Jump to ratings and reviews

जब सब टूटा हो: टूटकर भी जो इंसान संभलता है, वही असली विजेता बनता है।

“जब सब टूटा हो” एक ऐसी किताब है जो इंसान के टूटन से लेकर उसके नए जन्म तक का सफ़र बताती है।
हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी ऐसे दौर से गुज़रता है जब सपने बिखर जाते हैं, रिश्ते टूट जाते हैं, भरोसा डगमगा जाता है और दिल खाली-सा महसूस करता है।

यह किताब उन अंधेरों में रोशनी खोजने की कहानी है।
यह बताती है कि टूटना अंत नहीं, बल्कि एक नयी शुरुआत है।
जब इंसान दर्द को ताक़त में बदलना सीखता है, तो वही उसकी सबसे बड़ी जीत बन जाती है।

अगर आप भी संघर्ष और अकेलेपन से गुज़र रहे हैं, तो यह किताब आपको अपने भीतर की उस शक्ति से मिलवाएगी जो आपको फिर से उठाकर खड़ा कर सकती है।
याद रखिए —
**“जब सब टूटा हो… तभी असली शुरुआत होती है।”**

19 pages, Kindle Edition

Published August 29, 2025

Loading...
Loading...

About the author

CEO LSR

210 books

Ratings & Reviews

What do you think?

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
0 (0%)
4 stars
1 (100%)
3 stars
0 (0%)
2 stars
0 (0%)
1 star
0 (0%)
No one has reviewed this book yet.