मोहन राकेश का नाटक "पैर तले की ज़मीन" उनकी मृत्यु के समय अधूरी रह गई थी। यह नाटक बाद में उनके मित्र कमलेश्वर द्वारा पूरा किया गया, जिसके बाद इसे प्रकाशित किया गया।
कहानी एक द्वीप पर बने बार की है, जो मुख्य भूमि से एक पुल के जरिए जुड़ा है। बार का मालिक एक शाम बार में फोन करता है और कहता है कि वे बार खाली कर दी जाए, वह चेतावनी देता है कि मौसम खराब है और पुल टूटने की कगार पर है।
ज्यादातर लोग बार छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन कुछ लोग और बार के कुछ कर्मचारी अभी भी वहाँ रुक गए हैं। शुरू में ये लोग मौसम की गंभीरता और टूटते पुल के खतरे को नजरअंदाज करते हैं। वे अपनी-अपनी दुनिया में मशगूल रहते हैं—कोई काम में, कोई बातचीत में—यह सोचकर कि शायद स्थिति संभल जाएगी। लेकिन कुछ समय बाद, जब मौसम और बिगड़ जाता है, उन्हें एहसास होता है कि अब बहुत देर हो चुकी है। पुल टूट जाता है, और वे अपनी आँखों के सामने मौत को देखते हैं। इस संकट के क्षण में नाटक का असली मर्म सामने आता है। विभिन्न पात्र अपने जीवन और उसकी सार्थकता के बारे में सोचते हैं। कोई अपने अतीत को याद करता है, कोई अपने परिवार के लिए चिंतित होता है, तो कोई उस पल में जीने की कोशिश करता है।
लेखक इन अलग-अलग दृष्टिकोणों को बखूबी उकेरते हैं। शीर्षक "पैर तले की ज़मीन" इस स्थिति को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है, जैसे उनका शारीरिक और भावनात्मक आधार खिसक गया हो।
लेखक की भाषा सरल लेकिन गहरी है, जो संवादों और मौन के बीच एक संतुलन बनाती है। हालांकि, चूंकि यह नाटक उनकी मृत्यु से पहले पूरा नहीं हुआ था, कमलेश्वर द्वारा इसे पूरा करने के बाद भी इसमें एक अधूरेपन की भावना रह जाती है। शायद कहानी का अंत या कुछ हिस्से उतने परिष्कृत नहीं हो सके, जितने राकेश खुद इसे बना सकते थे।