लेखक परिचय एक छोटे शहर में पैदा होने से पलकर बड़ा होने से, जीवन के शुरूआती दौर में सोचने का दायरा छोटा होता है, लेकिन जीवन के बुनियादी मुल्यों से कस कर बंधा रहता है, जोकि बड़े शहरों की नई सभ्यताओं के नये परिवेश की चुस्त सी रफतार में कहीं कहीं धूमल हो जाता है। बचपन में स्टेज और नाटक के मौके नही मिलते थे..... सिर्फ रेडियों में क्रिकेट की कमैंट्री सुनकर उसकी नकल लगाकर जो तालियां बटौरी, उनकी गूंज से लगा कि कोई कलात्मक सोच अन्दर ही अन्दर उपज रही है। फिर कॉलेज के दिनों में नाटक करना, लिखना, मौनो एक्टिंग करना तथा अन्तर विश्वविद्यालय की प्रतिर्स्पधाओं के अवार्ड हासिल करना। लेकिन इन सबको वास्तविक रूप ,नाटक विभाग चण्डीगढ़ में एम.ए.करना और नाटकों के लिये पंजाब यूनिवर्सिटी के लिये यू.जी.सी.