२.५/५ ये पहला अनिल मोहन का उपन्यास है जो मैंने पढ़ा। उपन्यास की शुरुआत तो मुझे बेहतरीन लगी। रहस्य की गुत्थी इतनी पेचीदा थी की पहले १००-१५० पृष्ठों को मैं एक बार में ही पढ़ गया। लेकिन अंत तक आते आते कहानी मुझे थोडा सा ढीली लगने लगी। कुछ बातें कहानी में ऐसी हुई जो मुझे जची नहीं। आप मेरा पूरा रिव्यु इधर पढ़ सकते हैं - खून की प्यासी