विवेक, एक सीधा-साधा लड़का, नई नौकरी पर चंद्रपुर आता है, लेकिन उसे नहीं पता कि उसकी ज़िंदगी की हर रात अब जलने वाली है! पड़ोसी, विवाहित विजया — जो सालों से बुझी हुई थी — उसके सामने एक छोटे से हादसे में, एक ऐसी चिंगारी भड़काती है, जो उनकी सारी वर्जनाओं को जलाकर राख कर देती है।
यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, यह वासना का वो बेकाबू बवंडर है जहाँ:
अधूरी प्यास फूट पड़ती है: विजया की वर्षों की दबी हुई अतृप्ति, विवेक के युवा, जलते हुए जिस्म से टकराकर एक भयानक आग बन जाती है।
हर स्पर्श बनता है तूफान: बाथरूम की दीवारों से शुरू हुई वो हलचल, बिस्तर तक ऐसी आग लगाती है जहाँ हर साँस, हर आह, एक-दूसरे में पिघल जाने को मजबूर करती है।