"स्व से समष्टि की ओर" केवल एक पुस्तक नहीं है, वह एक साधना है एक आह्वान है, जो मुझसे भी पहले मेरे भीतर के उस भारत ने किया, जिसे इतिहास के गहन मौन में भी अपनी नियति का बोध था। जब संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रविष्ट हो गया है और जब पंच परिवर्तन का आह्वान बनकर उभर रहा है, तब यह आवश्यक लगा कि इस महान युग संक्रमण को केवल देखा न जाए, बल्कि शब्दों के माध्यम से साधा जाए, स्पंदनों के माध्यम से जिया जाए।
यह ग्रंथ मेरे लिए एक दायित्व रहा है — केवल एक विचारशील लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वयंसेवक के रूप में, एक साधक के रूप में, जो जानता है कि भारत की आत्मा आज फिर एक नए जागरण के द्वार पर खड़ी है। यह लेखन कोई आकस्मिक उपक्रम नहीं था; यह वर्षों से संघ के कार्य, विचार और साधना के अवगाहन से उपजे उस आंतरिक अनुभव का स्व