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इतवार का एक दिन [Itvaar Ka Ek Din]

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कभी-कभी कहानियाँ आपके भीतर ही दबी रहती हैं — तब तक, जब तक अवसाद उन्हें बाहर खींच न ले।" ‘इतवार का एक दिन’ केवल एक कहानी संग्रह नहीं, बल्कि एक लेखक की आत्मा से रिसती हुई उन स्याह स्याह शामों की झलक है, जिन्हें अक्सर हम अपनी यादों की दराज में छिपा देते हैं। ब्रजेश कुमार सिंह — जो ‘अरहान’ नाम से लिखते हैं — ने इन कहानियों के ज़रिये अपने भीतर के अंधेरों, प्रेम के जटिलताओं, खोए हुए किरदारों, और उन अधूरी बातों को दर्ज किया है जो कहे जाने से चूक गईं। इस संग्रह में आप मिलेंगे: उस आदमी से, जो अपनी पत्नी को प्रेमी के साथ शादी करने देता है… उस लड़की से, जिसकी लाश अब भी इंतज़ार कर रही है कि कोई उसकी मौत की सच्चाई लिखे… उन गुम बिल्ली के बच्चों से, जिनकी तलाश शायद किसी मुराकामी की गलियों में होती है… उस लेखक से, जो हर बार टूटकर भी अपने किरदारों को नया जीवन देना चाहता है… लेखक की शैली में मुराकामी और काफ़्का की परछाइयाँ हैं, लेकिन उसके किरदार पूरी तरह देसी, संवेदनशील और हमारे आस-पास के हैं। अवसाद, प्रेम, अकेलापन, स्मृति, पछतावा और फैंटेसी — यह किताब आपको भीतर तक महसूस करवा सकती है। यदि आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि आपको भीतर तक टटोलें — तो 'इतवार का एक दिन' आपके लिए है।

128 pages, Paperback

First published July 24, 2025

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Profile Image for Shivanshu.
2 reviews4 followers
September 6, 2025
अरहान की “इतवार का एक दिन” पढ़ना मानो उन भावनाओं की गलियों में लौटना है, जहाँ रोशनी कम है पर एहसास गहरे हैं। यह कहानी-संग्रह रोज़मर्रा के जीवन की साधारण-सी लगने वाली घटनाओं में छुपी असाधारण पीड़ा, प्रेम और स्मृतियों को उकेरता है। किरदार इतने सजीव हैं कि पढ़ते-पढ़ते लगता है वे आपके ही मोहल्ले में रहते होंगे, कभी खोए हुए, कभी टूटे हुए, पर भीतर से बेहद सच्चे।

यह किताब आपको जल्दबाज़ी में आगे नहीं बढ़ने देती; हर पन्ना ठहरकर पढ़ने और महसूस करने की मांग करता है। पढ़ने के बाद भी इसकी गूंज भीतर लंबे समय तक रहती है, जैसे किसी पुराने इतवार की धीमी, उदास दोपहर।
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