'कर्णकविता' बंगलूरु में लिखी जा रही हिन्दी-उर्दू कविताओं का संकलन है| इस अहिन्दी भाषी प्रदेश में भी, छोटे-छोटे समूहों में या स्वतंत्र रूप से काम करते हुए कवि हिन्दी और उर्दू कविता के साथ प्रयोग कर रहे हैं| यह बाद हिन्दी भाषी क्षेत्र के किसी भी पाठक या लेखक के लिए जितनी साधारण है, दक्षिण भारतीयों के लिए उतनी ही अविश्वसनीय| 'कर्णकविता' का प्रयोजन इसी तथ्य से रेखांकित हो जाता है कि इस प्रकार का यह पहला संकलन है|
इस संग्रह से जुड़े अधिकांश कवि युवा है और एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र में रहते हुए अपनी कविता की ज़मीन तलाश रहे हैं| कुछ कन्नड़ भाषी हैं, और हिन्दी में लेखन की इच्छा और सामर्थ्य रखते हैं| 'कर्णकविता' इन युवा कवियों को प्रोत्साहित करने और इन्हें संभावित पाठकों से जोड़ने के इरादे से भरी एक ईमानदार कोशिश है, एक विनम्र पहल है| आशा है कि यह अपने पाठकों से एक अर्थपूर्ण संवाद स्थापित करने में सफल रहेगी और भविष्य में यहाँ लिखी जाने वाली हिन्दी-उर्दू कविताओं का मार्ग प्रशस्त करेगी|
सौरव रॉय, संपादकीय टीम, और प्रकाशकों की मेहनत की इस सफलता पर बहुत बहुत बधाई । दक्षिण भारत से हिंदी की एक ऐसी किताब का निकलना अपने आप में बड़ी बात है । इससे हिंदी को विस्तार तो मिलेगा ही, साथ ही साथ हिंदी में अपनी ज़मीन तलाश रहे युवा कवियों के लिए भी एक यह किताब मनोबल बढ़ाने का काम कर रही है । दक्षिण राज्यों से ऐसे और भी संकलनों के निकलने की आशा करता हूँ ।
It's a wonder, this book. Read it in full, and was surprised at the variety and still a similarity that was there across almost the entire book. Great job by the editors.