सुविख्यात साहित्यकार गुरबख़्श सिंह पंजाबी भाषा-साहित्य में प्रगतिशील चेतना के जनक माने जाते हैं। आधुनिक पंजाबी साहित्य को उन्होंने कथ्य, भाषा और शिल्प के विभिन्न स्तरों पर प्रभावित किया है और उनके अनेक मौलिक विचार-सूत्र पंजाबी जन-जीवन में मुहावरों की तरह ग्राह्य हो गए हैं।
‘कागा सब तन खाइयो’ उनके द्वारा पुनर्रचित कुछ अमर प्रेम-कथाओं का संग्रह है। हीर-राँझा, सोहनी-महिवाल, शीरी-फ़रहाद, लैला-मजनूँ, सस्सी-पुन्नू और मिर्ज़ा-साहिबाँ जैसे प्रेमी युगल सदियों से भारतीय, ख़ासकर पंजाबी जनमानस को आन्दोलित करते हुए प्रेम के सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गए हैं। इनके साथ प्रेम की वह रागात्मक ऊँचाई जुड़ी हुई है, जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियावी रस्मो-रिवाज छू पाते हैं, हालाँकि वे उन्हें सह नहीं पाते। लेखक ने प्रेम-हृदयों की इस शाश्वत त्रासदी को जिस आत्मीयता और कोमलता से उकेरा है, वह सिर्फ़ अनुभव का ही विषय है।