राजन, सीतलवादी में एक कंपनी में काम की तलाश में जाता है। वहां एक दिन रास्ते में वह एक लड़की से टकरा जाता है। जिसका नाम पार्वती है। वह दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन जब यह बात लड़की के बाबा को पता चलती है। तो वह यह आघात बर्दाश्त नहीं कर पाते और मरने से पहले पार्वती का विवाह कंपनी के मैनेजर हरीश से तय कर जाते हैं। एक दिन रस्सी का पुल पार करते हुए हरीश का पैर फिशलता है और वह मर जाता है। पार्वती, राजन को हरीश का जिम्मेदार ठहराती है क्योंकि घटना के समय राजन भी वही मौजदू होता है। क्या वास्तव में ही राजन हरीश की मौत का जिम्मेदार था ? क्या पार्वती के विधवा होने पर राजन ने फिर उससे विवाह किया ? क्या पार्वती ने अपने पति की मौत का बदला लिया ? दो तड़पते दिलों की कहानी जिसे लोकप्रì
Gulshan Nanda (1929 - November 16, 1985) was a popular Indian novelist and screenwriter. Many of his novels were adapted into Hindi films in the 1960s and 1970s, including more than a dozen big hits of the period - Kaajal (1965), Kati Patang (1970), Khilona (1970), Sharmeelee (1971) and Daag (1973). His stories encompassed a range of themes, from social issues and romance to action thrillers. He was nominated for the Filmfare Award for Best Story six times, for Kaajal (1965), Neel Kamal (1968), Khilona (1970), Kati Patang (1970), Naya Zamana (1971) and Mehbooba (1976).
कुछ किताबें बरसों याद रहती हैं, जलती चट्टान भी ऐसी ही एक किताब है जो मैंने शायद 25 साल पहले पढ़ी थी, लेकिन मुझे राजन और शीतल आज तक याद हैं, किसी और के साथ जीवन की शुरुआत करती शीतल भी और चट्टानों के बीच जलता हुआ राजन भी।
Beautiful! A lovely story with unforgettable protagonists. The writing style was simply amazing. This book is going to stay in my heart for a long time. There's something magically innocent about the book that I can't express in words. I highly highly recommend it.
कितनी खूबसूरत कहानी थी, मैंने दस साल पहले पढ़ी थी लेकिन आज भी पूरी कहानी वासी की वैसी ही याद है, गुलशन नंदा साहब की एक बात तो थी कि उनकी कहानियां सीधे मन को छू लेती थीं।