क्या होता है जब संहारक की चेतना अग्नि बनकर जन्म लेती है? यह उपन्यास ‘कार्तिकेय’ उस बालक की यात्रा है, जो शिव के तेज से जन्मा, गंगा की गोद में पला, और छह माताओं के वात्सल्य में पनपा। यह कथा उस युवा देवता की है जिसे केवल युद्ध नहीं, कर्तव्य का सच्चा अर्थ भी सीखना है—प्रेम, भाईचारा, त्याग और आत्मबोध की जटिल राहों से गुजरकर। तारकासुर का वरदान अपराजेयता है। देवता भयभीत हैं। धर्म संकट में है। और तब, एक नई शक्ति का आविर्भाव होता है—षडानन, देवसेना का नायक, शांति और शक्ति के बीच संतुलन की प्रतीक। यह केवल युद्ध की कथा नहीं, यह उस युद्ध के भीतर चल रहे भावनात्मक और आध्यात्मिक द्वंद्व की भी महागाथा है। यहाँ वीरता है, पर क्रोध के साथ विवेक भी है&