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Hatheli Par Karn
‘महाभारत’ के महानायक कर्ण का नाम आते ही आँखों के आगे परस्पर विरोधी बिम्ब उभर आते हैं - एक कर्ण दान-पुण्य के शिखर पर है, जो इंद्र को अपने कवच-कुंडल तक दान कर देता है, तो दूसरा कर्ण दुर्योधन के दरबार में चीरहरण के घृणित कृत्य में सहभागी है। उपन्यास का नैरेटर कर्ण का बालसखा और शुभचिंतक है। उसके सूत पुत्र होने के अपमानों का गवाह भी, और विलक्षण धनुर्धर में विकसित होने का साक्षी भी। वह महज़ उसकी जीवनी को प्रस्तुत नहीं कर रहा, बल्कि बार-बार उसके उच्च आदर्शों से स्खलित होकर पतन के गर्त में गिरने की यातनाओं को स्वयं अपने अंतर्मन पर झेल रहा है। कर्ण अपने जीवन में एक साथ पाप और पुण्य दोनों को बेधड़क जीता चलता है, जब तक कि उसकी मृत्युशैय्या पर स्वयं श्रीकृष्ण के सामने यह तय करने की ज़िम्मेदारी नहीं आ जाती कि दोनों में से किसका पलड़ा भारी रहा?
हथेली पर कर्ण विशिष्ट कथाकार उपन्यासकार नगेन्द्र नागदेव का छठा उपन्यास है। अभी तक उनके पाँच उपन्यास और दस से अधिक कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कई पुस्तकें अंग्रेज़ी, मराठी और उड़िया में अनुदित हो चुकी हैं। इन्हें दिल्ली हिन्दी साहित्य अकादेमी के ‘साहित्य सम्मान’ और मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् के ‘कृति पुरस्कार’ सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हैं। व्यवसाय से नगेन्द्र नागदेव एक आर्किटेक्चर हैं।
हथेली पर कर्ण विशिष्ट कथाकार उपन्यासकार नगेन्द्र नागदेव का छठा उपन्यास है। अभी तक उनके पाँच उपन्यास और दस से अधिक कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कई पुस्तकें अंग्रेज़ी, मराठी और उड़िया में अनुदित हो चुकी हैं। इन्हें दिल्ली हिन्दी साहित्य अकादेमी के ‘साहित्य सम्मान’ और मध्य प्रदेश साहित्य परिषद् के ‘कृति पुरस्कार’ सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हैं। व्यवसाय से नगेन्द्र नागदेव एक आर्किटेक्चर हैं।
176 pages, Paperback
Published February 1, 2025
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Community Reviews
Displaying 1 - 1 of 1 review
September 24, 2025
25 जुलाई 2025
करीब करीब तीस साल पहले की बात है। गर्मी की छुट्टियों में घर में बालहंस, नन्दन और चंपक जैसे प्रकाशनों के कई संस्करण आया करते थे। उन्हीं में बालहंस की एक कहानी थी जो इतने वर्षों तक मन में साथ चलती आ रही है।
सत्रहवें दिन के युद्ध के बाद कृष्ण और अर्जुन मरणासन्न कर्ण के पास पहुंचे। कृष्ण ने कर्ण को याद दिलाया कि उसके पास अभी भी कुछ है दान देने के लिए और उसका सोने का दांत मांग लिया। कर्ण ने वह भी दे दिया। फिर कर्ण ने कृष्ण से मांगा कि उसका अंतिम संस्कार ऐसी जगह हो जहां पहले किसी का न हुआ हो, ऐसी जगह जो अब भी पवित्र हो। कृष्ण और अर्जुन ने सारा लोक छान मारा पर ऐसा कोई स्थान न मिला। अंत में कृष्ण ने कहा कि उनका बायां हाथ अब भी पवित्र है। दायां हाथ?, अर्जुन ने पूछा। वो जरासंध से भिक्षा लेने से अपवित्र हो गया। और कहानी खत्म होती है कर्ण के अंतिम संस्कार से।
तीन दशकों में जाने कितनी बार महाभारत के कितने पुनर्कथन पढ़ लिए। गद्य, कविता, नाटक, विवेचन, हिंदी में, अंग्रेजी में, यहां तक कि फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवादित, पर ये कहानी, यहां तक कि इसका कोई संदर्भ भी कहीं नहीं मिला। पर यह कहानी मन में साथ चलती रही।
फिर अभी तीन दिन पहले मंगलवार को एक बुक स्टोर के हिंदी सेक्शन को टटोलते हुए अचानक नज़र सीधा इस उपन्यास के शीर्षक पर गई। नहीं देखा अंदर क्या है। बस ले ली। लगा कि किताब को पता था कि कोई उसको वर्षों से ढूंढ रहा है। इसका शीर्षक कुछ और भी हो सकता था, पर नहीं, हम दोनों को एक दूसरे को ढूंढ ही लेना था।
खोल के देखा तो पता चला कि इसी साल प्रकाशित हुई है। पढ़ के लगा कि तीन दशकों तक वह कहानी इसलिए साथ चली ताकि एक दिन नरेंद्र नागदेव के लेखन कौशल से परिचय करा सके। एक नया दृष्टिकोण, महाभारत के अंतहीन दृष्टिकोणों में। यह काम आसान नहीं है। अद्भुत कथावाचन वाले इस उपन्यास को पढ़ना ठीक बालहंस की उस कहानी की तरह एक अविस्मरणीय अनुभव है।
करीब करीब तीस साल पहले की बात है। गर्मी की छुट्टियों में घर में बालहंस, नन्दन और चंपक जैसे प्रकाशनों के कई संस्करण आया करते थे। उन्हीं में बालहंस की एक कहानी थी जो इतने वर्षों तक मन में साथ चलती आ रही है।
सत्रहवें दिन के युद्ध के बाद कृष्ण और अर्जुन मरणासन्न कर्ण के पास पहुंचे। कृष्ण ने कर्ण को याद दिलाया कि उसके पास अभी भी कुछ है दान देने के लिए और उसका सोने का दांत मांग लिया। कर्ण ने वह भी दे दिया। फिर कर्ण ने कृष्ण से मांगा कि उसका अंतिम संस्कार ऐसी जगह हो जहां पहले किसी का न हुआ हो, ऐसी जगह जो अब भी पवित्र हो। कृष्ण और अर्जुन ने सारा लोक छान मारा पर ऐसा कोई स्थान न मिला। अंत में कृष्ण ने कहा कि उनका बायां हाथ अब भी पवित्र है। दायां हाथ?, अर्जुन ने पूछा। वो जरासंध से भिक्षा लेने से अपवित्र हो गया। और कहानी खत्म होती है कर्ण के अंतिम संस्कार से।
तीन दशकों में जाने कितनी बार महाभारत के कितने पुनर्कथन पढ़ लिए। गद्य, कविता, नाटक, विवेचन, हिंदी में, अंग्रेजी में, यहां तक कि फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवादित, पर ये कहानी, यहां तक कि इसका कोई संदर्भ भी कहीं नहीं मिला। पर यह कहानी मन में साथ चलती रही।
फिर अभी तीन दिन पहले मंगलवार को एक बुक स्टोर के हिंदी सेक्शन को टटोलते हुए अचानक नज़र सीधा इस उपन्यास के शीर्षक पर गई। नहीं देखा अंदर क्या है। बस ले ली। लगा कि किताब को पता था कि कोई उसको वर्षों से ढूंढ रहा है। इसका शीर्षक कुछ और भी हो सकता था, पर नहीं, हम दोनों को एक दूसरे को ढूंढ ही लेना था।
खोल के देखा तो पता चला कि इसी साल प्रकाशित हुई है। पढ़ के लगा कि तीन दशकों तक वह कहानी इसलिए साथ चली ताकि एक दिन नरेंद्र नागदेव के लेखन कौशल से परिचय करा सके। एक नया दृष्टिकोण, महाभारत के अंतहीन दृष्टिकोणों में। यह काम आसान नहीं है। अद्भुत कथावाचन वाले इस उपन्यास को पढ़ना ठीक बालहंस की उस कहानी की तरह एक अविस्मरणीय अनुभव है।
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