‘हर पेंटिंग अपने भीतर एक चुप्पी छुपाए रखती है — और हर कलाकार, एक छुपी हुई कथा।‘ संयम एक ऐसे पेंटर की कहानी है, जो जीवन की भीड़ में भीतर से बिल्कुल अकेला है।
वह रंगों से अपनी दुनिया बनाता है, लेकिन जब वे भी चुप हो जाते हैं, तो उसे शब्दों का सहारा लेना पड़ता है।
उसकी एक दोस्त उसे कहती है—"लिखो। जो तुमने महसूस किया, जो कह नहीं पाए—उसे लिखो।"
यह उपन्यास उसी आत्म-संवाद की यात्रा है।
यह केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि एक चित्रकार के भीतर की वह आवाज़ है, जो कभी पेंटिंग के ज़रिए नहीं निकल पाई।
यह उस गहरी खामोशी की भाषा है, जिसे हम सब कभी न कभी महसूस करते हैं—चाहे हम कलाकार हों या नहीं।
क्या एक लेखक एक पेंटर को समझ सकता है? क्या हम कभी किसी के रंगों की भाषा पढ़ सकते हैं? यही प्रश्न इस किताब के हर पन्ने में झलकता है।
संयम मानव कौल का सबसे आत्मिक और अंतरंग उपन्यास है—जहाँ कैनवास शब्द बन जाता है, और अकेलापन कहानी।
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
क्या कहूँ मानव कॉल के बारे में | ऐसे बहुत से अनुभव जो हम सभी को जीवन में हुए हैं उसे बहुत हे सहजता से लिख देते हैं| कभी कभी कहानिया आगे भी नहीं बढ़ती बस सोच होती है दुःख होता है ग्लानि होती है और सभी को ऐसे लिख देते हैं जैसे मैंने ये सब कुछ खुद महसूस किया हो| इनकी किताबे पढ़ने से कभी मन्न नहीं भरता और मन्न शांत भी हो जाता है अगर आपको भी बहुत सोचने की आदत है| बहुत अच्छी किताब है कुछ बचपने में की गयी गलितयों की, ग्लानि की और शायद अगर उससे बहार आने का मौका मिल पाए तो उसकी..
संयम एक ऐसे पेंटर की कहानी है जो जीवन में बहुत अकेला है, लेकिन अपनी पेंटिंग्स के ज़रिये अपने भीतर चल रहे भावों को असली रूप दे पाता है। बचपन से ही उसे चित्र बनाने का शौक होता है, और जब उसकी ज़िंदगी में एक अच्छा गुरु आता है, तो वही उसे सही दिशा और आत्मविश्वास देता है। उस गुरु की बनाई गई पेंटिंग कहानी का एक बेहद ख़ास और भावनात्मक हिस्सा बन जाती है जो सिर्फ़ एक चित्र नहीं, बल्कि एक गहरे रिश्ते और कृतज्ञता का प्रतीक लगती है। यह किताब पेंटिंग तक सीमित नहीं है; इसमें आत्मचिंतन, रिश्ते, अकेलापन, और इंसान के भीतर चलने वाली खामोश जद्दोजहद को भी बहुत सादगी से दिखाया गया है। कुछ सहायक पात्र भी हैं, जो कहानी को और मानवीय बना देते हैं।
हमेशा की तरह मानव कौल की भाषा बेहद सरल है, लेकिन बातों के अर्थ गहरे हैं। यही वजह है कि किताब भारी नहीं लगती, बल्कि धीरे-धीरे मन में उतरती जाती है। कुल मिलाकर, संयम एक हल्की लेकिन संवेदनशील पढ़ाई है, जिसे आप आराम से 1.. 2... दिन में पढ़ सकते हैं। अगर आपको कला, आत्मनिरीक्षण और शांत कहानियाँ पसंद हैं, तो यह किताब आपको ज़रूर पसंद आएगी।
मानव की कोई भी किताब प्रकाशित होते ही प्रीबुक हो जाती और तुरंत पढ़ी जाती। इस बार यह किताब पढ़े जाने के इंतज़ार में इतने महीनों तक बचाए रखी। जैसे मैं आइसक्रीम का आख़िरी स्कूप बचाकर रखता हूँ, कि कठिन समय में काम आए।
मानव अपनी लगभग सारी कहानियों में अकेलेपन के चटकारे लेते हैं और पाठक को भी उसके भीतर बसे अकेलेपन से परिचित करवाते हैं। कहानी चाहे समलैंगिकता की हो, कला की, यात्रा की, मृत्यु की या प्रेम की, अकेलापन मुख्य भूमिका में कहानी का हाथ पकड़े साथ चलता है।
“संयम” एक पेंटर की कहानी है, जो मानव की अन्य कहानियों के साथ कहीं-न-कहीं गुत्थमगुत्था है। लगता है मानव अपने किरदारों का एक छोटा-सा यूनिवर्स बना रहे हैं, या फिर शायद अपने भीतर छिपे लेखक को पूरी ताक़त से खोज रहे हैं। अगर आपने उनकी सारी किताबें उनके लिखे जाने के क्रम में पढ़ी हों, तो साफ़ दिखाई देता है कि उनका लेखन भीतर से धीरे-धीरे बाज़ार की ओर रुख करता जा रहा है। कई जगहों पर उनका अपने लेखन के साथ अंतर्द्वंद्व और थकान भी पढ़ी जा सकती है।
मैं बस यही प्रार्थना करता हूँ कि मानव अपना कोई कोना ढूँढ पाएँ या यूँ कहिए, वह पहाड़ ढूँढ पाएँ जहाँ बाज़ार में दाम लगाने वालों की आवाज़ न पहुँचती हो, जहाँ कुछ नया कर जाने की त्रासदी न हो।
फिर लगता है हम होते ही कौन हैं नसीहत देने वाले। इतनी आवाज़ों से भरे इस समाज में कोरे पन्ने पर स्याही के कुछ छींटे भर मार देना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है।
सवाल ही पैदा नहीं होता कि उनका लिखा छोड़ा जाए। पढ़ डालिए।
मानव कौलका सिर्जना पढ्न एउटा फरक अनुभव हुने गर्छ उनको न्यारेसन शैली, पात्र चयन, संवाद संयोजन अनि पढ्दै गर्दा हाइलाइट गर्न मन लाग्ने मिठा पंक्तिहरुका कारण। अझ विशेष लाग्ने चै आम, साधारण पेन्टरको कहानी लागे तापनि यस उपन्यासमा उनले कलाकारिता र पेण्टिङ्ग जीवनको अन्तर कथा, कला प्रक्रिया प्रोसेस , रोकिएको बेलाको ग्याप, मनोभावना र द्वन्द अनि यौन - प्रेम- प्रेमाकर्षण, रित्तोपना, भरिलोपना, प्रभाव, कलाकारको स्वभाव, आदि अनेकौ आयाम ल्याएका छन्। कलाकारको आनीबानी, right and wrong decision, impact and choices, sexual - physical attraction, आदिका साथै समलैंगिक प्रेम सम्बन्धका कारण गाउमा हुने लफडा, विछोड र मिलन तथा कुनै पनि व्यक्तिको स्मृति उसले छोडेर जाने सम्बन्ध, बोलेका वचन, गरेका काम, हर्कत, भुलेको र बिर्सेको कसम आदिमा हुन्छ भन्ने नि छ।
स्कुल बेला पढाइमा खासै दत्तचित्त हुन नसके पनि आर्ट र पेण्टिङ्ग प्रतिको मोह र लगाव देखेर आफ्नो कला सिर्जना लाई अझै तिखार्न प्रेरणा दिने निनाद सर जस्ता पात्र विरलै पाइञ्छ जीवनमा। पढाइ बाहेक अन्त ध्यान गएमा आकाश नै खस्ला जस्तो गर्ने र जीवनमा डाक्टर, इन्जिनियर मात्रै ठुलो मान पदवीको पेसा मानेर प्रेसर दिने धेर हुन्छ प्यारेन्ट्स, गार्जियन र टिचर। जीवन जति शक्तिशाली गुरु हुने गर्छ त्यति नै स्कुलमा उचित मार्गनिर्देश दिने, हौसला प्रदान गर्ने एवं आत्मविश्वास निखार्ने तिखार्ने पथ-प्रदर्शक हुदा नया उर्जा मिल्दछ। निनाद सरको पेण्टिङ्ग र त्यसले पेन्टर अंकुशको जीवनमा राख्ने महत्व पढ्न मजा आयो। एकान्तपना, अन्तरमुखी स्वभाव, जिन्दगीमा अपर्झट गासिने र लामै समय स्थायी रहने मित्रताको नाता - सम्बन्ध, प्रेम र दोस्तीमा आउने उतार-चढाव, आत्महत्या, आदि बारे चिन्तन मननका साथै मनका भावना आवेग कसैलाई भन्न मन नलाग्दा डायरीमा टिपोट गरेर पाइने आनन्द बोध भएको therapeutic writing बारे राम्रै आको छ reflection उनको।
जीवनमा समस्याको पोको सुनेर राम्रो निर्देश र सल्लाह दिने इनायत जस्ता मित्र, विपरीत लिङ्गको भए रहे पनि sibling जस्तै मिठा सम्बन्ध हुने, तनाव - डिप्रेसन- चिन्ताको पोखरीमा डुब्न नदिएर साथ र गाथ दिने साथी सर्कलको आवश्यकता बोध हुन्छ यो पढ्दा।हाम्रो दुख बिसाउदा चाहे त्यो गम्भीर साथी साथ होस् वा कगाजी डायरी साथ - एक किसिमको हल्कापना, होलो महसुस गरिन्छ। स्कुल बेला सर मिस को अगाडि चुपचार बस्ने, घोसेमुन्टो लगाएर बस्ने अनि केही सर मिसको क्लास मा प्रश्न नै प्रश्न सोध्ने घटना स्मृति नि तरोताजा भयो। सरल कथानक भएपनि बीच बीचमा मानवले जीवन र बितेका पलका तिता मिठा relatable लाग्ने lines लेखेका छन्। आफ्नो तारिफ सुन्न रुचाउने तर विरोध को लागि मात्रै बिरोध गरेको नसुन्ने कलाकार अनि अरुको सिर्जनात्मक र constructive commentsसुनेर आफुलाई सुधार गर्न खोज्ने चरित्र नि आएको छ मज्जाले। धैर्य, प्रतीक्ष्या, परीक्षा, चेतना, अवचेतन प्रक्रिया, आदि नि कतै कतै स्थान पाएका छन् उनको न्यारेसनमा।
Artist, painters का काममा consciously subconsciously unconsciously उनीहरुको मनका भावना, जीवनका भोगाइ र अनुभवका फेहरिस्त, आदि reflect भएका हुन्छन। उपन्यासमा मैले retrospective and introspective delving into one's inner mind पाए। अत; उनको अघिल्लो कृति सर्टका तीसरा बटन पनि खुब आउने रहेछ उनको यसमा रिपिट हुने यो लाइन पढ्दा चै।
गुडरीडमा किताबबारे को केही कमेण्टरॆ मजेदार लागे।
- "मानव अपना कोई कोना ढूँढ पाएँ या यूँ कहिए, वह पहाड़ ढूँढ पाएँ जहाँ बाज़ार में दाम लगाने वालों की आवाज़ न पहुँचती हो, जहाँ कुछ नया कर जाने की त्रासदी न हो।
फिर लगता है हम होते ही कौन हैं नसीहत देने वाले। इतनी आवाज़ों से भरे इस समाज में कोरे पन्ने पर स्याही के कुछ छींटे भर मार देना ही बहुत बड़ी उपलब्धि है।"
- संयम किताब पाठकों को यह समझने में मदद करती है कि संयम केवल एक नैतिक गुण नहीं है, बल्कि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। लेखक ने इसके महत्व को इतना प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया है..."
"संयम"एक बेहतरीन पुस्तक है जो लेखक मानव कौल द्वारा लिखी गई है, जिनकी विशिष्ट लेखन शैली और गहरी सोच के लिए वह प्रसिद्ध है और हमें बेहद पसंद हैं। इस किताब में संयम की महत्ता को बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया गया है। कहानी एक पेंटर (चित्रकार) की है। कि वह अपने रंगों के माध्यम से कैसे मन की अपनी दुनिया और शब्दों कैनवास पर ऐसे सजा देते हैं कि पेटिंग मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती प्रतीत होती है और अपनी ओर आकर्षित करती है।
संयम किताब पाठकों को यह समझने में मदद करती है कि संयम केवल एक नैतिक गुण नहीं है, बल्कि यह मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है। लेखक ने इसके महत्व को इतना प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया है कि पढ़ने के बाद, पाठक अपने जीवन में संयम को अपनाने के लिए प्रेरित महसूस करते हैं।