"सोच बदलो, ज़िंदगी बदलेंगी" सिर्फ़ एक किताब नहीं, एक आईना है — जिसमें आप खुद को देख पाएंगे, समझ पाएंगे और थोड़ा और बेहतर बन पाएंगे।
इस किताब के हर अध्याय में ज़िंदगी के उन पलों को छुआ गया है, जिनसे हम सब कभी न कभी गुज़रते हैं — जब मन करता है सब छोड़ दें, जब डर हावी हो जाता है, जब पछतावा चैन नहीं लेने देता, जब हम खुद को माफ़ नहीं कर पाते, और जब सब कुछ एक झूले की तरह ऊपर-नीचे चलता है।
यह किताब आपके साथ कोई भाषण नहीं देती — यह आपसे बातें करती है, जैसे कोई पुराना दोस्त जो समझता है आपको। यह किताब मज़ाक भी करती है, आँसू भी बहाती है और फिर धीरे से आपको मुस्कुराना सिखाती है।
हर पन्ना एक एहसास है। हर लाइन एक अनुभव। हर अध्याय एक दरवाज़ा — सोच बदलने का, और ज़िंदगी को नए नज़रिए से देखने का।