क्या औरत होना काफ़ी नहीं?”
एक ऐसी किताब है जो हर उस सवाल से टकराती है जो औरतों से बार-बार पूछा गया — पर जवाब कभी नहीं सुना गया।
यह सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि उन आवाज़ों की यात्रा है जो सदियों से दबाई जाती रही हैं।
✦ जब औरत बोलती है, तो उसे कुलटा कहा जाता है।
✦ जब वो चुप रहती है, तो उसे आदर्श माना जाता है।
✦ जब वो अपने लिए खड़ी होती है, तो उसे दोषी ठहराया जाता है।
इस किताब में 20 अध्यायों के ज़रिए लेखिका ज्योति चौहान ने उन विषयों को छुआ है जिन्हें अक्सर ‘संस्कार’, ‘धर्म’, ‘मर्यादा’ और ‘इज़्ज़त’ के नाम पर छुपा दिया जाता है।
माँ, बहन, पत्नी, देवी — हर रिश्ते में औरत खोती रही है, पर इंसान कब बन पाई?
यह किताब हर उस इंसान के लिए है
जो औरत होकर हर दिन खुद को साबित करती हैजो &