रामपुर में बिताए गए दिनों की, सामाजिक कुरीतियों की और सबसे महत्पूर्ण किरदार और लेखक के अजीज दोस्त लफ्तू की।
कहानी आपको आपके बचपन के दिनों में ले जाती है, ऐसा लगता है आप कहानी के पात्र बनकर उसे जी रहे हैं। अशोक जी की लेखन में एक सादापन झलकता है। कुछ कहानियां आपको मनोरंजक लगेगी, कुछ ज्ञान से परिपूर्ण। मैं इस किताब को पढ़कर बहुत प्रभावित हूं और चाहूंगा कि आपलोग भी इसे जल्द से जल्द पढ़े।
Big picture: Set in the 1970s, the book paints a vivid portrait of India in that era The book recounts daily routine of kids in a small town, community gossips, school idiosyncrasies and simple joy of only outdoors to while away time
Review Nostalgic book, takes you back in time when life was much simpler, no electronics, no social media, limited circle of influence and carefree life Personally, can relate to playing with kids on the street, eagerly wait for going to a restaurant, wait for guests to eat special food, look at people coming from abroad with awe Not a book for everyone but enjoyable for the kids of 70s/80s, for a delightful journey back in time
हल्की-फुल्की और ७० के दशक के बचपने को याद करती हुई।
१९७० के दशक की कहानी, पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे की आंखों और उसकी दुनिया को देखने और सीखने के नजरिए से लिखी हुई। थोड़ा आर के नारायणन की 'मालगुडी डेज' या 'स्वामी एंड हिज फ्रेंड्स' से मिलती जुलती। हल्का और मनोरंजक पढ़ने के लिए ठीक-ठाक किताब।
मेरा मन कुछ ज्यादा नहीं लगा इसको पढ़ते हुए, वजह शायद फ्रीक्वेंसी या इम्पेडेंस मिसमैच रहा हो कह नहीं सकता। कुछ जगहों पर यह नौस्टाल्जिया दे गया और आँखों में आँसू भी! कुछेक जगहों पर हँसी और ठहाके भी। कुछ लाइट पढ़ने के इरादे से आप इसे पढ़ सकते हैं, शायद आपको मुझसे ज्यादा बेहतर लगे।
just beautiful❤ this book was about friendship, school, games and all the things which we all have experienced in our childhood. this book will make you relive the childhood of the author in 70s. this book is based in a small town named Ramnagar and all the things which used to happen there and how there were so many unique and different things. I really enjoyed this book and will highly recommend it to everyone.
Book was good in parts but at times it felt like extending a way more than needed. End chapter was saviour. May be things which didn't work for me is totle dialogues. I understand book is narrated from the eyes and perspective of a 11 year old but Atishyokti of totlapan caused breakge of flow for me.
If you grew up as a millennial and never wondered what it was like when your parents were growing up in a small town back in India, this book is your portal to transform you to that era.
The stories are simple but the whole different era makes it much more enjoyable reading. 3.5/5.
यह पुस्तक हर उस इंसान को पढ़ना चाहिए जिन्होंने अपना बचपन किसी छोटे शहर में बिताया हो। इस उपन्यास को protagonist अशोक पांडे के दोस्त लफत्तू को केंद्र बिंदु बनाकर लिखा गया है। बचपन की यादों को ताजा कर देने वाली पुस्तक लपूझन्ना दोस्ती, प्यार, बचपन के खेल आदि को लेकर चलती है और दिल को छू जाती है।
"लप्पूझन्ना" एक ऐसी किताब है जो आपको आपकी खुद की यात्रा की याद दिला देगी। इसमें न कोई बनावट है, न दिखावा — बस एक आम आदमी की असामान्य ईमानदारी है। अशोक पांडेय ने अपने अनुभवों को जिस आत्म-हास्य और गहराई से पिरोया है, वह हिंदी साहित्य में एक खास स्थान रखती है।
“बेते बखत ई एता एगा दब कोई किती के कते पे पेताब फ़ोकत में नईं कलता|”
ऐसे वक़्त में किताब का पहला संस्करण घंटों में बिक जाए तो समझ लो कि किताब निकल पड़ी| यह तब हो रहा है जब हर कोई हिंदी में पाठक न होने की बात कर रहा है|
यादों की ककैया ईंटों की हवेली मेरे सामने खड़ी हो रही है| उस वक़्त की जिंदगी जब न घरों पर मुखौटे चढ़े थे न चेहरों और किरदारों पर| छोटे मँझोले शहर में अपना जो बचपन छोड़ आए हैं उसकी अपनी पुरानी यादें का शामियाना मेरे सामने खड़ा है| यह बात अलग है कि इतिहास के जिस काल खण्ड में यह उपन्यास ख़त्म होता है वहां से मेरा जीवन शुरू होना चाहता है| इस किताब में बागड़बिल्लों, लपूझन्ना ढूंढोगे तो नहीं मिलेगा| बिन मांगे तो खैर बमपकौड़ा भी मिलता हैं और जीनतमान भी| किताब षडरस संतुलित है और भोलापन बिल्कुल नहीं खोती|
बहुत कम उपन्यास हैं जिन्हें बचपन की उस जमीन पर लिखा गया है जब हम लफत्तू बनने की कोशिश कर रहे होते हैं| अगर आप छठी आठवीं पास कर चुके हैं तो इसे पढ़ने के बहाने मुस्कुरायेंगे और आत्मस्वीकृतियाँ करते चलेंगे| टीप देता चलूँ कि अगर कोट-पेण्ट वाले स्कूल के बेलबॉटम रहे थें तो आप जरूर पढ़ लें – आपने क्या क्या खोया जिंदगी में| पाने के लिए तो खैर सन सत्तर के बाद पैदा होने वालों में खुद खरीद दौलत की गुलामी पाई और दिखावे की खुशियाँ दोनों हाथ बटोरीं हैं| यह कहानी उस ज़िंदगी की भी है जब बचपन को टेलीविज़न का ग्रहण नहीं लगा था| बचपन गुजारा नहीं जिया जाता था|
किसी भी अच्छी किताब को पढ़ते हमारे अपने परिदृश्य और निष्कर्ष सामने आते हैं| हम किताब और अपने जीवन स्वप्न को समानान्तर जीते चलते हैं| जब यह कथाएँ सरलता से साम्य स्थापित कर सकें तो भली प्रतीत होती हैं| लेखक की शैली तरलता के साथ यह साम्य स्थापित करने के लिए जानी जाती है| हम लेखकीय कल्पना को यथार्थ से निष्काषित नहीं कर पाते| यह बचपन का सादा सुंदर दस्तावेज़ बनकर सामने है|
पुस्तक की सबसे महावपूर्ण बात है कि इसके हर अध्याय को आप अलग किस्से की तरह पढ़ सकते हैं| एक दो जगह लगता है| यह बात भी हो सकती है कि दोस्त की अनुपस्थिति में यादें अक्सर अतीत से उखड़ कर आ जाती हैं|
यह कहानी इतनी सादा है कि आपका थोड़ा और सादा सा इंसान बना देती है| इस तरह की बातें अशोक पांडे हल्द्वानी वाले ही लिख सकते हैं| जिन्हें पिछली एक दो दहाई में ढूंढ कर पढ़ने का शौक रहा है उन्हें किताब की शैली और सादगी से अपना पुराना परिचय मिलेगा| यह अलग बात है कि लेखक खुद किताब का पिछाड़ा न देखें तो यह न बता पाएं कि पिछली किताब कितने साल पहले आई थी| हाँ जब किताब आईं है तो पूरी तीन आई हैं सरदार जनवरी बाईस के पहले दो हफ्ते में| बाकी किताबों पर बाईस पड़ रही हैं|
Lapoojhanna is a novel by Ashok Pande that builds on childhood bringing memories back & delves into the complexities of subaltern urbanization, social hierarchies, and human emotions . The writer offers a slice of local life in his teenage years through the lens of Ramnagar, a town in Uttarakhand comparing them to "Chaar Dhaam" (the four sacred pilgrimage sites in Hinduism). "Ramnagar ke chaar dhaam sun lo sutro! Is taraf ko khatari aur us taraf ko Lakhuwa. Teesra dhaam haiga Bhawaniganj aur sabse bada dhaam haiga Kosi Dam." ( "Listen, people of Ramnagar, about the four sacred spots! On one side is Khatari, and on the other side is Lakhuwa. The third sacred place is Bhawaniganj, and the greatest of them all is Kosi Dam.") The author skillfully captures the emotional landscape of his small-town characters ranging from teenagers to youth with adults as supporting characters. Their internal dilemmas, love, aspirations, and failures are presented raw and unfiltered. Story writing style is lucid and strong making it a cultural experience of the bygone era. This book captures all the traits of teenage years with bittersweet qualities— excitement, friendship bonds, heartbreaks, navigating identity, school experience, Cinema culture, Family Dynamics, dreams, rebellions, and mistakes.
उपन्यास ‘लपुझन्ना’ आज पढ़ कर ख़त्म किया लेकिन ऐसा लग रहा है ये कभी मेरे अंदर से ख़त्म नही होगा। हर एक कैरेक्टर लम्बा एहसास छोड़ गया। कैरेक्टर के मासूमियत ने दोस्ती के साथ-साथ समाज के कई मुद्दों को बड़ी आसानी से छुआ है।
रामनगर को इस उपन्यास के ज़रिए जिस तरह से विसुआलाइस कराया गया है वो कमाल है लेकिन उससे ज़्यादा कमाल है हर एक पात्र का चरित्र।
अंतिम पेज का सीन ग़ज़ब लिखा गया है जिसे कोई भी आसानी से कल्पना कर सकता है और थोड़ा भी इमोशनल हो तो आँखो में आंसू के कुछ अंश ठहर जाएँगे उसके।