Jump to ratings and reviews
Rate this book

बिहार का अपहरण : जनतंत्र, जनभावना और भविष्य को बंधक बना लिया गया (जब राजनीति शोभा नहीं, शर्म बन जाए)

Rate this book
भूमिका
जब राजनीति शोभा नहीं, शर्म बन जाए...

यह किताब मेरे भीतर बहुत समय से पल रही बेचैनी की उपज है। बिहार - मेरा प्रदेश, मेरी आत्मा का अंश - जिस तरह से बार-बार अपमानित, उपेक्षित और लूटा गया है, वह सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक विषय नहीं रहा, वह एक व्यक्तिगत वेदना बन गई है।

“बिहार का अपहरण” कोई सनसनीखेज शीर्षक नहीं है, बल्कि यह उस सच्चाई का सीधा और कड़वा बयान है, जिसे हमने दशकों तक देखा, सुना और झेला है। यहाँ जनतंत्र को सिर्फ एक चुनावी तमाशा बना दिया गया, जनभावनाओं को नारेबाज़ी में कुचल दिया गया और भविष्य को सिर्फ वायदों की धूल में गुम कर दिया गया।

मैंने यह पुस्तक किसी पूर्वाग्रह या पूर्वनियोजित दृष्टिकोण से नहीं लिखी। यह मेरे अनुभवों, मेरी पीड़ा और मेरी उम्मीदों का मिश्रण ì

41 pages, Kindle Edition

Published June 11, 2025

About the author

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
0 (0%)
4 stars
0 (0%)
3 stars
0 (0%)
2 stars
0 (0%)
1 star
0 (0%)
No one has reviewed this book yet.

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.