This ebook is from Rajpal and Sons, a 103 year-old publishing house headquartered in Delhi. Rajpal and Sons publishes books in English and Hindi languages, in non-fiction, fiction, classic and contemporary literature, and children categories.
शिक्षा: संस्कृत में शास्त्री, अंग्रेजी में बी.ए., संस्कृत और हिन्दी में एम.ए.।
आजीविकाः लाहौर, मुंबई, शिमला, जालंधर और दिल्ली में अध्यापन, संपादन और स्वतंत्र-लेखन।
महत्त्वपूर्ण कथाकार होने के साथ-साथ एक अप्रतिम और लोकप्रिय नाट्य-लेखक। नितांत असंभव और बेहद ईमानदार आदमी।
प्रकाशित पुस्तकें: अँधेरे बंद कमरे, अंतराल, न आने वाला कल (उपन्यास); आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे, पैर तले की ज़मीन (नाटक); शाकुंतल, मृच्छकटिक (अनूदित नाटक); अंडे के छिलके, अन्य एकांकी तथा बीज नाटक, रात बीतने तक तथा अन्य ध्वनि नाटक (एकांकी); क्वार्टर, पहचान, वारिस, एक घटना (कहानी-संग्रह); बक़लम खुद, परिवेश (निबन्ध); आखिरी चट्टान तक (यात्रावृत्त); एकत्र (अप्रकाशित-असंकलित रचनाएँ); बिना हाड़-मांस के आदमी (बालोपयोगी कहानी-संग्रह) तथा मोहन राकेश रचनावली (13 खंड)।
सम्मान: सर्वश्रेष्ठ नाटक और सर्वश्रेष्ठ नाटककार के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नेहरू फ़ेलोशिप, फि़ल्म वित्त निगम का निदेशकत्व, फि़ल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य।
I have read Aadhe Adhooray by Mohan Rakesh and that is an excellent play. I expected something close to it here but this one was ok. The start was nice but the end was just ok.
मोहन राकेश का नाटक "पैर तले की ज़मीन" उनकी मृत्यु के समय अधूरी रह गई थी। यह नाटक बाद में उनके मित्र कमलेश्वर द्वारा पूरा किया गया, जिसके बाद इसे प्रकाशित किया गया।
कहानी एक द्वीप पर बने बार की है, जो मुख्य भूमि से एक पुल के जरिए जुड़ा है। बार का मालिक एक शाम बार में फोन करता है और कहता है कि वे बार खाली कर दी जाए, वह चेतावनी देता है कि मौसम खराब है और पुल टूटने की कगार पर है।
ज्यादातर लोग बार छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन कुछ लोग और बार के कुछ कर्मचारी अभी भी वहाँ रुक गए हैं। शुरू में ये लोग मौसम की गंभीरता और टूटते पुल के खतरे को नजरअंदाज करते हैं। वे अपनी-अपनी दुनिया में मशगूल रहते हैं—कोई काम में, कोई बातचीत में—यह सोचकर कि शायद स्थिति संभल जाएगी। लेकिन कुछ समय बाद, जब मौसम और बिगड़ जाता है, उन्हें एहसास होता है कि अब बहुत देर हो चुकी है। पुल टूट जाता है, और वे अपनी आँखों के सामने मौत को देखते हैं। इस संकट के क्षण में नाटक का असली मर्म सामने आता है। विभिन्न पात्र अपने जीवन और उसकी सार्थकता के बारे में सोचते हैं। कोई अपने अतीत को याद करता है, कोई अपने परिवार के लिए चिंतित होता है, तो कोई उस पल में जीने की कोशिश करता है।
लेखक इन अलग-अलग दृष्टिकोणों को बखूबी उकेरते हैं। शीर्षक "पैर तले की ज़मीन" इस स्थिति को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है, जैसे उनका शारीरिक और भावनात्मक आधार खिसक गया हो।
लेखक की भाषा सरल लेकिन गहरी है, जो संवादों और मौन के बीच एक संतुलन बनाती है। हालांकि, चूंकि यह नाटक उनकी मृत्यु से पहले पूरा नहीं हुआ था, कमलेश्वर द्वारा इसे पूरा करने के बाद भी इसमें एक अधूरेपन की भावना रह जाती है। शायद कहानी का अंत या कुछ हिस्से उतने परिष्कृत नहीं हो सके, जितने राकेश खुद इसे बना सकते थे।