राष्ट्रीय और सांस्कृतिक स्वरों में लिखने वाले गुप्त जी की अनोखी रचना 'भारत-भारती' है जिसे उन्होंने पराधीन भारत में, वर्ष 1912 में लिख दिया था। यह पुस्तक तीन खंडों में विस्तृत है - अतीत, वर्तमान और भविष्यत।
हिंदी में अभी तक इस ढंग की कोई कविता पुस्तक नहीं लिखी गई जिसमे हमारी प्राचीन उन्नति और अकथ्य अवनति का वर्णन भी हो और भविष्य के लिए प्रोत्साहन भी। इस पुस्तक में यह प्रयास किया गया है। इस कविता में विशेषकर प्राचीन भारत का गौरव-गान अत्यंत ओजस्वी वाणी में किया गया है। तभी तो यह कविता स्वंतंत्रता आंदोलन में प्रेरक रचना सिद्ध हुई और न जाने कितने स्वतंत्रता प्रेमियों को इसने प्रेरित किया। साथ ही, इसमें दुर्भिक्ष का विवरण भी बहुत ही मर्मस्पर्शी है।
अतीत के गुणगान के साथ इसमें हमारी वर्तमान दुर्दशा व इसके कारण पर चर्चा और भविष्य के लिए एकजुट हो नए मार्ग और नई सोच का आवाह्न भी किया गया है। खड़ी बोली में लिखी इस रचना में गुप्त जी का कविता ज्ञान एवं मानव जीवन की प्रायः सभी अवस्थाओं, प्रश्नों, मूल्यों, परिस्थितियों और भावों के वर्णन का उनका अनुपम कौशल दिखलाई पड़ता है। सही अर्थों में भारत-भारती राष्ट्र के जनजागरण पर अति विशिष्ट कविता है।
मानस-भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती-
भगवान! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती...
भू-लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहां?
फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहां।
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन भारतवर्ष है।।