अनुराग अनन्त की कहानियों की विशिष्टता यह है कि वह कथा के लिए किसी ‘बाहरी अन्य’ पर निर्भर नहीं हैं। अपनी निर्मिति, अपनी गति, विवरण, अपनी आख्यानात्मकता के स्थापत्य और उसके ‘इंटीरियर’ (आन्तरिकता) को बनाने के लिए सारे जरूरी पदार्थ या सामग्री वह अपने ही भीतर से जुटाती और गढ़ती हैं। ‘मुहावरे की मौत’ की कई कहानियाँ ऐसी हैं, जो कहानी के कहानी होने का ही विध्वंस करती हैं और अपनी मौलिकता के जादुई सम्मोहन से वास्तविक जीवन का सच अर्जित करने का विरल और दुष्कर प्रयत्न एक सतत विरोधाभासी सहजता के साथ करती हैं। ये कहानियाँ आज की और सम्भवतः भविष्य की कहानी को, कहानी से मुक्ति की कहानियाँ होने का आसन्न संकेत देती हैं।
इस संग्रह की कोई भी एक कहानी उठाइए, मसलन पहली ही कहानी, जिसका शीर्षक है ‘त्रासद
ये कहानियों का संग्रह है। मेरी हिम्मत दो कहानी पढ़ने के बाद टूट गई। ऐसा लगा लिखने वाले को कुछ दिन कहानी लिखना छोड़ कर मनोचिकित्सक के साथ कुछ वक्त रहना चाहिए। हालांकि मैं यह दावा बिलकुल नहीं करना चाहता कि जिन दो कहानियों को मैने पढ़ा है वो मुझे समझ में आ गई।
कहानी लिखने वाला जो लिख रहा है वो क्यों लिख रहा है, मुझे समझ नहीं आ सका। लिखने वाले ने किसके लिए लिखा है ये भी मेरी समझ से परे है, और मैं वो शख्स नहीं हूं ये पूरे यकीन से कह सकता हूं। इन कहानियों से लेखक कहना क्या चाहता है, वो तो शोध का विषय होना चाहिए (और संभवतः कुछ लोगों यह शोध करेंगे और फिर यह पुस्तक डॉक्टरेट करवाने का एक जरिया भी बनेगी, पर यह सब मेरे बूते से बाहर की बात है)
कुल मिला कर कहना यह चाहता हूं ... की अगर आप यह पुस्तक पढ़ें, तो कृपया मुझे भी यह बताएं कि आपको क्या समझ आया। मैं कसम खा कर कह सकता हूं कि मुझे दो कहानियों पढ़ने के बाद माथा फोड़ लेने का मन हुआ, कि ऐसी कहानियां पढ़ने का औचित्य क्या है?