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बम का दर्शन और अदालत में बयान

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हिन्दुस्तानी इन्क़लाब के सबसे बड़े प्रतीक शहीदेआज़म भगतसिंह की फाँसी के बाद
73 वर्ष और उस आज़ादी के बाद 57 वर्ष का समय बीत चुका है, जो हमें कांग्रेस के
नेतृत्व में मिली।
भगतसिंह ने बार-बार यह चेतावनी दी थी कि कांग्रेस के रास्ते पर चलकर मिलने
वाली आज़ादी 10 फ़ीसदी ऊपर के लोगों की आज़ादी होगी, पूँजीपतियों-साहूकारों की
आज़ादी होगी; देश के 90 फ़ीसदी मज़दूरों-किसानों की ज़िन्दगी को शोषण और लूट से
आज़ादी नहीं मिलेगी। इन 57 वर्षों के एक-एक दिन ने उस नौजवान की चेतावनी को सच
साबित किया है। लुटेरों की चमड़ी का रंग बदल गया है, पर लूट बन्द होना तो दूर और
तेज़ होती गयी है।
आधी सदी से कुछ अधिक के भीतर देशी पूँजीवादी सत्ता की गोलियों ने उससे
अधिक जनता का ख़ून बहाया है, जितना दो सौ वर्षों के दौरान अंग्रेज़ों ने बहाया था।
कहने को जनतन्त्र है, पर अन्यायी सत्ता के विरुद्ध उठने वाली हर आवाज़ को, हर
आन्दोलन को कुचल देने के लिए न तो नये-नये काले कानूनों की कमी है, न जेलों,
पुलिस और फ़ौज की। प्रतिदिन देश के किसी न किसी कोने में छात्रों, मज़दूरों या किसानों
पर गोलियाँ चल रही हैं।
देश विदेशी क़र्ज़ से लदा है। एक ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जगह दर्जनों विदेशी डाकू
देशी धन्नासेठों के साथ मिलकर भारत की जनता की मेहनत को और हमारी इस सर्वगुणसम्पन्न
धरती को लूट रहे हैं। ऊपर के क़रीब सौ बड़े पूँजीपति घरानों की पूँजी में दोगुने-चौगुने
की नहीं बल्कि दो सौ गुने से लेकर चार सौ गुने तक की बढ़ोत्तरी हुई है जबकि दूसरी ओर
आधी आबादी को शिक्षा और दवा-इलाज तो दूर, भरपेट भोजन भी मयस्सर नहीं है। 1947
में देश को जो अधूरी और विकलांग आज़ादी मिली, उसका पूरा फ़ायदा सिर्फ़ ऊपर की
बीस फ़ीसदी धनिक आबादी को ही मिला है जो पूँजीपतियों की चाकरी बजाती है और
साम्राज्यवादियों के तलवे चाटने के लिए तैयार है।
देश के नौजवानों ने बहुत इन्तज़ार कर लिया। बहुत दिनों तक घुट-घुटकर जी
लिया। इस या उस चुनावबाज़ पार्टी से बदलाव की उम्मीदें पालकर बहुत धोखा खा लिया।
अब उन्हें सोचना ही होगा कि अब और कितना छले जायेंगे? अब और कितना बर्दाश्त
करेंगे? दुनियादारी के भंवरजाल में कब तक फँसे रहेंगे? कितने दिन तक चुनौतियों से
आँखें चुरायेंगे? उन्हें भगतसिंह के सन्देश को सुनना होगा! नयी क्रान्ति की राह पर चलने
के लिए वक़्त आवाज़ दे रहा है। उसे सुनना होगा!
यहाँ प्रस्तुत लेख और अदालत में बयान यह बताते हैं कि भगतसिंह और उनके
साथी किस तरह की क्रान्ति लाना चाहते थे और उनके सामने आज़ाद भारत का कैसा
नक्शा था।

31 pages, Mass Market Paperback

Published January 1, 2017

About the author

Bhagat Singh

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Bhagat Singh was an Indian socialist considered to be one of the most influential revolutionaries of the Indian independence movement. He is often referred to as "Shaheed Bhagat Singh", the word "Shaheed" meaning "martyr" in a number of South Asian and Middle Eastern languages. Born into a Sikh family which had earlier been involved in revolutionary activities against the British Raj, as a teenager Singh studied European revolutionary movements and was attracted to anarchist and Marxist ideologies. He became involved in numerous revolutionary organisations, and quickly rose through the ranks of the Hindustan Republican Association (HRA) to become one of its main leaders, eventually changing its name to the Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) in 1928.

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