यह किताब मेरे भीतर बहुत समय से पल रही बेचैनी की उपज है। बिहार - मेरा प्रदेश, मेरी आत्मा का अंश - जिस तरह से बार-बार अपमानित, उपेक्षित और लूटा गया है, वह सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक विषय नहीं रहा, वह एक व्यक्तिगत वेदना बन गई है।
“बिहार का अपहरण” कोई सनसनीखेज शीर्षक नहीं है, बल्कि यह उस सच्चाई का सीधा और कड़वा बयान है, जिसे हमने दशकों तक देखा, सुना और झेला है। यहाँ जनतंत्र को सिर्फ एक चुनावी तमाशा बना दिया गया, जनभावनाओं को नारेबाज़ी में कुचल दिया गया और भविष्य को सिर्फ वायदों की धूल में गुम कर दिया गया।
मैंने यह पुस्तक किसी पूर्वाग्रह या पूर्वनियोजित दृष्टिकोण से नहीं लिखी। यह मेरे अनुभवों, मेरी पीड़ा और मेरी उम्मीदों का मिश्रण ì