Winner of India’s highest honor, the prestigious Sahitya Akademi Award for the year 2018, Postbox No. 203 Nala Sopara by noted writer Chitra Mudgal is a heart-wrenching tale that gazes into the darkness of our hearts, a physical and social space of harrowing and horrendous suffering, a source of untold agonies and atrocities.
It is a story of a transgender boy, Vinod, and his struggle to live a life of dignity in a society which is preconditioned to treat transgenders with contempt. But Vinod is every marginalized human being who wants to carve a space for himself. His struggle is every man's struggle, every woman's struggle, every child who is denied their being; in short, he is every one of us struggling against the dehumanizing state of affairs that from the very outset rejects you as an equal.
Politicians who want to exploit you, social activists and NGOs who want to use you for their own nefarious ends—the novel cuts through all this and takes you into the heart of darkness.
This novel created a storm when it was first published in 2016.
Post box no. 203, Nala supara has become one of the best book I read this year. It highlights the problems faced by transgenders/hermaphrodites in India. And the storytelling through letters between the mother and trans son Binny, is one of the most soulful narration that captures the heart emotionally. The end of the story left me in an unsettling pain. However, it is one the most amazing story that is not to be missed.
आज भी याद है। बचपन में, जब किसी दो लोगों को लड़ते-झगड़ते देखती , तो वो आपसी गाली- गलोच में एक दूजे को हिजड़ा बोल , हाथों की उँगलियों को खोल तालियां बजाते और अपने झगड़े को जारी रखते। मानो, जैसे कि , कोई सभा लगी हो , जहाँ गालियों की प्रतिस्पर्धा चल रही है और हिजड़ा गाली , सबसे ज्यादा और ऊँचे ठहाके को अपनी ओर आकर्षित करती।
आज की जो पढ़ी लिखी मॉडर्न युवा है , वो हिजड़ा शब्द कहने पर खुद को काफी uncivilized महसूस करेगी पर अगर दो लड़कियों / दो लड़कों की गहरी दोस्ती को देखती है , तो उनपर ये कमेंट जरूर करेगी - तू लेस्बियन (lesbian)/ गे (gay) है क्या ? और वो civilized हंसी उड़ाएगी |
मुझे नहीं याद कि ये शब्द - "हिजड़ा " कौन सी उम्र में सुना था। और जब सुना था, तो बेशक इसके मतलब से बिलकुल अंजान थी। हाँ , पर लोगों की प्रतिक्रिया देख, ये जरूर समझ आ गया था कि ये शब्द बोलकर दूसरे का मजाक उड़ाया जा सकता है। जब पहली बार इस समुदाय को आँखों से देखा तो थोड़ा भय लगा - इनके पहनावे और हाव- भाव से। कोई मुझे चेहरे से पुरुष जैसे लगते , पर पहनावे और बोलचाल से स्त्री।
एक धुंधली सी याद है - तब घर पर - कजिन दीदी को बेटा हुआ था, तो ये ढोल बजाने और गाना गाने को आईं थीं। जब एक नयी बात सुनने को मिली - इनकी मांग जो भी हो , उसे पूरा करना होता है वरना इनकी बद्दुआ लगती है।
पता नहीं, फिर, इनसे भय लगने लगा था या उसके बाद से मन इन्हें अनदेखा करने लगा था। फिर ये शिक्षा - व्यवस्था की देन है , जहाँ हमपर फोकस और परीक्षा की रेस में अव्वल आने का भूत इस कदर हावी रहता है कि हम किताबों में लिखी " क, ख " और " A, B, C" को ही दुनिया समझते हैं। अगर कभी रास्ते में ये समुदाय दिखें , तो शायद हम कभी ये सोचने तक की जहमत नहीं उठाते कि ये दिखने में अलग क्यों है , ऐसा पहनावा इन्होंने क्यों अपनाया है ? इन्हें किन्नर / हिजड़े नाम से क्यों सम्बोधित किया जाता है ? ये सारे सवाल एक सजग मानव की जहन में उठेंगे पर हम बेहोश जो ठहरे।
खैर , एक दौड़ मेरा भी था जहाँ न जाने , कौन सी रेस में आँख मूंदें बस भागे ही जा रही थी, आस - पास की ख़ूबसूरती और चुनौतियों को अनदेखा किए। पर ये सवालों की तिजोड़ी लम्बे अरसे तक खुद को बंद नहीं रख पाई , जब यूँही एक रात कमरे में अपनी दोस्त से , मैं कुछ जानने- समझने की कोशिश कर रही थी , इस समुदाय से जुड़ी बातों को। " ऐसा क्या है , जो इन्हें हिजड़ा / किन्नर / LGBT/ ट्रांसजेंडर बोलते है - मुझे हमेशा परेशान करती थी। बस उसी बात चीत की दौरान मुझे जननांग विकलांगता के बारे में मालुम हुआ। ये शब्द - तो तब भी नहीं था , तब तक तो बस यही समझ पाई थी कि इनके रिप्रोडक्टिव सिस्टम (reproductive system) सामान्य लड़की या लड़के से भिन्न होते है।
ये कितनी अजीब बात है, सिर्फ शरीर के एक हिस्से का विकलांग होने की वजह से, हम सब ने इन्हें एक अलग नाम ही दे दिया | "हिजड़ा " नाम भी क्या , ये नाम तो हर वक़्त एक गाली है। इस गाली के साथ एक ऐसी दुनिया दी इन्हें , जहाँ सिर्फ ये एक भोग की वस्तु की तरह देखे जाते हैं।
ये जानने के बाद इस समुदाय के किसी भी सदस्य से कहीं भी मुलाक़ात होने पर - सड़क पर , ट्रेन में , ट्रैफिक की भीड़ में , इन्हें अनदेखा , अनसुना नहीं कर पाई। वो ट्रेन की मुलाक़ात , जब एक जननांग विकलांग महिला मुझसे सीट बदलने को तुरंत राज़ी हो बैठीं और सामान के उतार- चढ़ाव के दौरान सर पर चोट लगने पर भी हिचकिचाहट में कोई जिक्र / शिकायत नहीं किया। आज भी लगता है , चोट तो उन्हें लगी थी पर उन्होंने सहन कर लिया था। वैसे सच ही तो है , ये शारीरिक चोट भी क्या दर्द देती उन्हें , जब वो बचपन से ही हर तरह की, और ना जाने कितने किस्म कि चोटें खाती आईं हैं।
वो राह की मुलाक़ात जहाँ मदद न कर पाने पर , जब वो महिला मुझे ही दिलासा दे बैठी |
वो फ़ोन पर देखी हुई वीडियो , जहाँ खुलकर एक महिला अपनी बात रखती हैं और हमारे - आपके जैसी जिंदगी जीना , अपना अधिकार मान , खुद से एवं समाज से लड़ती हैं। link:mylink text
और आज फिर " पोस्ट बॉक्स न- २०३- नाला सोपारा" में डुबकी लगायी है मैंने- "विनोद उर्फ़ बिन्नी उर्फ़ बिमली की चिट्ठियों में , जो उन्होंने अपनी बा को सम्बोधित किए हैं।
इन चिट्ठियों के समंदर से बाहर आने के बाद खुद पर, और हम जैसे ही लोगों से निर्मित इस समाज पर , एक प्रश्न चिन्ह खड़ा उतरता है, मेरे मन में। प्रश्न सिर्फ इतना सा है - हम और आप कितने दोगले हैं , ना ?? हमने इन्हें अपने से अलग किया। इतना घिनौना भेद- भाव। वो भी मात्र इसलिए क्यूंकि वो देह के अंगों से पूरी तरह पूरे नहीं है ? हम अपनी आँखों से ये क्यों नहीं देख पाते कि जो सुकून हमें अपने माँ की आँचल में मिलता है , वही प्रेम की भंवर उनके अंदर भी उठती है , अपनी माँ के गोद में सिर रख , खुद को सुकून के दो पल देने की चाह की भंवर ।
विनोद उर्फ़ बिन्नी उर्फ़ बिमली के पत्र सिर्फ कागज़ पर लिखे चंद शब्द नहीं हैं , एक सागर है - प्रेम का , जो एक नन्हे बच्चे की तरह हर पल अपनी बा की आँचल में खुद को सिमटने की पुकार करता है। अपने ज़हन में उबल रहे हर प्रश्न का जवाब चाहता है , जानना चाहता है कि उसका कुसूर क्या है , जो उसे नरक के कुएं में धकेला गया है। उससे, उसके सपने , उसकी उड़ान, उसकी ख़ुशी , सब कुछ छीन लिया गया है। आखिर क्यों ?
ये " क्यों " हम सब के लिए एक प्रश्न चिन्ह है । क्या सिर्फ इसलिए , क्यूंकि विनोद और ये समुदाय , जननांग विकलांग हैं ? सिर्फ देह का निचला हिस्सा ना होने के कारण - क्या मानव को मानव की तरह जीने का अधिकार भी नहीं है ? इनके साथ किये गए बलात्कार, अन्याय के खिलाफ अगर ये आवाज उठाएं , तो इनसे ऐसे पेश आया जाता है जैसे इन सब के लिए ही तो इनका जन्म हुआ है। इसमें अचरज क्या है ? अन्याय कहाँ है ?
ये उपन्यास एक नज़रिया देती है। नज़रिया इनके पहचान की। हम इन्हें अन्य - 0 (others) की श्रेणी में क्यों रखते हैं ? ये स्त्री हैं या पुरुष , ये चुनाव करने का अधिकार होना चाहिए ना , इन्हें। इनपर किये गए अपमान , बलात्कार - ये दिलों को दहलाने वाले होते हैं । वंदना बेन ने तो अपने अंतिम क्षणों में विनोद से घर वापसी की अपील की पर पता नहीं कितने विनोद , कितनी पूनम , आज दर दर की ठोकरें खा रही हैं , इस नरक में जिसमें हमने और आपने मिलकर धकेला हैं , इन्हें।
ये सवाल घंटों तक शोर मचाता रहा है मेरे अंतर्मन में - क्या विनोद अपनी बा को अपनी आखिरी चिट्ठी पढ़ा पाया ? क्या वंदना बेन अपने लाडले दिकरे को ज़ी भरके अपनी छाती से लिपटा सकी ??
जवाब आपकी आँखों में बारिश ला देगा।
हम और आप कितने हिंसक और क्रूर है , पता नहीं कौन सा मुखौटा पहन घूमते हैं। इसे पढ़ने के उपरान्त , अपने भीतर नजर जरूर डालियेगा।
ये उपन्यास पढ़ते वक़्त , अपने मन में उठ रहे भाव को लिखते लिखते , ये विचार अक़सर उठा है - कि मैं भी तो बस संवेदनशील होकर बस कुछ ज़हन की बातें ही तो कागज़ पर उतार रहीं हूँ। कभी जंग के मैदान में उतर , इनके संघर्ष भरे जीवन को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो कभी नहीं किया है । तो फिर ये लिखने का क्या ही फायदा।
पर नहीं , इस विचार के साथ एक आशा की किरण भी चमकती है , जो ये कहती है कि क्या पता - इसे पढ़कर, कम से कम हम अपनी सोच तो बदल सकेंगे , कम से कम इन्हें राह पर देख अनदेखा ना करेंगे। अपने अंदर ही सही , कम से कम इन्हें अपने जैसा ही एक सामान्य मनुष्य मान सकेंगे , जो इस ही पृथ्वी की मिट्टी से है , जैसे हम और आप ।ये समझ सकेंगे कि नीले आसमान पर जब लालिमा बिखरती है - तो इनका दिल भी उस खूबसूरती को देख धक् धक् करता है । बिलकुल हमारे और आपके जैसा । कोयल की कू- कू , चिड़ियों की गूंज , बहती हवा की मधुर संगीत , रौशनी, घुंघरू , कला , ये सब इन्हें भी ख़ुशी और खिलखिलाहट से भर देती है । ये भी दर्द को एहसास करते हैं । इन्हें भी दर्द होता है । ये भी ऊँची उड़ान भरने की ख्वाइश रखते हैं । और बिलकुल हमारे और आपकी तरह। जननांग विकलांग जरूर हैं, पर माँ और पिता का एहसास फिर भी अपने अंदर जीते हैं ।
तो फिर ये भेद भाव कैसा ??
क्या पता , कभी किसी मोड़ पर , इस छोटे से जीवन काल में , यूँ ही किसी जननांग विकलांग महिला या पुरुष से मुलाक़ात होने पर , इनकी उन्नति की ओर , अपना किसी भी प्रकार का योगदान दे सकूँ , तो खुद को सौभाग्यवती समझूंगी।
उपन्यास 'पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा' पत्र के शक्ल में विनोद उर्फ बिन्नी उर्फ बिमली के द्वारा अपने माँ को लिखी गई है.
अपने लिंग भेद के कारण घर से निकाल दिए गए विनोद के अंदर चल रही बेचैनियों एवं उथल-पुथल को उसने पत्र के माध्यम से अपनी माँ को लिखा है. जिससे हमें उस पूरे समाज का कटु सच को जान पाते है. जिसे हमने हमेशा से अनदेखा किया है, या मजाक के पात्र भर ही समझा.
लेखिका के प्रयास से हम सामाजिक के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर हो रहे तीसरे लिंग के साथ भेदभाव को समझ सकते है. जिसे पढ़ने के बाद कहीं न कहीं एक समाज के तौर पर लोगों का नज़रिया बदलने में हिन्दी मुख्यधारा में इस विषय पर लिखी गई यह पुस्तक सहायक होगी.
अर्धविकसित जनांगो या लिंग भेद के साथ जन्मे मनुष्यों के प्रति सामाजिक चेतना को जागरूक करने की दिशा मे यह एक बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास है| यह कहानी है उन लोगों की जिन्हे सरकारी फॉर्मों में "थर्ड जेंडर" या "० - अदर" का खाँचा तो मिला है लेकिन सामाज में मनुष्य होने का दर्जा अभी तक नहीं मिला, मानव अधिकार तो बहुत दूर की बात है|
अगर कहानी के अंदाज़ की बात करें तो यह पुत्र द्वारा माँ को लिखे गए पत्रों की श्रृंखला के रूप में लिखी गई है, जिसमे वह अपने जीवन के अनेक पहलुओं का ज़िक्र करता है, उसकी अनेक अभिलाषाएं भी हैं और कई चुभते प्रश्न भी, उसके मन्न में परिवार के प्रति संवेदनाएं भी हैं और भीतर बसा क्रोध भी, बेबसी भी है और अनेक सपने भी| कहानी में भले ही मुख्य किरदारों का चरित्र निर्माण तीव्र गति से होता है लेकिन वह हर कदम पर पाठक को रोक उसकी चेतना को झंझोरती है और अनेक नये पहलू प्रस्तुत कर सोचने पर मजबूर करती है| यह किताब आप भले ही एक दिन में पढ़ जाएं लेकिन इसकी छाप मस्तिष्क पर बनी रहेगी|
ट्रांसजेंडर समुदाय के मुद्दों पर "पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा" जितना हल्का उपन्यास हो ही नहीं सकता। उस पर तुर्रा यह कि इस किताब को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला हुआ है। यह इस कदर अझेल है कि इसके ऊपर से नयी वाली हिन्दी भी माउथ फ्रेशनर का काम करेगी।
I was skeptical of the format of letters written back and forth, but it worked out really well. We mostly get the view of Vinod/Binni/Bimli but sometimes there are letters by Ba (mother). Vinod/Binni/Bimli goes from a naive, doe eyed, sweet child who was loved so thoroughly to a realistic, scared, and heartbroken adult. The atrocities that the whole non-gender conforming community faces still today, despite having a well established and mostly accepted Hijra community for decades/centuries is difficult to read about but not entirely surprising.
Though aside from Vinod's ba, no one really loved him in the family, when he left and found his second family with Poonam Joshi and Sardar (among others), he found a lot of love. But then when he finally got a job in a politician's circle, that's when he found the worst realities of the world.
But over the course of the story, we find out the enormous capacity of love and tolerance that Vinod possesses. What attracted Poonam to him was exactly this. It was sweet how well she treated him. And how hard Vinod worked to make something of himself despite the way he was treated all through out his life.
It truly is amazing how well the author wove this story, considering that for the most part, we are listening to Vinod writing letters to his Ba.
शानदार,ज़बरदस्त,अद्भुत...हमारी एक ऐसी धारणा तोड़ने की क्षमता रखती है जो हमारे मन में बचपन से समाज द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कहीं ना कहीं बैठा दी जाती है..थर्ड जेंडर पर कुछ बेहतरीन पढ़ना चाहते हैं तो ये आपके लिए है
The character development...limited words but expressed a lot... Language ...Chitra Mudgal's highly graceful command has been reflected in it... You are going so late to thic character about almost unrelatable trials and tribulations. It truly deserved its Sahitya Academy Award.
A story well defined by small stories of a person, a family and a society. Before diving into the book itself I knew this would not be a everyone-is-happy-at-the-end book, but it is more shattering and thought provoking than expected. It left me thinking what kind of society are we living in where human is not considered human.
It deals with a mother-child bond, a riot for justice and hypocrisy of our politicians. The end left me shattered and broken inside with anger and sadness. I hoped this would have an open ending, but like life itself, the ending is unexpected and somehow I want to change that.
At first Binny reminded me of Anjum, from The Ministry of Utmost Happiness, but after a while I realized how different these characters are. Unlike others I also assumed they are same as they have same birth defect( which is also not same). Such books show an ugly reflection of society and help us recognize our own ignorant behavior.